शांति-अशांति और जीवन-मृत्यु एक सिक्के के दो पहलू हैं। जब आयु सीमा समाप्त होती है तब मृत्यु का दरवाजा खुल जाता है। मृत्यु चिंता का विषय नहीं है, क्योंकि ‘जातस्य ध्रुवं मृत्यु’ं गीता का प्रवचन है। इस भूतल पर मृत्यु ही एक सत्य है। फिर भी मानव मन को मृत्यु भय सताए रखता है। आयुष्य निर्णय के प्रति आचार्यों में मतभिन्नता है। अतः एकपक्षीय निर्णय सर्वथा अनुचित है। शास्त्रों में आयु निर्णय की 16 प्रकार की विधियों का उल्लेख है। आयु निर्णय की विधियां इस प्रकार हैं: 1. केंद्र, पणफर अपोक्लिम, त्रिक मतानुसार दीर्घायु, मध्यायु, अल्पायु आदि। 2. जैमिनी सूत्रानुसार ये विधियां निम्न हैं। 3. लग्न, सप्तम, अष्टम और द्वितीय भावों के अनुसार बलाबल। 4. जैमिनी सूत्र के अनुसार (अंश फल ज्ञानाय सारणीम) 5. ननआपु 6. लग्नेश सूर्य मित्रानुसार सूर्य का मित्र हो तो दीर्घायु 7. लग्नायु की विभिन्न राशियों के धु्रवांक के अनुसार 8. केंद्रायु 9. गौरी जातक के अनुसार विंशोत्तरी दशायु। 10. बंगाली पद्धति के अनुसार आयु निर्णय 11. गणित आयु 12. योगायु 13. रश्मिजायु 14. चक्रायु 15. अष्टवर्गायु 16. अष्टोत्तरी और विंशोत्तरी दशानुसार। इन सभी विधियों से किसी कुंडली का एक सा आयु निर्णय नहीं हो पाता है। मंगली आयु निर्णय के फल का सामान्य एवं सरल सूत्र दिया गया है, जिसके अनुसार दीर्घायु या परमायु का निर्णय किया जा सकता है। आयु निर्णय से संबद्ध कुछ बिंदुओं का उल्लेख नीचे किया जा रहा है। 1. मंगल के स्वगृही या उचस्थ या किसी बल से बलवान होने पर दीर्घायु योग बनता है, क्योंकि काल पुरुष मंगल लग्नेश तथा अष्टमेश होता है। 2. लग्न एवं लग्नेश का बलवान होना आवश्यक है। 3. अष्टमेश एवं अष्टम भाव की प्रधानता भी जरूरी है। 4. लग्नेश अष्टम भाव में जाने पर दीर्घायु योग बनाता है। 5. अष्टमेश लग्न में होने पर आयु दीर्घ करता है। 6. लग्नेश और अष्टमेश नीचस्थ होकर भी एक स्थान पर रहें तो दीर्घायु योग बनता है। 7. चंद्रबल महान बल है। यह जन्मांक में स्वगृही और उच्चस्थ हो तो इसका बल आयु को प्राप्त होता है। 8. आयु कारक एवं अनिष्ट कारक ग्रह शनि स्वगृही तथा उच्चस्थ हो। 9. राहु-केतु तृतीय एवं नवम भाव में या षष्ठ और द्वादश भावों में हों तो श्रेष्ठ आयु प्रदान करते हैं। 10. बुधादित्य योग से राजयोग के साथ-साथ आयु बल भी मिलता है। 11. गुरु-शुक्र का शुभ क्षेत्र में रहना आवश्यक है। उक्त बिंदुओं का विश्लेषण कुछ महापुरुषों तथा देवपुरुषों की कुंडलियों के आधार पर किया जा रहा है। श्री गणेश के जन्मांक में लग्नेश बुध स्वगृही है। मंगल उच्चस्थ होकर पंचम भाव में स्थित है। अष्टमेश मंगल उच्चस्थ है, चंद्रमा उच्च का है। शुक्र और गुरु बलवान हैं। राहु-केतु क्रमशः षष्ठ और द्वादश भाव में हैं। पंचमेश शनि नवम भाव में शुभ है। उक्त योगों के कारण भगवान श्री गणेश को दिव्यायु प्रदान की गई। श्री राम के जन्मांक में मंगल उचस्थ होकर सप्तम भाव में है। लग्नेश चंद्र स्वगृही है। लग्न में उच्चस्थ गुरु है। अष्टमेश शनि उचस्थ होकर सुख भाव में है। दशम भाव में बुधादित्य राजयोग है। राहु-केतु क्रमशः तृतीय एवं नवम भाव में हैं। भगवान राम ने अपनी आयु का भोग करने के साथ-साथ शास्त्र के अनुसार पिता की आयु का भोग भी किया और परम धाम को पधारे। यहां लग्नेश बुध अष्टम भाव में है। अष्टमेश शनि उच्चस्थ है। अष्टम भाव में तीन ग्रह मंगल, बुध और शुक्र स्थित हैं जिससे यह भाव बलवान है। चंद्रमा मित्र राशि पर है। सूर्य भाग्य भाव में अवस्थित है। केतु-राहु क्रमशः तृतीय एवं नवम भाव में हैं। यह ग्रह स्थिति दीर्घ आयु की द्योतक है। आचार्य विनोवा भावे के जन्मांक चक्र में लग्नेश गुरु उच्चस्थ होकर अष्टम भाव में है। अष्टमेश चंद्र उच्चस्थ होकर षष्ठ भाव में है। अष्टम भाव में शुक्र और गुरु के स्थित होने के कारण यह भाव शुभ है। सूर्य स्वगृही पंचम भाव में है। मंगल दशम भाव में और बुध दिग्बली है। दशम का मंगल उच्चस्थ मंगल से अधिक फल देता है। शनि एकादश भाव में उच्चस्थ है। राहु-केतु क्रमशः तृतीय एवं नवम भाव में हंै। उक्त ग्रह स्थिति के फलस्वरूप विनोवा भावे को दीर्घायु प्राप्त हुई। श्री जवाहर लाल नेहरू के जन्मांक चक्र में लग्नेश चंद्रमा स्वगृही है। अष्टमेश शनि द्वितीय भाव में बैठकर अष्टम भाव को देख रहा है। मंगल अपने कारक भाव में है। सूर्य पंचम भाव में मित्रक्षेत्री है। गुरु स्वगृही है। केतु-राहु क्रमशः षष्ठ और द्वादश भाव में हैं। जन्मांक चक्र में आयुष्य के सभी बिंदु विद्यमान नहीं हैं। इसलिए वे पूर्ण दीर्घायु नहीं हो सके।


ज्योतिष - एक विज्ञान  जनवरी 2005

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