शनि एवं अध्यात्म

शनि एवं अध्यात्म  

नीलांजनम् समाभासं रविपुत्र यमाग्रज। छायामार्तण्ड सम्भूतं तं नमामि शनैश्चरम्।। नमस्कार मंत्र के साथ शनि ग्रह के संबंध में विचार करते हैं। सूर्य से छठा और सौरमंडल का बाह्य ग्रह शनि सूर्य से 143 करोड़ कि.मी. तथा पृथ्वी से 15 करोड़ कि. मी. दूर है। इसका मध्य व्यास 1.20 लाख कि. मी., आयतन पृथ्वी से 744 गुना, गति 9.60 कि. मी. प्रति सेकेंड, भारी 0.70 गुना हल्का, वलय - 13 तथा उपग्रह - 33 हैं। शनि के अन्य नाम शनिश्चर एवं मंद हैं। यह मकर एवं कुंभ राशियों का स्वामी है तथा इसकी महादशा 19 वर्ष की होती है। यह कुंडली के तीसरे ,छठे, 11वें और 12वें घरों में शुभ फलदायी होता है। यह त्याग, तपस्या, क्षमा, सहनशीलता, संन्यास, तप ,पश्चात्ताप एवं मोक्ष का कारक ग्रह है। यह मेष लग्न के लिए बाधक, वृष एवं तुला के लिए राजयोग कारक, मिथुन, कर्क, सिंह, कन्या के लिए मध्यम तथा वृश्चिक एवं धनु लग्नों के लिए साधारण फल देने वाला मकर के लिए शुभ, कुंभ के लिए साधारण और मीन के लिए अशुभ कारक है। इसकी साढ़े साती से भयभीत होने की आवश्यकता नहीं है। इस अवधि में ऐश्वर्य और वैभव की प्राप्ति एवं पदोन्नति भी हेाती है। वास्तव में शनि गुरु जैसा है। यह जब चंद्र के ऊपर आता है तो डर लगता है कि जो कुछ जीवन में इकट्ठा किया है, कहीं चला न जाए। शनि के प्रकोप से रक्षा के 15 मुख्य उपाय इस प्रकार हैं: 1. घोड़े की नाल की अंगूठी मध्यमा में पहनें। 2. शनिवार को छाया दान करें। 3. शनि मंत्र का जप करें। 4. महामृत्युंजय मंत्र का सवा लाख जप करें। 5. शनिवार को पीपल के पेड़ के नीचे दीपक रखें। 6. सरसों का तेल शनि मंदिर में दें। 7. शनि यदि योगकारक हो तो नीलम धारण करें। 8. यदि शनि अशुभ हो तो मूंगा एवं नाव की कील धारण करें। 9. प्रतिदिन हनुमान चालीसा का पाठ करें। 10. बंदरों को केले, चने और गुड़ खिलाएं। 11. उड़द, कंबल और काले चने दान करें। 12. 27 शनिवार को शरीर पर तेल लगाएं। 13. सुंदर काण्ड का पाठ करें। 14. दशरथ कृत शनि स्तुति का पाठ करें। 15. तेल में चुपड़ी रोटी कुत्ते को खिलाएं। एकोऽहम् बहुस्यामः की भावना के उदय के साथ निराकार कास्मिक लैगोस अपने तीन आयामों ब्रह्मा, विष्णु एवं महेश के रूप में विभक्त हुआ जो क्रमशः सृष्टिकर्ता, पुष्टिकर्ता एवं संहारकर्ता कहलाए। सृष्टि की रचना के क्रम में प्रजापति की 13 कन्याओं की शादी कश्यप ऋषि से हुई। दिति से दैत्य और अदिति से देव पैदा हुए जिनमें सूर्य, चंद्र, इंद्र तथा वरुण प्रमुख थे। विश्वकर्मा की पुत्री संज्ञा सूर्य पर मोहित होकर विवाह बंधन में बंध गयी। सहवास काल में सूर्य के तेज से अश्रुधारा निकली जिससे यमुना पैदा हुई तथा गर्भ से युग्म रूप में यम एवं यमी ने जन्म लिया। महान विदुषी और ज्योतिष की प्रकांड ज्ञाता अनिंद्य सुंदरी संज्ञा अपने तेज में वृद्धि हेतु, दैत्यों के डर से अश्व रूप में उत्तरी ध्रुव में तपस्यारत हो गई तथा सूर्य की सेवा में अपनी प्रतिरूप छाया को रख दिया। छाया से तीन संतानें सावर्णि, महाकाल एवं ताप्ती उत्पन्न हुईं। यम यमी के प्रेम में पड़ गए अतः सूर्य ने यमी को प्राण दंड दिया एवं यम को नाना के घर भेज दिया। यम नाराज हुए और वापस आकर पिता को फटकार लगाई तथा छाया को पैर से मारा। छाया ने श्राप दिया, ‘जाओ तुम्हारे पैर में कुष्ठ हो जाय, कोई मां अपने पुत्र को श्राप नहीं दे सकती, अतः सूर्य ने ध्यान लगाकर जान लिया कि यह संज्ञा नहीं है। छाया को भस्म कर सूर्यदेव उत्तरी ध्रुव पहुंचे तथा सहवास कर संज्ञा से अश्विनी कुमार एवं रेवन्त को उत्पन्न किया। रेवन्त इन्द्र के सेनापति बने तथा अश्विनी कुमार धन्वन्तरि कहलाए। सावर्णि मनु कहलाए तथा महाकाल शनिश्चर के नाम से प्रसिद्ध हुए। मां को भस्म करने के कारण शनि पिता से क्रुद्ध हुए एवं यम के पैर में अपना तेज प्रवाहित कर पीड़ा हरण कर ली। सूर्य के सृष्टि मंडल में शनि ने व्यवधान पैदा शुरू किया, अतः शंकर को आना पड़ा। वे शनि को लेकर कैलाश चले गए। मां पार्वती ने ‘ज्ञानी भव’ का आशीर्वाद दिया। शंकर ने रहस्य विद्या पढ़ाई। महामृत्युंजय जप से शिव को शनि ने प्रसन्न कर महान्यायी एवं महाकाल का वरदान प्राप्त किया। शनि का निर्णय अंतिम होगा, इसे कोई बदल नहीं सकता। शनि ने कहा, ‘‘प्रभु ! आपका भक्त मेरा भक्त है, उसका कोई अनिष्ट नहीं कर सकता।’’ शिव ने यम को धर्मराज नाम देकर स्वर्ग का स्वामी बनाया तथा शनि को भूलोक देव बनाया और यम लोक सौंप दिया। सहायता में चित्रगुप्त को दिया। यम को आशीर्वाद दिया, ’’अगर भूमि पर पैर न रखो तो दर्द नहीं होगा।’’ अतः शनि भैंसे के रूप में उनकी सवारी बने। इस प्रकार शनि ही धर्मराज, यमराज एवं चित्रगुप्त हैं। पृथ्वी पर शनि का जन्म शनिवार को अर्धरात्रि में कृष्ण पक्ष अष्टमी को हुआ। उन्होंने बालक रूप में गुरु के आश्रम में शिक्षा ग्रहण की। गुरु ने आशीर्वाद दिया, ‘‘धैर्य एवं न्याय के प्रणेता बनो।’’ शनि ने कहा, ‘‘जब गुरु में शनि की या शनि में गुरु की दशा चलेगी तो मैं तटस्थ रहूंगा।’’ अधिक विद्वान बनाने हेतु शिव ने शनि को शुक्राचार्य के पास भेजा। यहां मृत संजीवनी विद्या सीखी तथा प्रजापति की 13 कन्याओं से शादी की जिनसे 13 संतानें पैदा हुईं। ये ही शनि के 13 वलय हैं। तीन बड़े पुत्रों यूरेनस, नेप्ट्यून और प्लूटो को भृगु की सेवा में अर्पित कर दिया तथा ज्योतिष एवं परकाया प्रवेश की शिक्षा ली। अध्यात्म - अर्जुन कृष्ण से प्रश्न करते हैं - किं तद्ब्रह्म, किं ध्यानं किं कर्म पुरुषोत्तम। अर्थात ब्रह्म क्या है? ध्यान एवं कर्म क्या हैं? उत्तर - अक्षरं ब्रह्म परम स्वभावोऽध्यात्म उच्चते। भूतभावोद् भवको विसर्गः कर्म संज्ञीतः।। अर्थात अक्षर (जो नष्ट न हो) ब्रह्म है, जीवात्मा अध्यात्म है एवं भूतांे में भाव उत्पन्न करने वाला कर्म है। वास्तव में मन को, साधना, समाधि एवं तप से सहस्रधार में ले जाना अध्यात्म है। तत्वमसि, अहं ब्रह्मास्मि एवं शिवोऽहम् कह कर महर्षियों ने कुछ शब्दों में अध्यात्म को परिभाषित कर दिया है। अध्यात्म अंदर की यात्रा है जो मूलाधार से आरंभ होकर शक्ति और शिव से मिलती है। मूलाधार में मकर एवं कुंभ राशियों का निवास है, स्वामी शनि है तथा 7 नक्षत्र स्थित हैं। शेष चक्रों में 20 नक्षत्र एवं शेष ग्रह तथा राशियां हैं। इस प्रकार ब्रह्मांड शरीरस्थ है या कहंे कि ज्योतिष शरीरस्थ है। शनि कृपा से ही शक्ति ऊपर उठती है। शनि एक वैरागी साधु है। इसी की कृपा से व्यक्ति संन्यासी होता है। यह भाग्य रेखा है, कर्म कारक है तथा प्रारब्ध का स्वमी है। इसे कठोर स्वामी, नियमनिष्ठ स्कूल शिक्षक और मानव जाति के मित्र की संज्ञा दी गई है। यह न्यायाधीश, वकील, शिव, हनुमान, धर्मराज यमराज, चित्रगुप्त आदि भी है। शनि अवसर देता है, चेतावनी देता है और फिर दंडित करता है। केवल पश्चात्ताप एवं तप ही काम आते हैं। गत जन्म के पाप और पुण्य का फल दाता है। अपनी दंड संहिता के अनुसार उसने राजा हरिश्चंद्र, श्रीराम, नल, दमयंती, रावण, बालि, विक्रमादित्य, युधिष्ठिर, दशरथ, जटायु, परशुराम, कर्ण आदि को भी नहीं छोड़ा। शिव को मानसरोवर में गुप्त वास करना पड़ा। शनि ने लक्ष्मी को भी नहीं बख्शा। उनका आसन जलाकर उन्हें श्यामा लक्ष्मी बनाया तथा स्वयं बिल्ली एवं उल्लू का रूप धारण कर उनकी सवारी बने। शनि के सहायक राहु और केतु भी हैं। राहु की इष्ट देवी धूमावती, तथा केतु की छिन्नमस्ता हैं। गुलिका एवं मांदी शनि के पुत्र हैं। कुण्डली के 1 से 4 तक पुरुषार्थ के, 5 से 8 तक प्रारब्ध के एवं 9 से 12 तक संचित कर्म के भाव हैं। पिछले जन्मों के कर्मों के फल को संचित, वर्तमान में प्राप्त होने वाले को प्रारब्ध और वर्तमान में जो कर रहे हैं। उसे क्रियमाण कहते हैं। कर्म फल देने वाला शनि है, इसलिए दशम में मकर राशि आज्ञा देती है, ‘कर्म करो’ तथा एकादश में कुंभ राशि फल देती है। कुण्डली एक प्रकार से प्रारब्ध का ही ‘ब्लूप्रिंट’ है। शनि की विभिन्न भावों में स्थिति से गत जन्म का पाप ज्ञात कर उसका परिमार्जन किया जा सकता है। शनि अंतिम न्याय का स्वामी है। ब्रह्म ज्ञान इतना कि विष्णु स्वयं अपनी शंका का समाधान शनि से करते हैं। भगवान पूछते हैं, ‘‘ जब सब कुछ भाग्य में बदा ही है तो फिर फल का निर्णय क्यों?’’ शनि उत्तर देते हैं, ‘‘भगवन् ! प्रत्येक नश्वर प्राणी को जन्म के समय एक विशेष परिस्थिति में नियमों के अंतर्गत पैदा किया गया है। कर्म विधान से ही वह जान पाता है कि उसके जीवन का उद्देश्य क्या है। उसकी कमजोरी, पितरों का आशीर्वाद/श्राप एवं काल जीवन का उद्देश्य निर्धारित करती है। देव बनने हेतु भगवन, आत्मा को पवित्र बनाना पड़ता है। महाप्रलय के बाद सब नष्ट हो जाते हैं- चंद्र, सूर्य, पृथ्वी, तारे, देव ,ब्रह्मा, विष्णु आदि। केवल शिव शेष रह जाते हैं। नई सृष्टि और नए देव आते हैं।’’ विष्णु जी पुनः शिव के पास गए तथा वृत्तांत बताया। शिव ने प्रलय का चित्र दर्शाकर विष्णु की शंका दूर की। कबीर कहते हैं कि शीश जो कटावे वह हमारे साथ चले। शीश कटाने वाला केतु है। केतु लंगोटी है, शनि संन्यासी । अतः कुण्डली में दोनों का मिलन कर्म संन्यास का द्योतक है। कर्क, मीन एवं धनु राशियों में शनि अध्यात्म देता है। शनि पंचम या नवम में हो तो अपनी पूजा कराता है। चार ग्रह केन्द्र में और उनमें एक स्वगृही संन्यास का कारक है। नवमेश और दशमेश साथ हों या परिवर्तन योग हो तो धर्म-कर्म योग बनता है तथा व्यक्ति आध्यात्मिक होता है। द्वादश में शनि या केतु या गुरु संन्यास की तरफ प्रवृत्त करता है। शनि केतु बारहवें भाव में संन्यासी बनाते हैं। शनि और गुरु एक साथ कहीं भी हों तो व्यक्ति आध्यात्मिक होता है। प्रस्तुत उदाहरणों में, कृष्ण की वृश्चिक राशि में, शंकराचार्य की धनु राशि में, जीसस की मीन राशि में, रामानुजाचार्य की धनु राशि में, चैतन्य की वृश्चिक राशि में, रमण की मीन राशि में शनि स्थित है। शनि की यह स्थिति ऊपर लिखे नियमों की पुष्टि करती है। विवरण तालिका में महापुरुषों के चक्रों का उल्लेख किया गया है। जिनसे उपरोक्त नियम सिद्ध होते हैं। बिना शनि के कोई महापुरुष नहीं बन सकता है। शनि स्वयं ज्योतिषी है। बुध के साथ गुरु हो तो शनि के आशीर्वाद से जातक ज्योतिषी होगा। शनि के कारण ही आज ज्योतिष का प्रचार-प्रसार बढ़ा है तथा जन साधारण अपने कष्टों के निवारण हेतु ज्योतिषी के पास आते हैं। शनि ही प्रेरणा देता है ज्योतिषी के पास जाने की। शनि की अंतर्दशा एवं शुक्र की दशा में ज्योतिष की विश्वविद्यालय स्तर पर शिक्षा देने की मान्यता मिली तथा सर्वोच्च न्यायालय ने इसे उचित बताया। कहावत है कि शनि शत्रु कम मित्र अधिक है। यह तपा कर मनुष्य को कुन्दन जैसा खरा बना देता है। 23 महापुरुषों के चक्र दिए गए हैं जिनमें शनि, केतु एवं गुरु ग्रह 4,8,11,12,9 की राशियों में स्थित हैं। अधिसंख्य जन्म 4,7,11,9 लग्नों में हुआ है जो आध्यात्मिक राशियां हैं। आइय,े इस पुष्टिकर्ता, दण्डकर्ता, धर्मकर्ता, न्यायकर्ता एवं संन्यासकर्ता से प्रार्थना करें कि वह भूलोक में सर्व दुःख हरण कर सभी को सुखी, निरोग, एवं कल्याणपरक बनाएं। सर्वे भवन्तु सुखिनः सर्वे सन्तु निरामयाः। सर्वे भद्राणि पश्यन्तु म कश्चिद दुःखभागभवेत्।। त


ज्योतिष - एक विज्ञान  जनवरी 2005

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