विभिन्न रेखाओं के प्रभाव

विभिन्न रेखाओं के प्रभाव  

टुनटुन सिंह
व्यूस : 2662 | अप्रैल 2017

मानस रेखा: मानस रेखा, मातृ रेखा, मस्तिष्क रेखा अथवा बुद्धि रेखा के नाम से प्रसिद्ध यह रेखा उन तीन प्रमुख रेखाओं में एक है, जो प्रायः सभी मानव हथेलियों में पायी जाती हैं। उन तमाम रेखाओं में इस रेखा को वही महत्व प्राप्त है, जो शरीर में मस्तिष्क को प्राप्त है। इस रेखा का जन्म बृहस्पति पर्वत के पास या ऊसके उपर से होता है। अधिसंख्य हथेलियों में जीवन रेखा और मानस रेखा का उद्गम एक ही केंद्र पर देखा जाता है। कभी-कभी यह उद्गम, एक ही न हो कर, अलग-अलग होता है। ये रेखाएं हथेली को दो भागों में विभक्त कर राहु और हर्षल क्षेत्रों को अलग-अलग करते हुए, बुध क्षेत्र के नीचे तक चली आती हैं। इस समूची रेखा को मानस रेखा कहा जाता है। इसे बुद्धि रेखा अथवा प्रज्ञा रेखा नाम से भी जाना जाता है। विभिन्न हथेलियों में इस रेखा के अलग-अलग आकार-प्रकार देखे जाते हैं।

जिस मानव का मस्तिष्क तीव्र, उर्वर तथा क्रियाशील होता है या जो मानव मुख्यतः बुद्धिजीवी होते हैं, उनकी हथेलियों में यह रेखा लंबी, गहरी और स्पष्ट होती है। शारीरिक कार्य करने वाले और दुर्बल मानसिक क्षमता वालों की हथेलियों में यह रेखा धूमिल, अस्पष्ट और दोषयुक्त होती है। इस रेखा के द्वारा मानव की मानसिक क्षमता का विचार किया जाता है। इस रेखा और जीवन रेखा के बीच बनने वाला कोण जितना छोटा होगा, उतना ही मानव स्वभाव में यह चारित्रिक दृढ़ता उत्पन्न करता है। यदि यह कोण बहुत संकीर्ण हो, तो यह मानव स्वभाव में आलस, प्रमाद और निष्क्रियता उत्पन्न करता है। यदि यह रेखा भंग और शाखाओं से युक्त न हो, तो जातक बुद्धिमान, विचारों में निपुण होते हैं। इस तरह की रेखाओं वाले जातक वैज्ञानिक, न्यायाधीश, शोधकर्ता तथा अर्थशास्त्री बनते देखे जाते हैं। यदि उसके विपरीत रेखा भंग शाखा वाली और मलिन, कटी-छटी हो, तो इस प्रकार की रेखा वाले मानव मंदबुद्धि, शंकालु, जन्मजात गूंगे, बहरे, बुद्धिहीन, पागल होते हैं। इनके पागलपन का मुख्य कारण कोई गलत संदेह या भ्रम होता है। यदि यह रेखा छोटी हो, शनि स्थान तक जाए, तो असमय मृत्यु होती है। यदि यह रेखा शृंखलाकार हो, तो मानव भावनाशून्य और अत्यंत चंचल प्रकृति का होता है। यदि यही रेखा लंबी और सूक्ष्म हो, तो विश्वासरहित और धूत्र्त स्वभाव वाला होता है। कुछ हथेलियों में यह रेखा जीवन रेखा के पास उद्गम स्थान से निकल कर, जीवन रेखा को काटती हुई, हथेली के दूसरे छोर पर समाप्त होती है। इस तरह की रेखा वाले जातक को कई बार जीवन में गंभीर दुर्घटनाओं का सामना करना पड़ता है।

कभी-कभी तो इस प्रकार की रेखा प्रबल आत्मविश्वासी बनाती है। ये जातक आर्थिक दृष्टिकोण से दुर्बल, अस्वस्थ रहते हैं। अधिक क्रोध तथा अदूरदर्शिता के कारण ये जीवन में अपना ही अहित कर बैठते हैं। ऐसे लोगों की जीवन रेखा के बराबर चलती हुई मानस रेखा काफी आगे चल कर अपना रास्ता बदल लेती है। इस प्रकार का जातक प्रबल आत्मविश्वासी होता है। वह आर्थिक दृष्टिकोण से भी संपन्न होता है। अधिकांशतः इस प्रकार की रेखा अपराधियों की हथेलियों में पायी जाती हैे। यदि इस प्रकार की हथेलियों में हृदय रेखा न हो, तो जातक अपने जीवन काल में कई बार हत्याएं करते हैं, जिसके परिणामस्वरूप इनका अधिकतर समय जेल की चारदीवारियों में ही व्यतीत होता है। यदि यह रेखा-टेढ़ी-मेढ़ी आगे बढ़ती है, तो जातक जुए अथवा अन्य प्रकार के कार्य जैसे लाॅटरी, सट्टा आदि में अपना सब कुछ गंवा बैठता है। यदि यह रेखा जीवन रेखा के साथ-साथ आगे बढ़ रही हो, अर्थात जीवन रेखा के समानांतर चल रही हो, तो जातक प्रेम में विश्वासघात का शिकार होता है और अंततः इसी विरह में उसकी मृत्यु हो जाती है। यह अगर बुध पर्वत की ओर झुकी हो, तो जातक अपने जीवन काल में कई बार अत्यंत उच्च पद प्राप्त करता है। ऐसा जातक अपनी बौद्धिक क्षमता तथा प्रतिभा और ज्ञान शक्ति के बल पर क्षेत्र विशेष में महत्वपूर्ण पद पर सुशोभित होता है। यदि किसी की हथेली में मानस रेखा, हृदय रेखा की ओर बढ़ती हुई, कई जगह टूटी हो, तो उसको अवश्य उन्माद या मिर्गी का रोग होता है। भावनाओं पर नियंत्रण न होने के कारण वे क्षणिक आवेश में सब कुछ नष्ट-भ्रष्ट कर बैठते हैं। हथेली में हृदय रेखा कमजोर है और यह रेखा अस्पष्ट हो, तो ऐसे मानव को जीवन में किसी भी उम्र में दमा, नकसीर, श्वांस रोग, धड़कन जैसे उपद्रवों से पीड़ित होना पड़ता है। यदि इस रेखा पर कोई छोटा द्वीप हो, तो मृत्यु सन्निपात से होती है।

यह रेखा लंबी हो, मंगल पर्वत और चंद्र पर्वत अविकसित हों, तो मानसिक रोग होने की प्रबल संभावना रहती है। भाग्य रेखा द्वारा सुख-समृद्धि का विचार: भाग्यरेखा का प्रारंभ मणिबंध, जीवन रेखा, मंगल के क्षेत्र और चंद्र के पर्वत में से किसी भी स्थान से हो सकता है। लेकिन यह शनि के पर्वत की दिशा में अग्रसर होता हुआ दिखाई देता है। इस रेखा को शनि रेखा, प्रारब्ध या धन रेखा अथवा तकदीर रेखा के नाम से भी जाना जाता है। यह रेखा अलग-अलग हथेलियों में भिन्न-भिन्न स्थानों से शुरू होती है। यह रेखा सभी हथेलियों में नहीं मिलती है। लेकिन जिन हथेलियों पर यह रेखा मिलती है, उनके भाग्य, भौतिक संपन्नता और जीवन कर्म के विषय में जानकारी प्राप्त करने का यह विश्वस्त माध्यम होती है। सूर्य रेखा के साथ पायी जाने वाली यह रेखा अधिक शक्तिशाली और सौभाग्यशाली मानी जाती है और नर-नारी को मान-सम्मान, यश, लाभ, वंश, वैभव प्रदान करती है। इस रेखा द्वारा आर्थिक संदर्भ में नर-नारी के जीवन में होने वाले परिवर्तनों का संकेत भी मिलता है। जिन हथेलियों में यह रेखा नहीं होती, वे प्रायः अपनी मनोकामनाओं की पूर्ति के लिए जीवन भर भटकते फिरते हैं और संतुष्टि की खोज में कठोर परिश्रम भी करते हैं। परंतु परिणाम अशांतिकारक ही होता है। किंतु इस रेखा की अनुपस्थिति का अर्थ दुर्भाग्य या असफलता नहीं है। ऐसे नर-नारी को इस रेखा की पूर्ति अपने पुरुषार्थ और परिश्रम से करनी होती है।

यह रेखा जितनी ही अधिक गहरी, सुंदर, स्पष्ट और गुलाबी रंग की आभा से युक्त होगी, उनका भाग्य उतना ही श्रेष्ठ होता है। अन्य रेखाएं चाहे कितनी भी निर्बल, दोषयुक्त हों, परंतु गुरु पर्वत तथा यह रेखा पूर्ण निर्दोष हो, तो ऐसे जातक को भूमि, भवन, वाहन तथा प्रचुर धन प्राप्ति के माध्यम प्राप्त होते हैं और वे सुशिक्षित, उच्चाधिकारी, राष्ट्रपति, प्रधानमंत्री, राज्यपाल, मुख्यमंत्री एवं किसी संस्था के महत्वपूर्ण पद पर आसीन होते हैं। ऐसे जातक का जीवन संतोषमय व्यतीत होता है और उनकी आर्थिक स्थिति प्रायः सुदृढ़ होती है। उनको कार्यों में, थोड़े से प्रयत्न से ही, पूर्ण सफलता प्राप्त हो जाती है। परंतु, यदि इसके विपरीत, यह रेखा बहुत क्षीण, कटी-फटी, निर्बल और दोषयुक्त होगी, तो जातक के जीवन में धन का सदैव अभाव बना रहता है और अनेक बार आर्थिक असफलताओं का मुख देखना पड़ता है। इनको जीवन में कभी भी सुख-शांति प्राप्त नहीं होता। भाग्य रेखा तभी शुभ मानी जाती है, जब वह शनि पर्वत तक पहुंच कर रुक जाए। यदि यह मध्यमा अंगुली तक पहुंच जाए, तो विपरीत फल देने लगती है। कुछ जातकों की हथेली में यह रेखा बहुत छोटी होती है और स्पष्ट दृष्टिगोचर नहीं होती, फिर भी ऐसे जातक जीवन में कई बार महत्वपूर्ण सफलता पाने में कामयाब होते हैं। ऐसी स्थिति में कुछ महत्वपूर्ण बातों की ओर ध्यान देना आवश्यक है।

हाथ का आकार-प्रकार आदि लंबा और देखने में सुंदर हो, तो उपर्युक्त रेखा, दोषयुक्त होते हुए भी, शुभ फलकारक मानी जाती है। इस रेखा पर जितनी ही आड़ी-तिरछी रेखाएं होती हैं, उनके जीवन में उतनी ही बार बाधाओं का साथ-साथ चलना एक अशुभ लक्षण है। ऐसे जातक आर्थिक रूप से काफी कमजोर होते हैं तथा धन के अभाव में निराश और हताश रहते हैं। ऐसी रेखायुक्त जातक गोमेद, नव रत्न का लाॅकेट, स्फटिक की माला, शनि कवच का लाॅकेट अवश्य धारण करें। ऐसे जातक कभी-कभी अनैतिक कार्य भी कर बैठते हैं, जिसके परिणामस्वरूप उन्हें जेल की चारदिवारी के अंदर दिन काटने के लिए मजबूर होना पड़ता है। अतः ऐसा जातक मूंगा और गोमेद अवश्य धारण करे। वे खतरनाक चीजों, जैसे अस्त्र-शस्त्र, विस्फोट सामग्री, विष, मादक पदार्थ आदि के कार्यों से विशेष लाभ अर्जित करते हैं। इस तरह की रेखा वाले कुछ जातक न्यायाधीश, पुलिस, सेनापति, प्रशासनिक अधिकारी होते देखे गये हैं। मध्यमा अंगुली में 5 या 6 लकीरें हों, भाग्य रेखा मंगल पर्वत से उठ कर मध्यमा उंगली तक पहुंच गयी हो, तो ऐसे नर-नारी अपने जीवन काल में कानून के प्रभाव से जेल यात्रा करते रहते हैं, जिसके कारण वे उदास, निराश होते देखे गये हैं। यदि यह मंगल पर्वत के आस-पास आ कर रुक जाए, तो ऐसे जातक को शिक्षा के क्षेत्र में विशेष सफलता प्राप्त होती है।

परंतु मंगल क्रूर, घातक, विध्वंसक होने के कारण कभी-कभी घातक घटना चक्र भी उपस्थित करता है, जिससे कभी-कभी ऐसे लोग रण भूमि में शहीद हो जाते हैं। यह अति शुभ और अशुभ दुर्योग चिह्न है। यदि भाग्य रेखा चंद्र पर्वत से उठ कर शनि पर्वत को जाए, तो जातक पानी के जहाज संबंधी कार्य, घी, चीनी, चावल, तेल आदि का व्यापार तथा योजना विभाग, न्यायालय, सूचना एवं प्रशासन विभाग में नौकरी या व्यापार से अपना जीविकोपार्जन करते हैं। परंतु उन्हें आंख, नाक, गला एवं फेफड़े से संबंधित छोटी-मोटी बीमारी होने की आशंका रहती है। यह रेखा मणिबंध संधि से उठ कर मानस रेखा पर रुक जाए, तो व्यक्ति अपनी शक्ति का गलत मूल्यांकन करता ंहै, जिसके कारण वह अपने सुख-सौभाग्य को अपने ही हाथों से दुर्भाग्य में बदल देता है और पछताता है। लाखों-करोड़ों का स्वामी भी कुछ ही दिनों में खाकपति बन कर बैठ जाता है तथा चिंता, भय निराशा, निरुत्साह जैसी दुष्प्रवृत्तियां उसे हर समय घेरे रहती हैं और आंतरिक क्षमताओं को नष्ट-भ्रष्ट कर, उसको दयनीय स्थिति में पहुंचा देती हैं। कई बार दुष्प्रवृ़ित्तयों के कारण जीवन में मनोमालिन्य और विरोधाभासी स्थिति पैदा हो जाते हैं।

हताशा और निराशा की गंभीर स्थिति में ऐसे लोग आत्महत्या कर बैठते हैं। इस तरह की रेखा ज्यादातर ऐसे लोगों में पायी जाती है, जो, थोड़े से प्रयास से ही, लाखों-करोड़ों के स्वामी बन जाते हैं। हृदय रेखा का महत्व: यह रेखा अंग्रेजी में ‘हार्ट लाइन’ और हिंदी में हृदय रेखा या भावना रेखा के नाम से प्रसिद्ध है। यह रेखा मानस रेखा से ऊपर गुरु पर्वत, गुरु और शनि के पर्वतों के मध्य से, अथवा शनि के पर्वत से प्रारंभ हो कर, शनि, सूर्य और बुध के पर्वतों की निचली सीमा बनाती हुई, पाश्र्व भाग में बुध और ऊध्र्व मंगल के बीच में समाप्त होती है। हृदय रेखा मनुष्य के भावनात्मक व्यक्तित्व का प्रतिनिधित्व करती है और शरीर, चरित्र तथा स्वभाव की उन तमाम वृत्तियों के लिए उत्तरदायी है, जिन्हें हृदय पक्ष के अंतर्गत समझा जाता है। मित्रता, गृहस्थ जीवन में प्रेम, सफलता, असफलता, अन्य मानवों से प्यार, निर्दयता, क्रूरता, बदले की भावना अथवा हर प्रकार के लोभ, मोह, संवेदनशीलता एवं समस्त मानवीय विशेषताओं आदि का अनुमान भी इसी रेखा के द्वारा लगाया जाता है। यह रेखा जितनी गहरी, कोमल, सबल एवं गुलाबी आभा लिए हुए, दोषरहित होगी, मानव उतना ही स्वच्छ हृदय वाला, संवेदनशील, परोपकारी, मानवीय गुणों से ओत-प्रोत, दयालु एवं आदर्शवादी होगा। ऐसे प्राणियों का गृहस्थ जीवन, दांपत्य जीवन एवं सामाजिक जीवन बहुत सफल होता है।

ऐसे मानव अपने जीवन में कई महत्वपूर्ण पद प्राप्त करते हंै। इनके कार्य और विचारों में सामंजस्य रहता है। ऐसे मानव द्वंद्वरहित, शीघ्र निर्णय लेने वाले, अवसर को पहचान कर कार्य करने वाले, अत्यंत कुशाग्र बुद्धि के होते हैं तथा शरीर से हृष्ट-पुष्ट, बलवान, कार्य करने की शक्ति से परिपूर्ण, सामथ्र्य वाले, पराक्रमी, साहसी होते हैं और अनेक यात्राओं के माध्यम से अपने जीवन में सफलता प्राप्त करते हैं। यदि यह रेखा छिन्न-भिन्न, शृंखलायुक्त तथा दोषयुक्त होगी, तो मानव आलसी, कर्तव्यहीन, कामुक, अनैतिक चरित्र का, मांस-मदिरा का सेवन करने वाला होता है और सदैव रक्तचाप, मधुमेह, अनिद्रा और हृदय रोग से पीड़ित रहता है। यह रेखा जहां पर समाप्त होती है, उस स्थान पर यदि इसका झुकाव नीचे की तरफ हो, तो वह मानव अपने जीवन में अपनी इच्छाओं को पूर्ण नहीं कर पाता है। यदि यह रेखा ऊपर की ओर उठी हुई हो, तो पूर्व रेखा के विपरीत, ऐसा मानव अपना लक्ष्य प्राप्त करने में सफल होता है। कुछ हथेलियों में यह रेखा बुध पर्वत के नीचे से प्रारंभ हो कर सूर्य पर्वत पर ही समाप्त हो जाती है। ऐसी छोटी रेखा वाला मानव कुंठाग्रस्त तथा अदूरदर्शी होता है। चिड़चिड़ा स्वभाव, झुंझलाहट तथा दयाहीनता इनके स्वभाव के प्रमुख गुण होते हंै। ऐसे मानव दूसरों की सहायता न कर के, परनिंदा में अधिक संलग्न रहते हैं।

ऐसे मानव मध्यावस्था में हृदय रोग से पीड़ित होते हैं तथा अधिकांशतः रक्तचाप, मानसिक रोग अथवा दिल के दौरे से ही मरते हैं। यदि शनि क्षेत्र से प्रारंभ होने वाली यह रेखा जंजीराकार हो और चैड़ी भी हो, तो मानव विपरीत योनि से नफरत करता है। यदि यह रेखा पीले रंग की हो, तो मानव के मन में प्रेम की भावना जन्म ही नहीं लेती। जब यह रेखा प्रारंभ में दो शाखाओं में विभाजित होती है और एक शाखा बृहस्पति क्षेत्र की ओर तथा दूसरी पहली और दूसरी उंगली की ओर जाती हो, तो यह योग संतुलित, सुखद प्रेम पूर्ण स्वभाव का परिचायक है। ऐसी परिस्थिति में मानव अपने संबंधों में बहुत सुखी और भाग्यशाली होता है। जब करतल में यह रेखा न हो, तो मानव निष्ठुर स्वभाव का और आवेशहीन होता है। यदि शुक्र का क्षेत्र अति विकसित हो, तो मानव अत्यंत कामुक होता है।

ऐसे जातक मांस, मदिरा का सेवन करने वाले और वेश्यागामी होते हैं। यदि यह रेखा टूटी-फूटी हो, तो मनुष्य को प्रेम संबंधों में, किसी भी उम्र में, बहुत दुःख उठाना पड़ता है। ऐसे योगधारक जातक अपने पे्रमी या प्रेमिका को सदा के लिए खो बैठते हैं और वे जीवन में किसी और से फिर प्रेम संबंध स्थापित नहीं करते। हृदय रेखा हल्दी के समान पीत वर्ण की हो, तो मनुष्य यकृत रोग से पीड़ित होता है। जब यह रेखा मानस रेखा से युक्त हो, तो मनुष्य धन का लोभी, हिंसक और ठग होता है। यही रेखा शनि स्थान से उठती हो और शाखाओं से रहित हो, तो मनुष्य अल्पायु होता है और उसकी अचानक मृत्यु होती है तथा यही जब गुरु स्थान से उठे और अत्यंत सूक्ष्म हो, तो मनुष्य अनेक कष्टों से पीड़ित होता है। कभी-कभी यह रेखा बुध पर्वत से शुरू हो कर तर्जनी और मध्यमा के मध्य मंे समाप्त होती है। इस तरह की रेखा वाले मनुष्य गंभीर स्वभाव के, एकांत प्रेमी, अंतर्मुखी, मितभाषी, आत्मकेंद्रित तथा अपने आप में खोये रहने वाले होते हैं। यद्यपि ऐसे मानव निश्चय ही दृढ़, बड़े पराक्रमी और लग्नशील होते हैं, फिर भी इनको इनकी मेहनत के अनुसार सफलता नहीं मिलती। जीवन के मध्य काल तक पहुंचते- पहुचंते इस प्रकार के मानव अपने आप से ही ऊबने लगते हैं। संघर्ष, असफलता और एकांतप्रियता के कारण ये बुरी तरह कुंठाग्रस्त हो जाते हैं।

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