प्रश्न शास्त्र

प्रश्न शास्त्र  

प्रश्न शास्त्र का आधार क्या है? प्रश्न कुंडली बनाने के लिए तिथि, समय और स्थान कौन सा लिया जाना चाहिए और क्यों? प्रश्न कुंडली के विश्लेषण हेतु किन-किन सिद्धांतों का पालन करना चाहिए? प्रश्न विचार हेतु कृष्णमूर्ति पद्धति के सिद्धांत क्या है और यह पद्धति किस हद तक सक्षम है? उत्तर: हिंदू पौराणिक कथाओं के अनुसार ब्रह्माजी, विष्णु भगवान के पास भविष्य से संबंध रखने वाली चिंताओं के समाधान हेतु प्रश्न सीखने की इच्छा से गये, तब से प्रश्नशास्त्र की उत्पत्ति मानी गयी है। प्रश्न शास्त्र के द्वारा भविष्य सुनियोजन के लिए सही दिशा में सलाह देना, यथा शक्ति प्रयत्नों के लिए मार्ग बतलाना है। बहुत से व्यक्ति अपने प्रयासों को एक दिशा में रखते हुए कार्य करते हैं। लेकिन वहां सफलता नहीं मिलती है तो मार्ग बदलने को विवश हो जाते हैं। ऐसे में यदि उन्हें पहले ज्योतिषीय मार्गदर्शन मिल जाता है तो उनके जीवन का स्वरूप कुछ और ही होता। एक व्यक्ति अपना भाग्य उचित क्रिया प्रयासों कर्मों से बदल सकता है। भाग्य कभी भी निर्धारित नहीं है। हमारे वर्तमान कर्म ही भाग्य को अच्छे कर्मफल की सीमा में बदल सकते हैं। प्रश्न शास्त्र की आवश्यकता एवं आधार प्रश्न शास्त्र की आवश्यकता जब महसूस की गयी तब जातक का जन्म समय, जन्म तिथि तथा जन्म स्थान उपलब्ध नहीं हो पाता था तथा शुद्ध कुंडली का अभाव पाया गया ऐसे में सही फल कथन मुश्किल था। ज्योतिष, वेदांग के छः अंगों में से एक है जिसमें शिक्षा, कला, निरूक्त, छंद, व्याकरण तथा ज्योतिष है। ज्योतिष में गणित, संहिता तथा होरा तीन स्कन्ध है। 1. प्रथम स्कंध - गणित- इसमें खगोल विज्ञान और ज्योतिष गणित है। 2. द्वितीय स्कंध - संहिता-इसमें प्राकृतिक तथा भूकंप, मौसम, अकाल महामारी है। 3. तृतीय स्कंध - होरा- इसमें जातक की जन्मकालीन फलित ज्योतिष का वर्णन होता है। बाद में ज्योतिष को छः स्कन्धों में बांटा गया जो गणित, संहिता, होरा, शकुन, मुहूर्त और प्रश्न है। 4. चतुर्थ स्कन्ध - इसमें शकुन या पूर्वाभास, भविष्य में घटने वाली घटनाओं तथा तथ्यों का प्रभाव का समावेश है। 5. पंचम स्कन्ध: इसमें मुहूर्त (नक्षत्र, तिथि, वार, योग करण) अनुकूल समय ज्ञान करने के लिए 6. षष्ठ स्कंध: इसमें प्रश्न, घटना विचार के समय कुंडली से जानकारी ले लेना शामिल है। इस प्रकार प्रश्न शास्त्र छठा स्कंध है, इसमें घटना की सटीक भविष्यवाणी की जा सकती है, लेकिन जन्मकुंडली का महत्व भी कम नहीं है। जब जन्मकुंडली में कोई घटना प्रत्याशित हो और प्रश्न कुंडली में उसकी पुनरावृत्ति होती हो तो घटित होना निश्चित है। जन्मकुंडली और प्रश्नकुंडली का आंतरिक संबंध पिछले तथा वर्तमान कर्मों की स्थिति दर्शाता है। जन्मकुंडली पर ग्रहों का शुभ प्रभाव पिछले जन्म के अच्छे कर्मों की ओर संकेत करता है। जबकि अशुभ प्रभाव बुरे कर्मों को बताता है। जन्मकुंडली में अच्छी दशा और प्रश्न कुंडली में बुरा समय वर्तमान जीवन में प्रबल अशुभ कर्मों को दर्शाता है। यदि जन्मकुंडली में एक अशुभ दशा और प्रश्न कुंडली में अच्छा समय वर्तमान शुभ कार्यों को दर्शाता है। दोनों कुंडलियों का अच्छा, बुरा समय पूर्व जन्म के अच्छे बुरे कार्यों का संबंध है। प्रश्न कुंडली के लिए तिथि, समय स्थान क्या हो ? प्रश्नकुंडली बनाते समय तिथि, समय और स्थान के लिये ठीक उसी सिद्धांत को अपनाया जाना चाहिए जिस प्रकार किसी जातक की कुंडली बनायी जाती है। जन्मकुंडली किसी भी दिन, समय और स्थान पर बनायी जाये लेकिन उसके लिये जन्म तिथि, समय और स्थान वही लिया जाता है जो वास्तविक होता है। इसी प्रकार प्रश्नकुंडली बनाते समय भी प्रश्न का जन्म समय, तिथि और स्थान वही लिये जाने चाहिये जिस समय जातक के मन में प्रश्न जन्म लेता है। क्योंकि यह वह समय और स्थान होता है जब ग्रह जातक के मन को प्रश्न के लिये स्पंदित करता है। उसके पश्चात प्रश्नकुंडली बनाने के लिये गणना क्रिया किसी भी समय की जा सकती है। परंतु प्रश्न का समय और स्थान पहले वाला ही लिया जाना चाहिए, जब प्रश्न ने जन्म लिया था। इसके विपरीत कुछ ज्योतिषीयों का मानना है कि प्रश्न कुंडली बनाने के लिए तिथि, समय तथा स्थान वह लिया जाना चाहिए जहां पर प्रश्न किया गया है। प्रश्न कत्र्ता जब ज्योतिषी के पास प्रश्न करने आये तब का समय लिया जाना चाहिए चाहे प्रश्नकत्र्ता ने यह प्रश्न अपने मन में कभी ही सोच लिया हो। दूरभाष पर किये गये प्रश्न समय भी वही लिया जाना चाहिए। जब प्रश्नकर्ता का फोन ज्योतिषी के पास आता हो या ज्योतिषी के अनुपस्थिति में उसके घर पर आया हो। पत्र प्राप्ति के मामले में प्रश्न का समय वह होगा जब ज्योतिष को वह पत्र प्राप्त होवे। स्थान के मामले में जहां ज्योतिषी प्रश्न कुंडली तैयार करे तथा फलित करे वह स्थान लिया जाना चाहिए। वास्तव में जब जातक विदेश में हो और प्रश्न दिल्ली में पूछ रहा हो तो हमें प्रश्नकुंडली बनाने के लिये वहीं की तिथि, समय और स्थान लेना चाहिए, जिस प्रकार जन्मकुंडली का विवरण लिया जाता है। कोई व्यक्ति भारत में किसी और शहर से प्रश्न पत्र द्वारा पूछता है तो भी प्रश्न की तिथि, समय और स्थान जातक को लिखकर भेजनी चाहिए कि कब प्रश्न उसके दिमाग में आया। और जब जातक साक्षात प्रश्न पूछने आया हो तो प्रश्नकुंडली के लिये तिथि, समय और स्थान तत्काल का लिया जाना चाहिए। जहां तक संभव हो, एक बार में सिर्फ एक प्रश्न का ही उत्तर दिया जाना चाहिए। परंतु आपात स्थिति में जब प्रश्नकर्ता एक से अधिक प्रश्नों का उत्तर जानना चाहे तो निम्नलिखित विधि से एक से अधिक प्रश्नों का उत्तर दिया जा सकता है। प्रथम प्रश्न लग्न से दूसरा प्रश्न चंद्रमा से तीसरा प्रश्न सूर्य से चैथा प्रश्न बृहस्पति से पांचवा प्रश्न बुध/शुक्र में से जो बली हो। छठा प्रश्न बुध/शुक्र में से जो बलहीन हो। दक्षिण भारत में ज्योतिषी एक समय में 12 प्रश्नों का उत्तर कुंडली मंे ग्रहों की स्थिति और इसके नवांश के प्रयोग द्वारा करते हैं। प्रथम प्रश्न- लग्न से द्वितीय प्रश्न नवांश लग्न से तृतीय प्रश्न चंद्रमा से चतुर्थ प्रश्न नवांश चंद्रमा से पंचम प्रश्न सूर्य से षष्ठम प्रश्न नवांश सूर्य से सप्तम प्रश्न बृहस्पति से अष्टम प्रश्न नवांश बृहस्पति से नवम प्रश्न शुक्र/बुध जो बली हो दशम नवांश शुक्र/बुध जो बली हो एकादश प्रश्न बुध/शुक्र जो बलहीन हो द्वादश प्रश्न नवांश बुध/शुक्र जो बलहीन हो। सामान्यतया एक प्रश्नकर्ता के विविध प्रश्नों का उत्तर विभिन्न भाव कार्येश और कारक से कर सकते हैं। यदि दूसरा प्रश्नकर्ता भी उसी समय (लग्न के समय) आ जाये तो हमें उस प्रश्न को चंद्र लग्न से विश्लेषित करना चाहिए। यदि तीसरा प्रश्नकर्ता आता है तो हम उसके सभी प्रश्नों का उत्तर सूर्य लग्न से दे सकते हैं और इसी तरीके से बृहस्पति, शुक्र और बुध जो बली हो के अनुसार कर सकते हैं। प्रश्न शास्त्र में विश्लेषण के लिए दृष्टियां तथा योग द्रष्टियां: प्रश्न शास्त्र में ताजिक दृष्टियां भी होती हैं जिनका विवरण निम्न प्रकार है। 1. प्रत्यक्ष मित्र दृष्टि - 5, 9 2. गुप्त मित्र दृष्टि - 3, 11 3. प्रत्यक्ष शत्रु दृष्टि 1, 7 4. गुप्त शत्रु दृष्टि 4, 10 5. सम/तटस्थ दृष्टि - 2, 12, 6, 8 ग्रहों की एक-दूसरे से 3, 5, 9 तथा 11 स्थानों पर दृष्टियां मित्र दृष्टियां मानी गयी हैं तथा 1, 4, 7 और 10 स्थानों पर शत्रु दृष्टियां तटस्थ/सम दृष्टियों को दृष्टि नहीं माना गया है। ग्रहों का दीप्तांश ग्रहों के प्रभाव क्षेत्र को दीप्तांश कहते हैं। इसमें दोनों ग्रहों की एक ही राशि में होना अनिवार्य नहीं है। इन ग्रहों का एक दूसरे से 3, 5, 9, 11 स्थिति में होने पर मित्र तथा 1, 4, 7, 10 होने पर शत्रु दृष्टि में दीप्तांश सीमा में होने पर माने जाते हैं प्रत्येक ग्रह की दीप्तांश इस प्रकार है। योग: लग्नेश की अन्य ग्रह के साथ ताजिक दृष्टि तीन प्रकार की होती है। इशराफ, इत्थसाल और पूर्ण इत्थसाल। इशराफ: यह पिछली घटना को सूचित करता है कि कुछ ना कुछ घटित हो चुका है। चंद्रमा का कार्येश के साथ इशराफ हो तब व्यक्ति मन में कुछ निश्चित कर ज्योतिषी के पास आता है। इत्थसाल: यह भविष्य की ओर तथा पूर्ण इत्थसाल वर्तमान को दर्शाता है। इकबाल योग: जब सभी ग्रह केंद्र तथा पणफर भावों में हो तो इकबाल योग बनता है। यह योग शुभ परिणाम देता है। इसका प्रयोग जन्म कुंडली, वर्ष कुंडली तथा प्रश्न कुंडली में समान रूप से किया जा सकता है। प्रश्न कुंडली में 8 भाव में कोई भी ग्रह कार्य सिद्धि में बाधा उत्पन्न करते हैं। इन्दुवार योग: जब सभी ग्रह आपोक्लिम भावों (3, 6, 9, 12) में स्थित हो तो यह योग बनता है। ऐसा योग प्रतिकूल परिणाम देता है लेकिन 9 वें भाव में ग्रह शुभ फल प्रदान करता है। इत्थसाल योग: जब शीघ्र गति ग्रह, मंद गति ग्रह के पीछे हो तथा दोनों ग्रहों यानि कि लग्नेश और कार्येश में परस्पर ताजिक दृष्टि हो तथा दोनों ग्रह अपने दीप्तांश सीमा की औसत में हो जैसे सूर्य के दीप्तांश 150 और मंगल के 80 हैं। इन दोनों की औसत 15$8 »1105’ है ये दोनों ग्रह अन्य शर्तों को पूरा करने पर एक दूसरे से 1105’ के भीतर है अतः इत्थसाल योग बनता है। यह भविष्य में घटित होने वाली घटना को सूचित करता है। लग्नेश तथा अष्टमेश बीच इत्थसाल विपत्तियों बाधाओं को दर्शाता है। इशराफ योग: इसक निर्माण तब होता है जब शीघ्र गति ग्रह मंद गति ग्रह से 10 से आगे हो, दोनों की परस्पर दृष्टि हो, दोनों ग्रह अपने दीप्तांश सीमा की औसत में हो। यह योग पिछली घटनाओं को दर्शाता है, यह प्रतिकूल योग है। नक्त योग: जब लग्नेश और कार्येश के बीच कोई परस्पर दृष्टि न हो और ये दोनों एक तीसरे ग्रह से संयुक्त हो तथा औसत दीप्तांश सीमा में हो, यहां तीसरा ग्रह तीव्र गति का होना चाहिए। रद्द योग: इसमें लग्नेश और कार्येश का इत्थसाल हो इनमें से कोई एक वक्री, अस्त, नीच का 6, 8, 12 भाव में हो तो घटना का संबंध दर्शाता है। प्रश्न कुंडली में विभिन्न भाव से भूत, वर्तमान तथा भविष्य का ज्ञान इस प्रकार किया जाता है। भाव 1, 2, 3, 4 वर्तमान का ज्ञान 5, 6, 7, 8 भविष्य का ज्ञान 9, 10, 11, 12 भूत का ज्ञान प्रश्न कुंडली का परीक्षण करते समय निम्न बिंदुओं को दृष्टिगत रखा जाना चाहिए: लग्न में उदित राशियों के अनुसार शीर्षोदय राशि - 3, 5, 6, 7, 8, 11 फल - कार्य सिद्धि के लिए शुभ पृष्ठोदय राशि - 1, 2, 4, 9, 10 फल - समस्याएं, बाधाएं, असफलता उभयोदय राशि - 12 फल - मध्यम फल, प्रयासों से सफलता प्रश्न में उदित चर लग्न वर्तमान स्थिति में परिवर्तन दर्शाती है। जैसे यात्रा के होने, बीमारी के ठीक होने की स्थिति बताती है। चर लग्न पर शुभ ग्रहों की दृष्टि से परिवर्तन निश्चित होता है। अशुभ ग्रहों की दृष्टि होने पर मात्र आशा ही होती है, पूर्ण होना यह निश्चित नहीं होता। प्रश्न में स्थिर लग्न किसी भी परिस्थितियों में कोई बदलाव नहीं बताती जैसे - रोगी है तो ठीक नहीं होगा, यात्रा नहीं होगी इत्यादि। Û प्रश्न में उदित लग्न द्विस्वभाव राशि हो तो कार्य में देरी तथा कठिनाइयां बताती है साथ ही इसके अंश 0-15’ हो तो स्थिति स्थिर होती है यदि लग्न 150-300 के बीच हो तब इसे चर लग्न के निकटतम समझा जाये और उसके अनुसार परिणाम देगा। द्विस्वभाव लग्न दोनों ही स्थिति में देरी एवं प्रयासों के बाद सफलता दर्शाती है बशर्ते की विश्लेषण में कार्य सिद्धि लगती हो। स्थिर कार्य में स्थिर लग्न सदैव शुभ होती है। जैसे व्यवसाय नौकरी, मकान खरीदना आदि। प्रश्न के लिए लग्न में शुभ ग्रह अच्छा होता है तथा लग्न को बल प्रदान करता है, जबकि अशुभ ग्रह प्रश्न के लिए अच्छा नहीं होता। लग्न में एक अशुभ ग्रह विवाद, झगड़ा, न्यायिक मामले में अच्छा माना जाता है। प्रश्न कुंडली में प्रश्नकर्ता लग्न होता है तथा सप्तम भाव विपक्ष का होता है। लग्न में बैठा ग्रह सप्तम भाव को तथा सप्तम भाव में बैठा ग्रह लग्न को शुभ बना देता है। लग्नेश तथा कार्येश का संबंध होना अति आवश्यक लग्नेश लग्न का राशि स्वामी तथा कार्येश संबंधित भाव का स्वामी, जिस भाव से संबंधित प्रश्न है, इनकी दृष्टि या युति भाव फल देने में अनुकूल मानी जाती है। - लग्नेश और कार्येश, लग्न में स्थित हो। - लग्नेश और कार्येश कार्य भाव में स्थित हो। - लग्नेश और कार्येश में परिवर्तन हो। - लग्नेश लग्न को तथा कार्येश कार्य भाव को देखे। - कार्येश लग्न में स्थित होकर लग्नेश को देखता हो। - लग्नेश कार्य भाव में स्थित होकर कार्येश को देखता हो। - लग्नेश कार्य भाव को और कार्येश लग्न पर दृष्टि रखता हो। - लग्नेश कार्येश को तथा कार्येश लग्नेश को परस्पर दृष्टि में हो। - चंद्रमा की लग्नेश, कार्येश से युति हो। - लग्नेश तथा कार्येश एक दूसरे के निकटस्थ ताजिक दृष्टि में हो। प्रश्न की सफलता - प्रश्नकर्ता की इच्छाओं की सामान्य जानकारी हो। - बली भाव की स्थिति देखें। - लग्न में शीर्षोदय राशि हो। - लग्न, लग्नेश, चंद्रमा बली हो तथा शुभ भावों में हो। - लग्न, लग्नेश शुभ ग्रहों द्वारा दृष्ट हो। - केंद्र व त्रिकोण में शुभ ग्रह हो अशुभ ग्रह अन्य भाव में हो तथा 8 वां तथा 12वां भाव ग्रह रहित हो। - अशुभ ग्रह 3, 6, 11 भाव में शुभ होते हैं। - भाव, भावेश तथा कारक को शुभ होना चाहिए। - लग्नेश तथा कार्येश शुभ कर्तरी हो। - शुभ ग्रह 3, 5, 7, 11 में अच्छा परिणाम देते हैं। - शुभ ग्रह मिथुन, कन्या, तुला, कुंभ राशि में होना शुभ । - छठे भाव में शुभ ग्रह शुभ होते हैं। - उच्च, स्वक्षेत्री या मूल त्रिकोण राशि में ग्रह उस भाव के शुभ फल देने में सक्षम होता है। - नौकरी व्यवसाय के लिए दशम/ सप्तम में शुभ ग्रह अच्छा होता है। इन शुभ ग्रहों की दृष्टि भी अच्छी होती है। 1, 2, 5 भाव में शुभ ग्रह, सम्मान और समृद्धिदायक है। प्रश्न की असफलता - पृष्ठोदय लग्न को अशुभ ग्रह देखे तो अशुभ - लग्न लग्नेश तथा चंद्रमा बलहीन हो तो अशुभ - 6, 8, 12 भाव में लग्नेश प्रश्न की असफलता दर्शाता है। 6, 8, 12 भाव के स्वामी लग्न में हो तब भी असफलता। - भाव का स्वामी 6, 8, 12 स्थान पर अपने से चला जाये तो भी अशुभ। - चंद्रमा स्थित राशि स्वामी 6, 8, 12 में हो तो भी अशुभ। - झगड़े न्यायालयों के मामलों को छोड़कर अन्य मामलों में लग्न में क्रूर ग्रह शुभ नहीं। - लग्न से तथा संबंधित भाव से केंद्र त्रिकोण में अशुभ ग्रहों की स्थिति उस भाव के कारकत्व को नष्ट करती है। 8वें तथा 12 वें भाव पर अशुभ प्रभाव व दृष्टि प्रश्न के लिए प्रतिकूल है। - लग्न, लग्नेश, कार्य भाव, कार्येश पाप कर्तरी हो तो असफलता। - नीच, अस्त, शत्रुक्षेत्री ग्रह उस भाव का कारकत्व खत्म करता है। - ग्रह युद्ध के पराजित ग्रह प्रतिकूल परिणाम देते हैं। - सप्तम भाव का उच्च, मूल त्रिकोण अथवा स्वराशि का ग्रह यदि कम अंश का या कमजोर हो तो शुभ परिणाम नहीं दे पाता। - लग्न में चंद्रमा शुभ नहीं। - जन्म लग्न से अष्टम लग्न, प्रश्न लग्न हो तो अशुभ, इसी प्रकार जन्म के चंद्र से प्रश्न चंद्र अष्टम अशुभ होता है। - लग्नेश कार्येश का संबंध न होना, प्रश्न की असफलता है। - लग्न, लग्नेश तथा कार्येश पर वक्री ग्रह की दृष्टि अशुभ होती है। - वक्री ग्रह जिस भाव में स्थित है उसके कारकत्व को नष्ट करता है। वक्री ग्रह: जब वक्री ग्रह शुभ भाव का स्वामी होकर शुभ ग्रह हो तो कार्य की पुनरावृत्ति देती है, जो प्रश्न के लिए शुभ है। जब वक्री ग्रह शुभ भाव का स्वामी होकर अशुभ ग्रह हो तो कार्य की पुनरावृत्ति देती है। बाधाएं तनाव देकर शुभ है। जब वक्री ग्रह 6, 8, 12 भाव का स्वामी होकर शुभ ग्रह हो तो प्रश्न की अनुकूलता समस्या और बाधाओं के कारण संदिग्ध है। जब वक्री ग्रह 6, 8, 12 भाव का स्वामी होकर अशुभ ग्रह हो तो तनाव, बाधाएं कार्य में असफलता देते हैं। कार्य भाव का विश्लेषण लग्न मानकर भी करना चाहिए। विश्लेषण के सिद्धांत लग्नेश तथा कार्येश को संबंध बनाने वाले ग्रह का विश्लेषण में विशेष ध्यान रखा जाना चाहिए साथ ही कुंडली में बनने वाले ताजिक योगों, उनकी दृष्टि, वक्री ग्रह, नीच, अस्त, शत्रु क्षेत्री तथा 6, 8, 12 भाव के स्वामी ग्रहों, राहु तथा केतु ग्रह के निकटतम अंशों की युति दृष्टि भी फलकथन। प्रश्न कुंडली विश्लेषण में महत्वपूर्ण है जिसका वर्णन ऊपर अंकित किया जा चुका है। चंद्रमा का महत्वपूर्ण स्थान है जो एक प्रश्न की मूर्ति की ओर एक मानसिक अभिरूचि तथा इच्छा को सूचित करता है। यदि लग्नेश तथा कार्येश के बीच चंद्रमा का दृष्टि या युक्ति संबंध हो तो सकारात्मक परिणाम सामने आते हैं। इन तीनों का संगम त्रिवेणी का उदगम स्थल बन जाता है। कृष्णमूर्ति पद्धति कृष्णमूर्ति पद्धति के अंतर्गत आरूढ़ निश्चित करने के लिए प्रश्नकर्ता से 1 से 249 के बीच की कोई संख्या पूछकर आरूढ़ राशि सुनिश्चित की जाती है। इसकी सुविधा के लिए कृष्णमूर्ति जी द्वारा एक सारणी तैयार की गयी है। जिसमें राशि स्वामी, नक्षत्र स्वामी तथा उप स्वामी को 12 राशियों को 249 भागों में विभक्त किया गया है। प्रश्न विचार हेतु कृष्णमूर्ति पद्धति के कुछ मुलभूत सिद्धांत निम्नांकित हैं। प्रत्येक नक्षत्र के विंशोत्तरी दशा के अनुपात में नौ भाग किये गये हैं जिन्हें सब अथवा उप-नक्षत्र कहा जाता है। अधिक सूक्ष्म अध्ययन करने हेतु इन उप-नक्षत्रों के भी नौ-नौ भाग किये जाते हैं। इन्हें सब -सब अथवा उप-उप नक्षत्र कहा जाता है। उप-उप-नक्षत्र का उपयोग विशेषकर युगल जातकों की कुंडलियों के अध्ययन में किया जाता है। भारतीय भाव मध्य पद्धति के विपरीत कृष्णमूर्ति भाव प्रारंभ पद्धति प्रतिपादित करते हैं। भाव साधन करने हेतु इन्होंने पाश्चात्य पद्धति को स्वीकार करते हुए ‘राफेल्स टेबल आॅफ हाउसेस’’ के उपयोग पर बल दिया है। प्रश्न के स्वरूप के आधार पर किन भावों का अध्ययन किया जाना चाहिए? इस विषयक निश्चित मत स्पष्ट कर दिया गया है। उदाहरणार्थ-वैवाहिक प्रश्नों के लिए द्वितीय, सप्तम तथा एकादश माता के लिए चतुर्थ एवं पिता के लिए नवम तथा दशम भावों का अध्ययन किया जाता है। उप-नक्षत्र स्वामी कुंडली के आधार पर प्राप्त होने वाले फल दर्शाता है। भावस्थ तथा भावेश ग्रह फल प्राप्ति के मार्गों का संकेत देते हैं। उप-उप नक्षत्र स्वामी के सहयोग से ज्ञात होता है कि कोई घटना घटित होगी या नहीं। इस पद्धति में निश्चित अयनांशों का उपयोग करने की सलाह दी जाती है। अयनांशों की वार्षिक गति 50.2388475 विकला मानी गई है। यथासंभव कृष्णमूर्ति अयनांशों का ही उपयोग करना श्रेयस्कर होता है। किसी भी ग्रह को पूर्णतः शुभ अथवा पूर्णतः अशुभ नहीं माना गया है। सभी ग्रह दोनों ही प्रकार के प्रभाव उत्पन्न कर सकते हैं। समय निर्धारण के लिए सूर्य, चंद्र तथा दशा-अंतर्दशा स्वामियों के गोचर भ्रमण का अध्ययन किया जाता है। कृष्णमूर्ति ग्रहयोगों तथा ग्रहदृष्टियोगों को मान्यता देते हैं। इसमें उच्च ग्रह, स्वक्षेत्र ग्रह, मूल त्रिकोण ग्रह, मित्र क्षेत्र, शत्रु क्षेत्र, नीच ग्रह आदि बातों की अपेक्षा उप-नक्षत्र स्वामी को अधिक महत्व दिया गया है। कुंडली के किसी भी भाव में स्थित वक्री ग्रह को अशुभ नहीं माना गया है। इनका मानना है कि कुंडली में स्थित वक्री ग्रह नपुंसक अथवा बलहीन हो जाता है। इसी प्रकार वक्री ग्रह के नक्षत्र में स्थित ग्रह भी वांछित परिणाम तब तक नहीं देते, जब तक वक्री ग्रह मार्गी नहीं हो जाता। कृष्णमूर्ति पद्धति को आधुनिक प्रश्न ज्योतिष के लिए एक वरदान के रूप में देखा जा सकता है। इस पद्धति की उपरोक्तानुसार अपनी नियमावली है तथा अपने सिद्धांत हैं। उनका ज्ञान हो जाने के बाद यह पद्धति स्वतः स्पष्ट हो जाती है। दूसरे शब्दों में उनके नियम तथा सिद्धांत का ज्ञान हो जाने के पश्चात् यह एक सरल एवं सुगम्य पद्धति है। इनके नियमों का पालन करते हुए तथा इनके सिद्धांतों पर चलते हुए घटित तथा निकट घट रही घटनाओं का विश्लेषण करने हेतु या फिर किसी भी प्रकार के प्रश्न विचार हेतु यह पद्धति लगभग पूर्णतः सक्षम है ा में निपुणता/प्रवीणता हेतु निम्न सिद्धांतों का पालन करना चाहिए। 1. जन्म लग्न, चंद्र लग्न और गुरु लग्न से भी यदि पंचमेश बुध, बृहस्पति, शुक्र के साथ बैठे हों (केंद्र-त्रिकोण-एकादश) तो जातक बड़ा विद्वान होता है। 2. रवि से वेदान्त 3. चंद्र से वैद्यक, काव्य-कुशलता, धार्मिक विचार और अध्यात्म विद्या। 4. मंगल से न्याय एवं गणित 5. बुध से विद्याध्ययन और विद्याग्रहण की शक्ति, वैद्यक। 6. वृहस्पति से विद्या-विकास, वेद, वेदान्त, व्याकरण और ज्योतिष। 7. शुक्र से प्रभाव, प्रभावशाली व्याख्यान शक्ति एवं साहित्य, गायन विद्या। 8. शनि से ज्ञान, अंग्रेजी तथा विदेशी भाषा। 9. शनि और राहु अंतर्राष्ट्रीय (अन्यदेशीय) विद्या। 10. बुध तथा शुक्र से विद्वता, पांडित्य, उहापोह तथा कल्पना शक्ति। ा में निपुणता/प्रवीणता हेतु निम्न सिद्धांतों का पालन करना चाहिए। 1. जन्म लग्न, चंद्र लग्न और गुरु लग्न से भी यदि पंचमेश बुध, बृहस्पति, शुक्र के साथ बैठे हों (केंद्र-त्रिकोण-एकादश) तो जातक बड़ा विद्वान होता है। 2. रवि से वेदान्त 3. चंद्र से वैद्यक, काव्य-कुशलता, धार्मिक विचार और अध्यात्म विद्या। 4. मंगल से न्याय एवं गणित 5. बुध से विद्याध्ययन और विद्याग्रहण की शक्ति, वैद्यक। 6. वृहस्पति से विद्या-विकास, वेद, वेदान्त, व्याकरण और ज्योतिष। 7. शुक्र से प्रभाव, प्रभावशाली व्याख्यान शक्ति एवं साहित्य, गायन विद्या। 8. शनि से ज्ञान, अंग्रेजी तथा विदेशी भाषा। 9. शनि और राहु अंतर्राष्ट्रीय (अन्यदेशीय) विद्या। 10. बुध तथा शुक्र से विद्वता, पांडित्य, उहापोह तथा कल्पना शक्ति। जन्म लग्न, चंद्र लग्न और बुध लग्न से भी यदि बुध दशम भाव से संबंधित हो जो जातक बहुत बड़ा व्यवसायी होता है। 2. जन्म लग्न, चंद्र लग्न और रवि लग्न से भी यदि रवि दशम भाव से संबंधित हो तो जातक बहुत बड़ा अधिकारी होता है। 3. जन्म लग्न, चंद्र लग्न और गुरु लग्न से भी यदि गुरु दशम भाव से संबंधित हो तो जातक बहुत बड़ा राजनेता होता है। जन्म लग्न, चंद्र लग्न और शुक्र लग्न से भी यदि शुक्र दशम भाव से संबंधित हो तो जातक बहुत बड़ा साहित्यकार होता है। 5. जन्म लग्न, चंद्र लग्न और शनि लग्न से भी यदि शनि दशम भाव से संबंधित हो जो जातक बहुत बड़ा सेवक होता है। 6. जन्म लग्न, चंद्र लग्न और मंगल लग्न से भी यदि मंगल दशम भाव से संबंधित हो तो जातक बहुत बड़ा सेनाधिपति होता है। 7. जन्म लग्न, चंद्र लग्न और पुनः चंद्र लग्न से भी यदि चंद्र दशम भाव से संबंधित हो तो जातक बहुत बड़ा कलाकार होता है। स) शासकीय सेवा हेतु निम्न सिद्धांतों का पालन करना चाहिए। 1. दशम भाव से शासकीय अशासकीय सेवा, उद्योग-धंधा, व्यापार-व्यवसाय आदि का स्वरूप ज्ञात किया जा सकता है। 2. द्वितीय षष्ठ एवं दशम भाव से सेवा प्राप्त होने अथवा व्यवसाय प्रारंभ होने का संभावित समय ज्ञात किया जा सकता है। 3. दशम भाव का तृतीय, पंचम अथवा नवम भाव से संबंध बनता हो तो व्यवसाय/सेवा में परिवर्तन की संभावनाएं बढ़ जाती है। 4. सेवा मुक्ति समय हेतु प्रथम, पंचम तथा नवम भाव की ओर ध्यान केन्द्रित किया जाता है। प्रथम, पंचम तथा नवम क्रमशः द्वितीय, षष्ठ तथा दशम भाव के व्यय भाव होते हैं। 5. दशम भाव से बुध का संबंध और बुध की महादशा, अंतर्दशा और प्रत्यंतर दशा भी व्यवसाय प्रारंभ/ सेवा प्राप्ति में सहायक होता है। (द) राजनैतिक सफलता हेतु निम्न सिद्धांतों का पालन करना चाहिए। 1. तृतीय एकादश संबंध अधिकृत उम्मीदवारी के लिए किसी राजनैतिक संस्था से टिकिट उपलब्ध करा सकती है। 2. चतुर्थ भाव से चुनाव स्पद्र्धा में यश प्राप्त हो सकता है। 3. षष्ठ भाव विजय की संभावना में वृद्धि करता है। 4. षष्ठ, दशम और एकादश से अनुकूल परिणाम प्राप्त होते हैं। 5. लग्न-एकादश संबंध से सकारात्मक परिणाम प्राप्त होता है। (स) विवाह विषयक प्रश्नोत्तर हेतु निम्न सिद्धांतों का पालन करना चाहिए। 1. विवाह का कारक-स्त्रियों के लिए गुरु और पुरुषों के लिए शुक्र होता है। 2. तुला राशि वैवाहिक संबंध स्थापित करने और वृश्चिक राशि वैवाहिक मेल-मिलाप हेतु कारक माना जाता है। 3. सप्तमेश या विवाह का कारक षष्ठ, अष्ट या द्वादश भाव में हो तो मतभेद, पृथकत्व तथा तलाक होता है। 4. सप्तमेश बुध हो, सप्तमेश द्विस्वभावी हो या द्विस्वभावी राशि में स्थित हो तो बहु विवाह योग होता है। 5. गुरु/शुक्र, सप्तमेश, द्वितीयेश, नवमेश अथवा दशमेश की सप्तम में स्थिति, दृष्टि तथा युति की दशा, अंतर्दशा, प्रत्यंतर दशा में विवाह हो सकता है। माता-पिता संबंधी प्रश्नोत्तर हेतु निम्न सिद्धांतों का पालन करना चाहिए। 1. चंद्र की केंद्र में स्थिति गांव/मुहल्ले में ही अपने स्थान पर स्थिर है। 2. चंद्र की केंद्र से बाहर स्थिति में व्यक्ति का अपने घर/गांव/मुहल्ले में होना असंभावित। 3. अन्य स्थान स्थित चंद्र के केंद्र में प्रवेश, अन्य राशि में स्थित चंद्र के चर राशि में प्रवेश का समय क्रमशः लौट आने की संभावना, लौट आने के लिए अपने गंतव्य की और खाना हो चुका होगा कि संभावना व्यक्त करता है। 1. चतुर्थ स्थान तथा चतुर्थेश से माता का विचार होता है। 2. नवम/दशम स्थान तथा नवमेश/दशमेश से पिता का विचार होता है। 3. दिन में जन्म हो तो शुक्र से और रात्रि में जन्म हो तो चंद्र से माता का विचार होता है। 4. दिन में जन्म हो तो रवि से और रात्रि में जन्म हो तो शनि से पिता का विचार होता है।



हस्तरेखा विशेषांक  जुलाई 2009

हस्तरेखा विशेषांक में हस्तरेखा का इतिहास, विकास एवं उपयोगिता, विवाह, संतान सुख, व्यवसाय सुख, व्यवसाय, शिक्षा, स्वास्थ्य व आर्थिक स्थिति हेतु हस्तरेखा का विश्लेषण, हस्तरेखा एवं ज्योतिष में संबंध, क्या हस्तरेखाएँ बदलती है, भविष्य में बदलने वाली घटनाओं को हस्तरेखाओं से कैसे जाना जाए इन सभी विषयों को आप इस विशेषांक में पढ़ सकते है.

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