हस्तरेखा का इतिहास, विकास और उपयोगिता

हस्तरेखा का इतिहास, विकास और उपयोगिता  

हस्तरेखा का इतिहास विकास उपयोगिता! उमा कपूर अति प्राचीनकाल से मनुष्य अपने भविष्य का पूर्वानुमान करने और जीवन में आने वाले संकटों से बचाव करने का प्रयत्न करता रहा है। हस्तरेखा शास्त्र ज्ञान को विज्ञान के साथ-साथ एक कला के रूप में अनादिकाल से माना जाता रहा है। इतिहास कहलाने के लिए किसी कथन के साक्ष्य और प्रभाव आवश्यक हैं। जो सर्व-प्रथम प्रमाण हमें इस विषय में मिलता है, वह है ऋषि बाल्मीकी द्वारा रचित रामायण। पुनः भारत के कुछ आधुनिकतावादी तो राम के अस्तित्व को ही मानने से इन्कार कर देते हैं। तब भी बाल्मीकी ऋषि द्वारा रचित रामायण संसार का प्रथम महाकाव्य एवं संस्कृत भाषा जिसमें यह लिख गई संसार की प्राचीननतम लिपिबद्ध एवं सबसे समृद्ध भाषा मानी जाती है। रामायण में वर्णित यहां कुछ संदर्भ उद्धृत हैं। तथापि च महाप्राज्ञ ब्राह्मणानां मयाश्रुतम्। पुरापितृगहे सत्यं वस्तव्यं किल में वने।। संदर्भ- (अयोध्याकाण्ड एकोनत्रिंशः सर्गः) सीताजी रीराम के समक्ष उनके साथ अपने वनगमन का औचित्य बताना चाहती हैं, जबकि राम उन्हें अयोध्या में ठहरने की सलाह देते हैं। अर्थ- महाप्राज्ञ! यद्यपि वन में दोष और दुःख ही मरे हैं, तथापि अपने पिता के घर पर रहते समय मैं ब्राह्मणों के मुख से पहले यह बात सुन चुकी हूं कि, ‘मुझे अवश्य ही वन में रहना पड़ेगा’ यह बात मेरे जीवन में सत्य होकर रहेगी। (बा.रा.-अका-29वां सर्ग-8वां पद्यांश) लक्षणिम्यो द्विजातिम्यः श्रुत्वाहं वचनं गृहे। वनवाकृतोत्साहा नित्यमेव महाबल।। (9वां पद्यांश) अर्थात्-महाबली वीर! हस्तरेखा देखकर भविष्य की बातें जान लेने वाले ब्राह्मणों के मुख से अपने घर पर ऐसी बात सुनकर मैं सदा ही वनवान के लिए उत्साहित रहती हूं। आदेशो वनवासस्य प्राप्रत्यः स मया किल। सा त्वया सह भत्रहिं यास्यामि प्रिय नान्यथा।।10।। कृतादेशा भविष्यामि गतिष्यामि त्वया सह। कालश्चायं समुत्पन्नः सत्यवान् भवतु द्विजः।।11।। अर्थात्- ‘प्रियतम! ब्राह्मण से ज्ञात हुआ वन में रहने का आदेश एक न एक दिन मुझे पूरा करना ही पड़ेगा, वह किसी तरह पलट नहीं सकता। अतः मैं स्वामी आपके साथ वन में अवश्य चलूंगी’।।10।। ‘ऐसा होने से मैं उस भाग्य के विधान को भोग लुंगी। उसके लिए यह समय आ गया है; अतः आपके साथ मुझे चलना ही है। इससे उस ब्राह्मण की बात भी सच्ची हो जाएगी।।11।।’ कन्यया च पितुर्गेहे वनवासः श्रुतो मया। मिक्षिण्याः शमवृŸााया मम मातुरिहाग्रतः।।13।। अर्थात - पिता के घर पर कुमारी अवस्था में एक शांति परायणा भिक्षुकी के मुख से भी मैंने अपने वनवास की बात सुनी थी। उसने मेरी माता के सामने ही ऐसी बात कही थी। स्पष्ट है सीताजी एक अयोनिजा कन्या हैं, जो राजा जनक को एक खेत में हल चलाते समय मिली थीं, अतः उनके विषय में जो भी भविष्यवाणियां की गई होंगी उनका आधार हस्तरेखा शास्त्र ही रहा होगा। पश्चिमी इतिहास में भी रोमन सम्राटों के राज महलों में जिप्सी जाति के वो लोग जो हस्त रेखा देखकर भविष्य बताते थे, बहुत आदर के पात्र होते थे और राजा से सीधे मिलकर अन्य युद्ध करने व अन्य बातों पर सलाह दिया करते थे। नंद वंश को समल नष्ट कर चंद्र गुप्त के द्वारा एक अखण्ड साम्राज्य का निर्माण कराने वाले आचार्य चाणक्य ने अपनी नीति में राजा को परामर्श देते हुए जासूसों की सूची में ऐसे व्यक्तियों को सम्मिलित करने के लिए कहा है, जो भिक्षु-भिक्षुणियों आदि के रूप में हस्त रेखा आदि देखकर व भविष्य बताकर दूसरे राजाओं की युद्ध नीति, खजाना व सैन्य बल को सूचना दे सकें। पश्चिम के प्रसिद्ध हस्त रेखा शास्त्री कीरो की 1937 में प्रकाशित पुस्तक में उसने आमुख में यह स्वीकार किया है, कि उसका समस्त ज्ञान भारत की देन है। भारत में उसने अपनी दस वर्ष से अधिक की यात्रा में पहाड़ों की गुफाओं, मंदिरों एवं गांवों में भोज पत्र पर लिखि गई अनेक पाण्डुलिपियों को देखा व हस्त रेखा का ज्ञान प्राप्ति किया। उसने पहाड़ों पर रहने वाली जोशी नाम की एक जाति के विषय में बताया है, जो लोग गांव-गांव में भविष्य बताने का काम किया करते थे। उसने यह भी लिखा है कि कुछ गांव में एकाध व्यक्ति ही ऐसा होता था, जो पुस्तक की भाषा को पढ़कर समझा सकता था। विदेशी शासन के दौरान या तो वो पुस्तकंे नष्ट हो गई अथवा अब भी किन्हीं परिवारों में गोपनीय विधि से रखी हैं। प्रत्येक व्यक्ति के जीवन का इतिहास हाथ की रेखाओं से पढ़ा जा सकता है। विशेष रूप से उन सभी घटनाओं का संपूर्ण विवरण हथेली की रेखाओं से पढ़ा जा सकता है।, जिन घटनाओं ने हमारी संवेदनाओं को प्रभावित किया है तथा ऐसी आगे होने वाली घटनाओं के विषय में भी पर्याप्त जानकारी इन रेखाओं में मिल जाती है, जो किसी न किसी कारण से हमारी अन्तचेतना से से जुड़ी है। संभवतः इसका कारण यह है कि मनुष्य के मस्तिष्क के अतिरिक्त हाथ ही ऐसा शरीर का भाग है जिसमें सबसे अधिक (नर्वस) संवेदी कोशिकाएं पाई जाती हैं। जैसे ई. सीजी. की रिपोर्ट आड़ी, टेड़ी रेखाएं हमारे लिए कुछ अजीव सी आकृति के अतिरिक्त कुछ नहीं, लेकिन एक कुशल हृदय-रोग विशेषज्ञ बिना बीमार को देखंे, सिर्फ ई. सी. जी. की रेखाओं को पढ़कर यह जाना जाता है, कि बीमार के हृदय में क्या कोई खराबी है अथवा बिल्कुल स्वस्थ है। एक प्रकार से हस्त-रेखाएं हमारे मस्तिष्क का वह ग्राफिक चित्रण हैं, जो अनेक वार एक कुशल भविष्य वक्ता को उन घटनाओं के विषय में सावधान कर देता है, जो आगे चलकर व्यक्ति के जीवन केा प्रभावित करंेगी। मानव मस्तिष्क की समस्त शक्तियों का लगभग 100 प्रतिशत प्रयोग साधारण व्यक्ति कर पाता है, जबकि 40 प्रतिशत तक प्रयोग करने वाला व्यक्ति विश्व प्रसिद्ध वैज्ञानिक, दार्शनिक, लेखक आदि होता है, ऐसा वैज्ञानिक शोध से निर्णय हुआ है और आज भी इस दिशा में देश-विदेश में अनेक शोध किये जा रहे हैं, विशेष रूप से मस्तिष्क संबंधी रोगों की पूर्व-पहचान करने के लिए। अतः भारत भारत के प्राचीन मनीषियों ने विभिन्न शोध करके हस्त रेखाओं के अतिरिक्त हथेली पर मिलने वाले छोटे से छोटे चिह्नों यहां तक कि मामुली तिलों तक से मनुष्य के जीवन की विधियों को किसी न किसी रूप में हम तक पहुंचाया है। भले ही वह पुस्तकें हमें उपलब्ध नहीं, लेकिन एक विदेशी के लिखे गं्रथ में उनका विस्तृत विवरण हमारे सामने है। प्रश्न यह उठता है कि जब हमारे पास भविष्य कथन की अनेक विधियां जैसे प्राशर, जैमिनी, वराह मिहिर आदि की पर्याप्त सामग्री उपलब्ध है, तो हस्त रेखा विज्ञान के विकास की क्या उपयोगिता है? इसके उŸार में अनेक प्रमुख कारणों में से कुछ इस प्रकार हैं- आज भी ज्योतिषी इस बात पर एकमत नहीं हैं, कि बालक के जन्म का कौनसा समय उपयुक्त माना जाए। गर्भाधान का समय जब बालक या बालिका का सर माता के गर्भ से बाहर आया। जब पूरा शरीर बाहर आया। नाल-छेदन का समय का समय जब वह माता के शरीर से अलग अस्तित्व में आया। इसके अतिरिक्त हजारों वर्षों पूर्व आज जैसी घड़ियों के अभाव में बच्चे के जन्म के सही समय की गणना करना इतना सरल न था, तब ही हस्त रेखा शास्त्र ने प्रगति की जहां न किसी गणना की आवश्यकता है, न ग्रहों नक्षत्रों की स्थिति या गोचर को देखना। बस मुट्ठी खोलते ही व्यक्ति का भूत, भविष्य, वर्तमान सब कुछ एक खुली किताब की तरह पढ़ा जा सकता है। आज भी अनेक ऐसे व्यक्ति हैं, जिनके जन्म का समय, दिन आदि का लेखा-जोखा किसी न किसी कारणवश उपलब्ध नहीं। उनके भविष्य जानने के कौतुहल को केवल हस्त रेखा विद् ही शांत कर सकता है। हमारा हाथ हमारे शरीर का एक भाग सदा हमारे साथ है। प्रायः दुःखी, बीमार, परेशान व्यक्ति जिन्हें अपने जीवन की समस्याओं का हल दिखाई नहीं देता किसी भी समय अपना हाथ दिखाकर भविष्य जान सकता है। अधिकतर हस्तरेखाविद् एक मनोचिकित्सक का भी काम करते हैं, क्योंकि यह अध्ययन व भविष्य कथन इतना व्यक्तिपरक होता है, कि सरलता से तुरंत हाथ देखते ही बताया जा सकता है व फल-कथन में त्रुटि की संभावना बहुत कम हो जाती है। इसके विपरीत वैदिक ज्योतिष में फल-कथन करना उतना सरल नहीं। पहले तो सही समय हो, फिर दशा-अंतर्दशा देखो, फिर गोचर देखो, अष्टक वर्ग से देखो, ग्रहों के षड्बल को देखो। दशाएं भी अनेकों हैं, कौनसी दशा-विधि से फल-कथन किया जाएगा। प्राशर व जैमिनी विधि में यदि अलकर फल आया तब क्या? कौनसा सही व कौनसा त्रुटि पूर्ण मानो। इसके अतिरिक्त भी अनेक विद्वानों का यह अनुभव है कि बिना आंतरिक ज्ञान व सूर्य देव, गणपित, देवी सरस्वती की उपासना एवं उनकी कृपा के बिना ज्योतिषी द्वारा की गई भविष्यवाणी में सही कथन का प्रतिशत कभी भी बहुत अधिक नहीं हो पाता। हस्त रेखाओं से भविष्य कथन में आंतरिक-ज्ञान देवी, देवताओं की उपासना, हाथ देखने का समय व स्थान का बहुत महत्व है। अनेक व्यक्तियों के बीच बैठकर हाथ की रेखाओं को पढ़कर कोई तमाशा या आश्चर्य दिखाने का प्रयास किसी भी भविष्य वक्ता के लिए बहुत ही हास्यास्पद स्थिति उत्पन्न करने के साथ-साथ ज्योतिष शास्त्र को लोग हीन दृष्टि से देखने लगते हैं। क्योंकि ऐसे भविष्य वक्ता की भविष्यवाणियां बहुत ही कम सही हो सकती हैं। वो तो ऐसे ही हुआ कि ‘लग गया तो तीर नहीं तो तुक्का’। किसी व्यक्ति की शारीरिक, मानसिक, भावनात्मक, सवेंगात्मक स्थिति का जितनी सरलता व शीघ्रता से हस्त रेखा अध्ययन से पता लगाया जा सकता है उतना अन्य विधि से सम्भव नहीं। आज कम्प्यूटर के आविष्कार ने सरल व द्रुत गति अवश्य दी है, लेकिन हजारों वर्षों से हस्त-रेखा अध्ययन की सरल विधि अन्य विधियों से अवश्य तेज रही होगी। भारत की अधिकांश जन संख्या आज भी दूर-दराज के गांव एवं कस्बों में अधिक रहती है, उनकी समस्याएं भी अधिक होती हैं। उनकी आर्थिक को सरलता से उपलब्ध हस्तरेखाविद् ही होते हैं, जो उनकी निराशा भरी जीवन शैली में उचित भविष्य कथन से आशा की किरण मन में जगा देते हैं। हाथ को दिखाकर भविष्य जानने वाले सावधान रहें। हमारे मन में छिपी भावनाएं, हमारे नैतिक व अनैतिक कृत्य, सही व गलत रास्ते से कमाए धन एवं सभी प्रकार के संबंधों में अंकित होता है, जिसे केवल हम जानते हैं, ओर हमारा परमात्मा या फिर अच्छा हस्तरेखाविद् उन्हें जान सकता है। अतः कई बड़े संस्थानों के मालिक अपनी अत्यंत विश्वस्त पदों पर व्यक्ति की नियुक्ति से पहले हाथ की लिखाई पढ़ने वालों की सलाह देते हैं। कोई आश्चर्य नहीं कि विश्वस्त पदों पर नियुक्ति के लिए किसी हस्तरेखाविद् से भी परामर्श किया जाता हो। चाणक्य से लेकर रोमन सम्राटों ने जिस प्रकार जासूसी के काम के लिए हस्तरेखा के ज्ञान को जानने वालों का सहारा लिया, आज भी इनका प्रयोग किया जा सकता हैं नवजात शिशुओं के हाथ में भी सभी रेखाएं जैसे- जीवन रेखा, मस्तिष्क रेखा, हृदय रेखा, शनि अथवा भाग्य रेखा, विवाह रेखा व सभी अन्य चिह्न जिनमें जाली, त्रिशूल, सितारा, त्रिकोण, चतुष्कोण आदि पूर्ण विकसित अवस्था में पाएं जाते हैं। यह सब उनके पूर्व जन्मकृत कर्मों का संग्रह है, जिसे वो अपने साथ लाता है। नन्हा बच्चा अपनी मुट्ठी में अपनी तकदीर लाता है, जिसे वह कसकर बंद रखता है, उसकी मुठ्ठी खोलकर रेखाओं को पढ़ना पर्याप्त कठिन होता है। जैसे-जैसे बच्चा बड़ा होता जाता है, उसके आस पास का वातावरण उसे प्रभावित करता है, उसके हाथ की रेखाओं में भी परिवर्तन आता जाता है, लेकिन हमारे सारे शरीर की आकृति की तरह हाथ की बनावट, हथेली की लंबाई, चैड़ाई, संतुलित आकृति, अंगुलियों और अंगूठे की बनावट, अंगुली और अंगूठों के ऊपर का हिस्सा, नाखून व उनकी बनावट, उनका व हथेली का रंग आदि में (केवल रंग को छोड़कर) बहुत कम या नगण्य परिवर्तन होता है। अंगूठे व अंगुलियों की बनावट हाथ में पाई जाने वाली मुख्य रेखाअेां का रंग, चैड़ाई, गहराई आदि केवल हमारी ही नहीं, हमारे पूर्वजों तक के विषय में यह स्पष्ट कर देती है, कि वो लोग शारीरिक श्रम करने वाले थे, या कि मानसिक कार्यों से अपनी जीविका चलाते थे। इन सभ्ीा बातों को ध्यान में रखते हुए देशकाल, पात्र, पारिवारिक व्यवसाय, आर्थिक स्थिति, परिवार में पाए जाने वाले मानसिक व शारीरिक गुणों को ध्यान में रखकर ही भविष्य कथन किया जाना चाहिए। अनेंको व्यक्तियों के विषय में किए गए भविष्य कथन ऐतिहासिकाल में सत्य हुए हैं, जैसा कि सीता जी के संबंध में व अन्य भगवान गौतम बुद्ध के संबंध में जो आज से लगभग 2500 वर्ष पूर्व हुए हैं। उनकी हाथ व पांव की बीसांे अंगुलियों में शंख के चिह्न थे; जिनके आधार पर यह भविष्यवाणी की गई थी, कि या तो वे बहुत बड़े सम्राट होंगे अथवा विश्व प्रसिद्ध योगी एवं जीवन के परम लक्ष्य मोक्ष को अवश्य प्रापत करेंगे। (शंख की आकृति अथवा चक्र की आकृति प्रायः मिली-जुली पाई जाती है)। पश्चिमी हस्तरेखाविद् कीरो ने भी अपने संस्मरण में एक ऐसे व्यक्ति का हाल लिखा है, जिसे फांसी की सजा सुना दी गई। फांसी लगने से एक महीने पूर्व उसकी अंतिम इच्छा पूछी गई। उसने जेल में कीरो को बुलाकर अपना हाथ दिखाने की इच्छा व्यक्त की, जिसे पूरा किया गया। उसकी हस्त रेखाओं को देखकर कीरो ने कहा कि इसे फांसी की सजी नहीं सकती। इसका जीवन अभी शेष है तथा इसके हाथ में ऐसा कोई चिह्न विद्यमान नहीं। वो व्यक्ति और सभी हैरान थे, ऐसा कैसे हो सकता है? उसको फांसी लगने से लगभग एक सप्ताह पूर्व अचानक एक व्यक्ति किसी और अपराध के संबंध में पकड़ा गया, जिसके धोखे मंे ंदूसरे व्यक्ति को सजा मिल रही थी। न्यायालय के समक्ष उस व्यक्ति ने अपना अपराध स्वीकार कर लिया एवं फांसी लगने से एक दिन पूर्व व्यक्ति को रिहा कर दिया। आशा है कुशल हस्तरेखाविद् भविष्य में भी ऐसे ही आगे होने वाली घटनाओं को मनुष्यों के हाथों से पढ़कर मानवता के लिए चमत्कार करते रहेंगे।



हस्तरेखा विशेषांक  जुलाई 2009

हस्तरेखा विशेषांक में हस्तरेखा का इतिहास, विकास एवं उपयोगिता, विवाह, संतान सुख, व्यवसाय सुख, व्यवसाय, शिक्षा, स्वास्थ्य व आर्थिक स्थिति हेतु हस्तरेखा का विश्लेषण, हस्तरेखा एवं ज्योतिष में संबंध, क्या हस्तरेखाएँ बदलती है, भविष्य में बदलने वाली घटनाओं को हस्तरेखाओं से कैसे जाना जाए इन सभी विषयों को आप इस विशेषांक में पढ़ सकते है.

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