हस्तरेखाओं द्वारा काल निर्धारण

हस्तरेखाओं द्वारा काल निर्धारण  

हस्तरेखाओं द्वारा काल निर्धारण निर्मल कोठारी मानव जीवन इतना जटिल और पेचीदा है, कि इसे समझना सरल कार्य नहीं। यह भूतकाल से शिक्षा ग्रहण करता हुआ वर्तमान में जीता है, परंतु यह भविष्य से सदैव आतंकित और उत्साहित रहता है। उसके मन में निरंतर एक प्रश्न कौतूहल की तर छाया रहता है कि मेरा भविष्य क्या है? भविष्य में मैं कितना ऊंचा उठ सकूंगा? यदि मेरे जीवन में बाधाएं हैं तो कैसी, कितनी और कब? और यह ‘कब’ प्रश्न हस्तरेखाविद् एवं ज्योतिष के लिए समस्या बन जाती है। वह रेखाओं के द्वारा भावी फल स्पष्ट कर सकता है, भविष्य काल को भी पढ़ सकता है, परंतु सही-सही समय निर्धारण करना उसके लिए अत्यंत कठिन हो जाता है। मैंने इस संबंध में कई पुस्तकों में पढ़ा और इस पुस्तकों की सहायता से कई प्रयोग किए और उन प्रयोगों का फल आश्चर्य जनक था। मैंने देखा कि हस्त रेखाओं के माध्यम से भी सही-सही समय निकाला जा सकता है? यानी भाग्योदय कब होगा? किस प्रकार से होगा? कहा होगा देश या विदेश में? कि तरीकों से होगा? नौकरी कब लगेगी? उन्नति कब होगी? और व्यापार में लाभ कितना और कब होगा? कि वस्तु के व्यापार से लाभ होगा? संतान सुख कैसा रहेगा? पत्न पक्ष कैसा होगा? ससुराल से धन मिलेगा या नहीं? ऐसे सैकड़ों प्रश्नों के उŸार हस्त रेखाविद् बता सकता है और इनका काल भी निर्धारण कर सकता है। काल निर्धारण की विधि पाश्चात्य हसत रेखा-विशेषज्ञों ने समय निर्धारण हेतु सप्तवर्षीय नियम तथा भारतीय विद्वानों ने पंचवर्षीय नियम अपनाया है। परंतु यहां यह प्रश्न उठता है कि इन पूरे पांच वर्षों में एक ही और एक घटना घटित होगी, जबकि जीवन इतना जटिल हो गया है? वस्तुतः हमें कुछ और सुक्ष्मता में जाना होगा। हम जीवन रेखा, हृदय रेखा, मस्तक रेखा, भाग्य रेखा, स्वास्थ्य रेखा, मंगल रेखा,मणिबंध रेखा आदि के बारे में जानते हैं तथा इसके साथ ही साथ प्रभावक रेखाओं के बारे भी जानते हैं। ये छोटी-छोटी सूक्ष्म रेखाएं प्रत्येक रेखा से ऊपर की ओर उठती हुई-सी दृष्टि गोचर होती है। इन्हीं रेखाओं पर अधिक ध्यान दिया जाए, क्योंकि यही रेखाएं प्रतयेक घटना का वर्ष, मास और दिन बताने में समर्थ होती हैं। पर इसके साथ ही साथ ध्रुबांक की भी जानकारी आवश्यक है। प्रत्येक व्यक्ति की हथेली में प्रत्येक रेखा पर ये प्रभावक रेखाएं निश्चय ही होती हैं साथ ही प्रत्येक व्यक्ति का ध्रुबांक अलग-अलग होता है। ध्रुबांक निकालना पुरुष के दाहिने हाथ तथा स्त्री के बाएं हाथ की अंगुलियों के प्रत्येक पोर के 3-3 पोरुओं पर स्थित खड़ी रेखाओं को गिन लिया जाय; पर उन्हीं रेखाओं को गिनना चाहिए, जो स्पष्ट खड़ी, लंबी और पूरी हों; टूटी हुई या बहुत छोटी नहीं। इसके साथ ही अंगूठे अंगूठेके नीचे शुक्र-पर्वत पर स्थित रेखाओं को भी गिनकर उनमें मिला दिया। इन सब रेखाओं के योग को ती गुना करके गुणनफल में से दो घटा दें तथा शेष पीछे बचें, उसमें 96 का भाग दे दें। अवधि वर्ष-मास-दिन निकाल दें। उदाहरणार्थ- यदि किसी व्यक्ति की कुल इस प्रकार की संखाओं का योगरय आया, तो उपर्युक्त रीति के अनुसार 24 को तीन से गुणा किया 72 हुए , इनमें से दो घटाएं, तो शेष 70 रहे, इसमें 96 का भाग देने पर अवधि आठ मास, तेईस दिन (अवधि में वार्डस आये और पीछे जो शेष रहा उसे भी एक दिनमान कर तेरह दिन लिये) आये। यह समय व्यक्ति का न्यून समय कहलाता है। इस समय को उसे भाग देने पर सून्य आता है, अतः उस व्यक्ति का सूक्ष्म समय मास 16 दिन आए। हमें न्यून समय और सूक्ष्म समय को ध्यान में रखना चाहिए। अब उदाहरण के लिए एक चालीस-पचास साल का लगने वाला व्यक्ति हाथ फैलाकर यह पूछता है कि मेरा भाग्योदय कब होगा? इस समय भी ध्रुबांक को ध्यान में रखना है, ध्रुबांक को 32 से गुणा कर 18 का भाग दो तो व्यक्ति का चालू वर्ष-मास निकल आएगा। पूर्व उदाहरण में धुबांक 24 है। इन 24 को 32 से गुणा किया, तो गुणनफल 768 आए। इसमें 18 का भाग दिया, तो अवधि 42 वर्ष 8 मास आए। अतः यह स्पष्ट हुआ कि सामने जो हाथ फैलकर जातक बैठा है, उसकी आयु 42 वर्ष 8 मास की है। अब इसका भाग्योदय समय निकालना है, वह इस उम्र के बाद की निकालना है। जो भाग्य रेखा मणिबंध से आरंभ होकर मस्तक-रेखा तथा हृदय रेखा को काटती हुई मध्यमा अंगुली के तीसरे पोर तक पहुंचती है, वह पूरी रेखा का प्रमाण 96 वर्ष का समझना चाहिए। जहां भाग्य रेखा मस्तक रेखा को काटती है, वह 57 वर्ष की समाप्ति की सूचक है और हृदय रेखा से ऊपर वाली रेखा का प्रमाण 39 वर्ष का समझना चाहिए। अब हमें 42 वर्ष 8 मास से बड़े व्यक्ति का भाग्योदय देखना है और यह समय निश्चय ही भाग्य रेखा व मस्तक रेखा के कटान तथा भाग्य रेखा व हृदय रेखा के कटान के बीच में है। इसी बीच की रेखा की दूरी 21 वर्ष की है। इसे 21 भागों में विभाजित कर दीजिए, तो प्रत्येक भाग एक वर्ष का सूचक होगा। परंतु नहीं, यह भाग्य रेखा के अनुसार 1 वर्ष का, पर उस व्यक्ति के एि एक एक भाग न्यून समय अर्थात 8 मास 23 दिन का है। तारीख का आरंभ 18 तारीख से समझना चाहिए। मस्तक रेखा से ऊपर के छठे बिंदु के बाद में (जब कि 42 वर्ष समाप्त होंगे) यदि कोई श्रेष्ठ प्रभावक रेखा हो, उŸाम शुभ भाग्योदयी चिह्न हो, तो उस समय की गणना कर व्यक्ति के भाग्योदय को सही-सही समय निर्धारित किया जा सकता है। उदाहरणार्थ 14 वर्ष के ऊपर तथा 45 वर्ष के नीचे कोई शुभ प्रिय हो, तो उस समय की गणना कर व्यक्ति का भाग्योदय 44 वर्ष तथा मास बताया जा सकता है। यदि इस प्रकार 5 मास आते हों, तो कहा जा सकता है कि भाग्योदय 44 वर्ष 5 माह के अनंतर होगा। अभ्यास के पश्चात् हाथ देखने पर एक मिनट में ध्रुबांक ज्ञात किया जा सकता है और तीन-चार मिनटों के भीतर-भीतर न्यून समय और सूक्ष्म समय तथा सामने बैठे व्यक्ति को वर्तमान आयु ज्ञात की जा सकती है। अनुभव होने के पश्चात् यह नापने बगैरह की जरूरत नहीं पड़ती, अपितु अभयास तुरंत घटना घटित होने का ठीक-ठीक समय निकाला जा सकता है। परुत जब तक पूरा अभयास न हो, तब तक सही धु्रबांक नहीं निकाला जा सकता। कल्पित धु्रबांक या गलत ध्रुबांक से गणित करने पर फल भी ठीक नहीं उतरता। इस प्रकार यह विधि अपनाकर आप किसी व्यक्ति का किसी भी घटना का सही समय निकालने में सक्षम होंगे ऐसा मेरा विश्वास है।



हस्तरेखा विशेषांक  जुलाई 2009

हस्तरेखा विशेषांक में हस्तरेखा का इतिहास, विकास एवं उपयोगिता, विवाह, संतान सुख, व्यवसाय सुख, व्यवसाय, शिक्षा, स्वास्थ्य व आर्थिक स्थिति हेतु हस्तरेखा का विश्लेषण, हस्तरेखा एवं ज्योतिष में संबंध, क्या हस्तरेखाएँ बदलती है, भविष्य में बदलने वाली घटनाओं को हस्तरेखाओं से कैसे जाना जाए इन सभी विषयों को आप इस विशेषांक में पढ़ सकते है.

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