संतान योग ज्योतिषीय आधार पर विवेचना

संतान योग ज्योतिषीय आधार पर विवेचना  

आज के अर्थ प्रधान युग में प्रत्येक व्यक्ति स्त्री/पुरुष धन धनवान एवं संपत्तिवान शीघ्राशीघ्र होना चाहता है। इस चाहत में विवाह विलंब से हो रहे हैं, तथा व्यक्ति का रूझान भी परिवार बढ़ाने का विवाह के उपरांत शीघ्र संतान नहीं चाहता अतः संतान की इच्छा धन संपत्ति के बाद होती है। तब तक स्त्रियों की आयु 30 से अधिक हो जाने से संतान प्राप्ति में कष्ट या बाधाएं उत्पन्न होती है। जन्मपत्रिका जातक की भूत, वर्तमान एवं भविष्य का आईना होती है तथा जातक से संबंधित समस्त बातों का ज्ञान इससे प्राप्त होता है जातक को संतान सुख है या नहीं या देर से प्राप्त होगा, या संतान गोद लेना होगा या मेडिकल उपचार से होगी। प्रत्येक जातक की इच्छा संतान सुख प्राप्त करने की होती है, परंतु सबको यह सुख प्राप्त नहीं होता। आइए देखें कि जातक की पत्रिका में यह योग है या नहीं है। जन्मपत्रिका की विवेचना: जन्मपत्रिका में पंचम भाव व पंचमेश संतान की दृष्टि से महत्वपूर्ण होता है। संतान प्राप्ति का विचार अथवा इस विषय पर निर्णायक फल के लिए माता-पिता दोनों की जन्मपत्री के गृहों का देखना आवश्यक है। स्वस्थ, सुंदर व योग्य संतान प्राप्ति सभी माता-पिता की इच्छा होती है, परंतु पूर्व जन्मों के कर्म वर्तमान स्थिति में इन ग्रहों द्वारा आपको फल देने आते हैं। ऐसी स्थिती में आपका भाग्य कितना साथ देता है यह सब स्थिति जन्मपत्रिका के सही सही आंकलन से जाना जा सकता है। लग्नेश (लग्न का मालिक) पंचम में हो अथवा पंचमेश पंचम मान का अधिपति ग्रह भी वही हो यह एक योग है। अथवा पंचमेश केंद्र अथवा त्रिकोण में गया हो तो पुत्र सुख प्राप्त होता है। प्रबल पुत्र योग: महर्षि पाराशर के अनुसार यदि पंचम भाव में बुध, गुरु, शुक्र हो तो बलवान ग्रह (पुरुष ग्रह) से देखे जाते हो और पंचमेश भी बलवान हो तो बहुत से पुत्र होते हैं। पुत्री योग: यंदि पंचमेश चंद्र के साथ हो अथवा पंचमेश कर्क राशि के दे्रष्काण में हो तो देवज्ञ को कन्याओं का जन्म कहना चाहिए। पुत्र जन्म से भाग्य वृद्धि: यदि पंचमेश अपनी उच्च राशि में हो, मूल त्रिकोण व स्वराशि में अर्थात राशि बली हो तथा लग्न से एक, दो, पांच, नौ, भाव में हो तो और गुरु से दृष्ट रहे तो पुत्र जन्म के बाद जातक का भाग्य चमकता है। दत्तक पुत्र योग: यदि पंचम भाव में मिथुन, कन्या, मकर, कुंभ राशि में शनि व मंदी (गुलिक) की दृष्टि या योग हो तो जातक दत्तक या कृत्रिम स्वीकृत पुत्र होता है। अपनी पत्नी से उत्पन्न पुत्र नहीं होता। यदि पंचम भाव में 6 ग्रह हो तथा पंचमेश व्यय भाव में स्थित हो, लग्नेश व चंद्र बली हो तो जातक का गोद लिया पुत्र होता है। कष्ट पूर्वक पुत्र लाभ: यदि पंचमेश 6, 8, 12 भाव में हो तो अथवा पंचमेश नीचस्थ, शुत्रक्षेत्री, होकर पंचम भाव में ही हो तो भी कष्टपूर्वक पुत्र होता है। यदि नवमेश लग्न में हो और पंचमेश नीच अर्थात नीच राशि में हो साथ ही पंचम भाव में केतु व बुध हो तो प्रयत्न (चिकित्सा, मंत्रोषधि) करने से पुत्र लाभ होता है। संतानहीनता योग: काकबंधया योग यदि पंचमेश षष्ठ स्थान में तथा लग्नेश किसी भी भाव में मंगल से युक्त हो तो पहली संतान जीवित नहीं रहती तथा बाद में (जातक पुरुष हो तो उसकी पत्नि तथा स्त्री हो तो पति) आगे गर्भधारण नहीं करती, जिस स्त्री के जीवन में एक बार गर्भधारण हो तो वे काकबंध्या तथा कभी गर्भ न हो तो बंध्या होती है। पुत्र वियोग योग: यदि पंचम स्थान में राहु पंचमेश के साथ पाप ग्रह तथा गुरु मकर राशि (नीच राशि) में हो तो 32वें वर्ष में पुत्र शोक होता है। गुरु व लग्न से पंचम स्थान में एक साथ पाप ग्रह हो तो 33, 36, 40वें वर्ष में कभी यथा संभव पुत्र नाश होता है। लग्न में गुलिक हो व लग्नेश नीच राशि में हो तब 56वें वर्ष में पुत्र शोक होता है। इन योगों में पंचमेश पर शुभ ग्रहों की दृष्टि या योग पंचम भाव पर होने से बचाव होता है। उपरोक्त विवरण से स्पष्ट होता है कि जातकों को किसी विद्वान पंडित या ज्योतिषाचार्य से अपनी जन्म कुंडली दिखाकर उसमें वर्णित योगायोग अनुसार संतान प्राप्ति हेतु प्रयास करना चाहिए तथा यदि संतान प्राप्ति में कोई बाधा आ रही हो तो ज्योतिष द्वारा बताए गए उपचार पूजा पाठ एवं चिकित्सीय सलाह लेना चाहिए ताकि दांपत्य जीवन की महत्वपूर्ण इच्छा संतान प्राप्त की जा सके।


हस्तरेखा शास्त्र, जैमिनी, लाल किताब और फेंगशुई विशेषांक  जुलाई 2009

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