नेत्र की रचना: अपने अंगूठे मध्य भाग के बराबर जो अंगुल है, उन दो अंगुल के बराबर नेत्र बुद्बुद के अंतः प्रविष्ट नेत्र हैं। अक्षिगोलक लंबाई और चैड़ाई में अढ़ाई अंगुल है। यह आंख सुंदर, गोलाकार, गाय के स्तन के समान पांच भौतिक रचना है। यद्यपि यह तजोमय अवयव है तथापि नेत्र बुद्बुद में मांस पृथ्वी से, रक्त अग्नि से, कृष्ण भाग वायु से, श्वेत भाग जल से, अश्रुस्रोत आकाश महाभूत से उत्पन्न होते हैं। यह आलोचक पित्त का स्थान है। चक्षु के पाश्चात्य ध्रुव पर इस आंतरिक सांवेदनिक पटल के भीतरी पृष्ठ में एक गोला या अंडाकार पीला धब्बा होता है जिसे पीत बिंदु कहते हैं, जिसका व्यास 1/24 से 1/12” होता है। उसके बीच में गड्ढ़ा होता है। आंख में पांच मण्डल, छः संधियां और छः पटल हैं। ज्योतिष शास्त्र में प्रथम द्रेष्काण कुंडली में द्वितीय स्थान से दायां नेत्र तथा बारहवें स्थान से बायें नेत्र का बोध होता है। ज्योतिष में जन्मजात रोगों का विचार करने के लिए योगों को महत्व दिया गया है। जबकि वात, पित्त, कफ से उत्पन्न होने वाले शारीरिक एवं मानसिक रोग तथा अंगों में पैदा होने वाली व्याधियों का विचार योगों के साथ-साथ दशा अंतर्दशा के आधार पर किया जाता है, क्योंकि ये रोग प्रारब्ध का फल है और प्रारब्ध संचित का एक भाग है। अतः इनका विचार करते समय हमारे आचार्यों ने योग एवं दशा इन दोनों प्रविधियों का आश्रय लिया है तथा असंतुलित खान-पान अनियमित दिनचर्या, महामारी एवं संक्रमण रोगों को क्रियमाण क्रमों का फल माना है। चूंकि क्रियमाण क्रम संचित एवं प्रारब्ध के प्रभाववश होते हैं अतः ऐसे रोगों का विचार करते समय योग एवं दशा के साथ-साथ गोचर का भी अध्ययन किया जाता है। आयुर्वेद में कर्मजन्य रोगों का कारण जो कर्म माना गया है वे संचित कर्म है जिसकी एक भाग को प्रारब्ध कहते हैं तथा मिथ्या आहार-विहार क्रियमाण कर्म है। नेत्र रोगों का कारण: शरीर के गरम होने पर सहसा जल में घुस जाने से, दूरदृष्टि लगातार रखने से, नींद न आने से, निरंतर रोना, क्रोध, शोक, क्लेश करने से, चोट लगने से, अतिस्त्री सेवन से, शुक्त, कांजी, खटाई, कुल्थी, उरद का सेवन करने से, मल, मूत्र आदि को रोकने से, पसीने से, धूम्रपान से, वमन के रूक जाने से या अतियोग से, आंसूओं को रोकने से, बारीक काम करने से, दोष नेत्र में रोग करते हैं। सम्प्राप्ति: नेत्रस्थ सिराओं का आश्रय लेकर विपरीत गति वाले दोष उपर की ओर आकर नेत्र भाग में रोग उत्पन्न करते हैं। पूर्वरूप: नेत्र गदला, शोथयुक्त, अश्रु-गण्डु-मलयुक्त, भारी, जलन, तोद, सुर्खी आदि से युक्त अस्पष्ट लक्षणों वाला होता है। पलकों के कोषो में थोड़ा दर्द, शूक से भरे पलक, आंख क्रियाओं में या रूप देखने में पहले की भांति कार्य नहीं करती। आंख के 76 रोग: वातजन्य रोग: हताधिमन्थ, निमिष, गम्भीरिका दृष्टि, वातहतवत्र्म असाध्य हैं। काच रोग याप्य् तथा शुष्काक्षिपाक, अधिमन्थ, अभिष्यन्द, मारुतपय्र्य व अन्यतोवाद ये पांच रोग साध्य हैं। पित्तजन्य रोग: ह्रस्वजाड्य, जलस्राव असाध्य है। परिम्लायिकाच व नीलकाच याप्य हैं तथा पित्तज अभिष्यंद, अधिमन्थ, अमलाप्युषित, शुक्तिका, पित्तविदग्धदृष्टि व धूमदर्शी साध्य हैं। कफजन्य रोग: कफस्राव असाध्य व कफजकाच याप्य है। अभिष्यन्द अधिमन्थ, बलास, ग्रथित श्लेष्मविदगधदृष्टि, पोथकी, लगण, कृमिग्रन्थि, परिक्लिन्नवत्र्म, शुक्ल, अर्म, पिस्टक तथा श्लेष्मोपनाह साध्य है। रक्त जन्य रोग: रक्तस्राव, अजका, शेणितार्श, शतशुक्र असाध्य हैं तथा रक्तकाच याप्य है। अधिमन्थ, अभिष्यन्द, क्लिष्टवत्र्म, शिराहर्ष, शिरोत्पाद, अंजना, सिराजाल, पर्वणी, अव्रणशुक्र, शोणितार्म व अर्जुन साध्य हैं। सर्वज नेत्र रोग: पूयस्राव, नाकुलान्ध्य, अक्षिपाक, अलजी असाध्य हैं तथा काच, पक्ष्मकोप याप्य हैं। वत्र्मविवन्ध, शिरापिडिका, प्रस्त्तर्यर्म, अधिमांसर्म, स्नाय्वर्म, उत्संगिनी, पूयालस, अर्बूद, श्यावकर्दम, श्याववत्र्म, अर्शोवत्र्म, शुष्कार्श, शर्करावत्र्म, सशोकपाक, अशोकपाक, वहलवत्र्म, अक्लिन्नवत्र्म, कुम्भीका व विवत्र्म ये उन्नीस साध्य हैं। बाह्यज रोग: सनिमित्त और अनिमित्त ये असाध्य है। इसके अतिरिक्त संधि आश्रित 9, वत्र्मजन्य 21, शुक्ल भाग में 11, कृष्णभाग में 4, सर्वाश्रय 17, दृष्टिजन्य 12 तथा बाह्यजन्य 2 रोग अति भयानक हैं। दृष्टि: दृष्टि का प्रमाण मसूर के पत्ते के बराबर है। ये पृथ्वी आदि पांच महाभूतों के सार से उत्पन्न हुई है। जुगनु के सूक्ष्म अग्नि कण के समान चमकने वाला, उपचय और अपचय रहित तेज से युक्त, आंख के बाह्म पटल से ढ़की गोल छेद वाली शीतल वस्तु के सात्मयवाली मनुष्यों की दृष्टि है। ज्योतिषीय रतौंधी के योग: इस रोग में जातक को रात्रि में दिखाई नहीं देता है, जबकि वह दिन में अपना सभी कार्य कर सकता है। सूर्य को छोड़कर अन्य नेत्र कारक ग्रह (चंद्र एवं शुक्र) दुःस्थानों में हो या उन पर पाप ग्रहों का प्रभाव हो तो रतौंधी होती है। Û चंद्र के साथ शुक्र षष्ठ, अष्टम या व्यय स्थान हो। Û शुक्र चंद्र एवं द्वितीयेश एक साथ हों व उन पर पाप ग्रहों की दृष्टि हो। Û शुक्र चंद्र एवं द्वितीयेष तीनों लग्न में हो। विविध नेत्र रोगों का योग: Û षष्ठेश वक्री ग्रह की राशि में हो तो आंखे दुःखती हैं। Û लग्नेश मंगल या बुध की राशि में हो उन पर इनमें से किसी एक की दृष्टि हो तो नेत्र पीड़ा होती है। Û अष्टमेश एवं लग्नेश षष्ठ में हो तो बाएं नेत्र में रोग होता है। Û षष्ठ या अष्टम में शुक्र हो तो दाहिने नेत्र में रोग होता है। Û धनेश पर शुभ ग्रहों की दृष्टि हो और लग्नेश पाप ग्रह के साथ हो तो दृष्टि कमजोर हो जाती है। Û शनि, मंगल या गुलिक के साथ द्वितीयेश हो तो आंख में दर्द होता है। Û द्वितीय में पाप ग्रह और उन पर शनि की दृष्टि हो तो नेत्र रोग से दृष्टि नष्ट हो जाती है। Û द्वितीय भाव के नवांश का स्वामी पाप ग्रह के राशि में हो तोकिसी रोग से दृष्टि नष्ट हो जाती है। Û लग्न में शयन अवस्था का मंगल हो तो नेत्र रोग होता है। Û द्वितीयेश एवं शुक्र साथ-साथ हों तो नेत्र रोग होता है। Û शुक्र से 6, 8 या 12 स्थान में द्वितीयेष हो तो नेत्र रोग होता है। Û त्रिकोण में सूर्य हो तथा उस पर पाप ग्रह की दृष्टि हो तो ज्योति नष्ट हो जाती है। Û लग्न में या अष्टम स्थान में सूर्य हो तो दृष्टि कमजोर हो जाती है। Û सूर्य, शुक्र एवं मंगल एक साथ हो तो नेत्र रोग होता है। Û चंद्र एवं मंगल त्रिक में हो तो गिरने से आंख में चोट लगती है। Û द्वितीयेश त्रिक स्थान में हो और उस पर शुभ ग्रहों की दृष्टि हो तो वृद्धावस्था के कारण नेत्र रोग होता है। Û द्वितीयेश या द्वादेश सूर्य हो और उस पर शनि एवं गुलिक की दृष्टि हो तो कफ एवं पित्त विकार से नेत्र रोग होता है। भेंगापन का योग Û सूर्य, चंद्र वक्री ग्रह के राशि में त्रिक स्थान में हो। Û द्वितीय या द्वादश में पाप ग्रह के साथ शुक्र हो तो जातक अधखुली आंखों वाला होता है। Û लग्न में सूर्य एवं चंद्र हो और उन पर शुभ एवं पाप दोनों ग्रहों की दृष्टि हो तो जातक के पलक चलते रहते हैं। Û कर्क लग्न में सूर्य हो तो जातक के पलक लगातार चलते रहते हैं। Û लग्न में स्थित सूर्य एवं चंद्र को मंगल एवं बुध देखते हों तो जातक के आंखों में फूली होती है। अंधता यह जन्मजात, आगन्तुक नेत्र में विकार के कारण तथा सामान्य आयु के साथ-साथ वृद्धावस्था में मोतियाबिंद के कारण हो सकती है। जातक ग्रंथों में सूर्य को नेत्र कारक माना गया है और चंद्र एवं शुक्र को उसका सहयोगी। इस प्रकार सूर्य, चंद्र एवं शुक्र इन तीनों से नेत्र एवं उसमें होने वाले रोगों का विचार किया जाता है। कुंडली में द्वितीय भाव दाहिने नेत्र का तो द्वादश भाव बांये नेत्र का प्रतीक है। इन भावों के अतिरिक्त षष्ठ एवं अष्टम भाव से भी नेत्र रोग का विचार किया जाता ळै। जैमिनी, पराशर, वराहमिहिर, कल्याण वर्मा एवं वैद्यनाथ आदि ने स्पष्ट रूप से बताया है कि रोग कारक ग्रह के उपर शुभ ग्रहों की दृष्टि युति हो तो वह रोग उपचार द्वारा ठीक हो जाते हैं। अंधता के योग Û सूर्य अष्टम चंद्र षष्ठ, मंगल द्वितीय और शनि द्वादश में हो। Û राहु लग्न में हो और सूर्य सप्तम में हो। Û द्वितीय एवं द्वादश में क्रमशः सूर्य एवं चंद्रमा हो तथा षष्ठ एवं अष्टम में पाप ग्रह हो। Û शनि एवं मंगल के साथ चंद्र त्रिक में हो। Û द्वितीयेष एवं लग्नेश त्रिक में हो। Û सिंह लग्न में शनि हो। Û सूर्य एवं चंद्र पाप ग्रहों के बीच में हो। इस प्रकार हम देखते हैं कि जहां आयुर्वेद में नेत्र की रचना के आधार पर रोगों का अति विस्तृत वर्णन किया है। आयुर्वेद के सभी संहिता एवं संग्रह ग्रंथों में नेत्र रोग अति विस्तृत रूप से वर्णित है। वहां ज्योतिष में यह वर्णन अति सीमित रह गया है। आवश्यकता है कि वर्तमान परिप्रेक्ष्य में ज्योतिषीय योगों का संधान-अनुसंधान, अनुशीलन हो जिससे ज्योतिष और आयुर्वेद मिलकर अधिक जन उपयोगी कार्य कर सके।


हस्तरेखा शास्त्र, जैमिनी, लाल किताब और फेंगशुई विशेषांक  जुलाई 2009

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