मंगला-गौरी व्रत

मंगला-गौरी व्रत  

मंगला गौरी व्रत पं. ब्रजकिशोर भारद्वाज ‘ब्रजवासी’ मंगला गौरी व्रत श्रावण मास में पड़ने वाले प्रत्येक मंगलवार को किया जाता है। प्रत्येक मंगल वार को मंगलागौरी का पूजन करना चाहिए। मंगलवार के दिन ही गौरी का पूजन करने के कारण इसे मंगला गौरी व्रत कहा जाता है। यह व्रत कल्याण करने वाला व्रत है। जो स्त्रियां इस व्रत का पालन करती हैं, उनके घर में सदा सर्वदा मंगल ही होता है। कभी अमंगल नहीं होता। यह व्रत विवाहोपरांत प्रत्येक स्त्री को पांच वर्षों तक नियम से करना चाहिए। विवाह के बाद प्रथम श्रावण में पीहर में तथा अगले चार वर्षों तक पतिगृह में यह व्रत करने का विधान है, यथा- विवाहात् प्रथां वर्षमारभ्य पंचवत्सरम्। श्रावणे मासे भौमेषु चतुर्षु व्रतमाचरेत्।। प्रथमे वत्सरे मातुर्गृेहे कर्तव्यमेव च। ततो भर्तुगृहे कार्यमवश्यं स्त्रीभिराददात्। विधान: प्रातःकाल स्नानादि नित्यकर्मों से निवृŸा ाहे नवीन शुद्ध वस्त्र पहनकर रोली का तिलक कर पूर्वाभिमुख या उŸाराभिमुख हो पवित्र आसन पर बैठकर निम्न संकप्ल करना चाहिए- ‘मम पुत्रपौत्रसौभाग्यवृद्धये श्री मंगलागौरीप्रीत्यर्थं पंचवर्षपर्यंतं मंगलागौरी व्रतमहं करिष्ये।’ ऐसा संकल्प कर एक शुद्ध एवं पवित्र आसन (पाटा आदि) पर भगवती मंगलागौरी की मूर्ति की प्रतिष्ठा करनी चाहिए। फिर उनके सम्मुख आटे से बना एक बड़ा सा सोलह मुख वाला सोलह बŸिायों से युक्त दीप घृत पूरित कर प्रज्वलित करना चाहिए। इसके बाद पवित्रीकरण, स्वस्तिवाचन और गणेशपूजन करें। इसके अतिरिक्त यथाशक्ति यथासंभव वरुण-कलश स्थापना पूजन, नव ग्रह पूजन तथा षोडश मातृका पूजन करने का विधान भी है। इसके बाद ‘श्रीमंगलागौर्यै नमः’ इस नाम-मंत्र से मंगलागौरी का षोडशोपचार पूजन करना चाहिए। मंगलागौरी के पूजन में सोलह प्रकार के पुष्प, सोलह मालाएं, सोलह वृक्ष के पŸो, सोलह दर्वादल, सोलह धतूर के पŸो, सोलह प्रकार के अनाज तथा सोलह पान, सुपारी, इलायची, जीरा और धनिया भी चढ़ाएं। मंगलागौरी के ध्यान का मंत्र इस प्रकार है- कंुकुमागुरुलिप्तांगां सर्वाभरणभूषिताम्। नीलकण्ठप्रियां गौरीं वन्देऽहं मंगलाह्नयाम्।। क्षमा-प्रार्थना तथा प्रणाम के अनंतर मंगलागौरी को विशेषाघ्र्य प्रदान करना चाहिए। व्रत करने वाली स्त्री तांबे के पात्र में जल, गंध, अक्षत, पुष्प, फल, दक्षिणा और नारियल रखकर तांबे के पात्र को दाहिने हाथ में लेकर निम्न मंत्र का उच्चारण कर विशेषाघ्र्य दें- पूजा सम्पूर्णतार्थं तु गन्धपुष्पाक्षतैः सह। विशेषाघ्र्यं मया दŸाो मम सौभाग्यहेतवे।। ‘श्रीमंगलागौर्यै नमः’ कहकर अघ्र्य दें और प्रणाम करें। पूजन के अनंतर बांस के पात्र में सौभाग्यद्रव्य के साथ लड्डू, फल, वस्त्र के साथ ब्राह्मण को वायन दान करना चाहिए तथा निम्न मंत्रों को पढ़ना चाहिए- अन्नकंचुकिसंयुक्तं सवस्त्रफलदक्ष्णिम्। वायनं गौरि विप्राय ददामि प्रीतये तव।। सौभाग्यारोग्यकामानां सर्वसम्पत्समृद्धये। गौरीगिरीशतुष्ट्यर्थं वायनं ते ददाम्यहम्।। इसके बाद वृतकत्र्री को अपनी सासजी के चरण स्पर्श कर उन्हें सोलह लड्डुओं का वायन देना चाहिए। फिर सोलह मुख वाले दीपक से आरती करें। रात्रि-जागरण करें एवं प्रातःकाल किसी तालाब या नदी में गौरी का विसर्जन कर दें। इस व्रत की कथा इस प्रकार है- कुण्डिन नगर में धर्मपाल नामक एक धनी सेठ रहता था। उसकी पत्नी सती, साध्वी एवं पतिव्रता थी। परंतु उनके कोई पुत्र नहीं था। सब प्रकार के सुखों से समृद्ध होते हुए भी वे दम्पति बड़े दुःखी रहा करते थे। उनके यहां एक जटा रुद्राक्ष मालाधारी भिक्षुक प्रतिदिन आया करते थे। सेठानी ने सोचा कि भिक्षुक को कुछ धन आदि दें, सम्भव है इसी पुण्य से मुझे पुत्र प्राप्त हो जाए। ऐसा विचारकर पति की सम्पŸिा से सेठानी ने भिक्षुक की झोली में छिपाकर सोना डाल दिया। परंतु इसका परिणाम उलटा ही हुआ भिक्षुक अपरिग्रह व्रती थे, उन्होंने अपना व्रत भंग जानकर सेठ-सेठानी को संतान हीनता का शाप दे डाला। फिर बहुत अनुनय-विनय करने से उन्हें गौरी की कृपा से एक अल्पायु पुत्र प्राप्त हुआ। उसे गणेश ने सोलह वें वर्ष में सर्प दंश का शाप दे दिया था। परंतु उस बालक का विवाह ऐसी कन्या से हुआ, जिसकी माता ने मंगलागौरी-व्रत किया था। उस व्रत के प्रभाव से उत्पन्न कन्या विधवा नहीं हो सकती थी। अतः वह बालक शतायु हो गया। न तो उसे सांप ही डंस सका और ही यम दूत सोलहवें वर्ष में उसके प्राण ले जा सके। इसलिए यह व्रत प्रत्येक नवविवाहिता को करना चाहिए। काशी में इस व्रत को विशेष समारोह के साथ किया जाता है। उद्यापन विधि: चार वर्ष श्रावण मास के सोलह या बीस मंगलवारों का व्रत करने के बाद इस व्रत का उद्यापन करना चाहिए, क्योंकि बिना उद्यापन के व्रत निष्फल होता है। व्रत करते हुए जब पांचवां वर्ष प्राप्त हो तब श्रावण मास के मंगलावारों में से किसी भी मंगलवार को उद्यापन करें। आचार्य का वरण कर सर्वतोभद्र मंडल बनाकर उसमें यथाविधि कलश की स्थापना करें तथा कलश के ऊपर यथाशक्ति मंगलागौरी की स्वर्णमूर्ति की स्थापना करें। तदानंतर गणेशादिस्मरणपूर्वक ‘श्रीमंगलागौर्यै नमः’ इस नाम मंत्र से गौरी की यथोपलब्धोपचार पूजा कर सोलह दीपकों से आरती करें। मंगलागौरी को सभी सौभाग्यद्रव्यों को अर्पित करना चाहिए। दूसरे दिन यथासंभव हवन करवाएं और सोलह सपत्नीक ब्राह्मणों को पायस भोजन कराकर संतुष्ट करें। उŸाम वस्त्र तथा सौभाग्यपिटारी का दक्षिणा के साथ दान करें। इसी प्रकार अपनी सासजी के चरण-स्पर्श करें। उन्हें भी चांदी के एक बर्तन में सोलह लड्डू, आभूषण, वस्त्र तथा सुहागपिटारी दें। अंत में सब को भोजन कराकर स्वयं भी भोजन करें। इस प्रकार व्रतपूर्वक उद्यापन करने से वैधव्य की प्राप्ति नहीं होती। धर्म-अर्थ- काम-मोक्ष चारों पुरुषार्थों की सिद्धि का सहज साधन भी है।



हस्तरेखा विशेषांक  जुलाई 2009

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