सूर्याष्टकवर्ग से सटीक फलकथन

सूर्याष्टकवर्ग से सटीक फलकथन  

पिछले अंक में सर्वाष्टकवर्ग पर किए गए शोध की चर्चा की गई थी, इस अंक में प्रस्तुत है सूर्याष्टक वर्ग पर किए गए शोध का विश्लेषण। भारतीय ज्योतिष में फलकथन हेतु अष्टकवर्ग विद्या की अचूकता व सटीकता का प्रतिशत सबसे अधिक है। अष्टकवर्ग में लग्न और सात ग्रहों (सूर्य, चंद्र, मंगल, बुध, गुरु, शुक्र और शनि) को सम्मिलित किया जाता है। सूर्य ग्रह द्वारा विभिन्न भावों व राशियों को दिए गए शुभ बिंदु तथा सूर्य का ‘शोध्यपिंड’ सूर्याष्टकवर्ग से किए जाने वाले फलकथन का आधार होते हैं। (सूर्याष्टकवर्ग जैसे अनेक वर्ग व शोध्यपिंड की गणना कंप्यूटर में की मदद से आसानी से की जा सकती है)। अष्टकवर्ग विद्या में नियम हैं कि कोई भी ग्रह, चाहे वह स्वराशि या उच्च का ही क्यों न हो, तभी अच्छा फल दे सकता है जब वह अपने अष्टकवर्ग में 5 या अधिक बिंदुओं के साथ हो। दूसरी तरफ, यदि सर्वाष्टक वर्ग में 28 या उनसे अधिक बिंदु के साथ हो तो जातक को सूर्य से संबंधित भावों के शुभ फल प्राप्त होते हैं। यदि सर्वाष्टक वर्ग में 28 से अधिक और सूर्याष्टवर्ग में 4 से कम बिंदु हों तो फल सम आता है। यदि दोनों ही वर्गों में कम बिंदु हों तो ग्रह के अशुभ फल प्राप्त होते हैं। कारकत्व के अनुसार सूर्य से स्व, आत्मा, स्वभाव, शक्ति, पितृ सुख आदि का विचार किया जाता है। सूर्याष्टक वर्ग: यदि कुंडलियों का फलकथन सूर्याष्टक वर्ग के निम्न सिद्धांतों या नियमों के अनुसार किया जाए तो अपेक्षाकृत अधिक सटीक परिणाम सामने आएंगे। नियमों को समझने में सहायता के लिए कुछ उदाहरण कुंडलियों का विश्लेषण भी यहां प्रस्तुत है। 1. पिता का अनिष्ट जानना: नियम क: सूर्याष्टक वर्ग में शोधन से पहले सूर्य से नौवें स्थान में जितने बिंदु हों, उनका सूर्य के शोध्य पिंड से गुणा करें और गुणनफल को 27 से भाग दें। शेषफल तुल्य नक्षत्र या उस नक्षत्र से त्रिकोण नक्षत्र में या उन नक्षत्रों के आसपास जब भी शनि गोचर करता है तो पिता के लिए अनिष्टकारी हो सकता है। सूर्य का शोध्य पिंड = 205 सूर्य से नौवें स्थान में बिंदु = 3 अतः 3 गुणा 205 = 615»27 शेषफल = 21 नक्षत्र 21वां अर्थात उŸाराषाढ़ा है और उसके त्रिकोण नक्षत्र हैं उŸाराफाल्गुनी व कृत्तिका। जवाहर लाल नेहरू के पिता की मृत्यु 6 फरवरी 1931 को हुई तो जब शनि पूर्वाषाढ़ा नक्षत्र के चरण 4 में था अर्थात उसका प्रवेश उŸाराषाढ़ा नक्षत्र में होने वाला था। नियम ख: सूर्याष्टक वर्ग में सूर्य के शोध्यपिंड में सूर्य से नौवें स्थान के बिंदुओं को गुणाकर 12 से भाग दीजिए जो शेष आए उस तुल्य राशि में या उससे त्रिकोण राशि में या उनके आसपास की राशि में भी गोचरवश जब सूर्य, शनि या राहु आए तो पिता का अनिष्ट हो सकता है बशर्ते दशा भी संबंधित चल रही हो। जातक की कंुडली में सूर्य दूसरे स्थान में है और उससे नौवें अर्थात दशम स्थान में सूर्याष्टक वर्ग में 3 शुभ बिंदु हैं और सूर्य शोध्य पिंड 187 है। अतः 187 गुणा 3 = 561 » 12 शेष 9 अर्थात धनु राशि धनु राशि की त्रिकोण राशि हैं मेष व सिंह हरिवंशराय बच्चन के पिता की मृत्यु 10 अक्तूबर 1942 को हुई जब शनि वृष राशि पर से गोचर कर रहा था अर्थात मेष राशि को अभी पार ही किया था। सूर्य का गोचर कन्या राशि से था अर्थात उसने अभी-अभी सिंह राशि को पार किया था। वहीं राहु का गोचर सिंह राशि से था जो पिता के लिए अनिष्टकारी बना। नियम ग: सूर्य के अष्टकवर्ग में गुरु से सातवें स्थान में बिंदुओं का सूर्य के शोध्य पिंड से गुणा कर गुणनफल को 27 से भाग दें। अश्विनी या गुरु स्थित नक्षत्र से शेषफल की संख्या तक गिनती करने पर जो नक्षत्र आए, उससे या उससे त्रिकोण नक्षत्र पर जब भी गुरु का गोचर होगा, वह समय पिता के लिए मृत्यु तुल्य होगा। जातक की कुंडली में गुरु दसवें स्थान में है और उससे सातवें स्थान में सूर्याष्टक वर्ग में 1 शुभ बिंदु है और सूर्य का शोध्य पिंड 187 है। अतः 187 गुणा 1 = 187 » 27 शेष 25 अर्थात 25वां नक्षत्र पूर्वा भाद्रपद और इसके त्रिकोण नक्षत्र हैं पुनर्वसु व विशाखा जब हरिवंशराय बच्चन के पिता की मृत्यु 10 अक्तूबर 1942 को हुई तो गुरु का गोचर पुनर्वसु नक्षत्र से था जो पिता के लिए अनिष्टकारी बना। नियम घ: सूर्य के अष्टकवर्ग में सूर्य से सातवें स्थान के बिंदुओं का सूर्य के शोध्य पिंड से गुणा करने पर जो गुणनफल प्राप्त हो, उससे या उससे त्रिकोण नक्षत्र पर या उसके आसपास के नक्षत्र से भी जब सूर्य का गोचर होगा, वह समय पिता के लिए मृत्यु तुल्य होगा। सूर्य का शोध्य पिंड = 205 सूर्य से सातवें स्थान में बिंदु = 6 6 गुणा 205 = 1230 » 27 शेषफल = 15 नक्षत्र 15वां अर्थात स्वाति है और उसके त्रिकोण नक्षत्र हैं शतभिषा व आद्र्रा। इनके ऊपर सूर्य का गोचर अनिष्टकारी हो सकता है। जवाहर लाल नेहरू के पिता की मृत्यु 6 फरवरी 1931 को हुई जब सूर्य धनिष्ठा से शतभिषा नक्षत्र में प्रवेश करने वाला था। 2. अपना कष्ट जानना:- नियम क: सूर्य के अष्टकवर्ग में लग्न से आठवें स्थान के बिंदुओं के सूर्य के शोध्य पिंड से गुणा कर गुणफल को 27 से भाग दें। अश्विनी नक्षत्र से प्रारंभ कर शेषफल की संख्या तक गिनती करने पर जो नक्षत्र प्राप्त हो, उससे या उससे त्रिकोण नक्षत्र पर जब भी शनि, राहु या सूर्य का गोचर होगा, वह समय स्वयं के लिए मृत्यु तुल्य होगा। सूर्य का शोध्य पिंड = 205 लग्न के आठवें भाव में बिंदु = 3 3 गुणा 205 =615 » 27 शेषफल = 21 नक्षत्र 21वां अर्थात उŸाराषाढ़ा है और उसके त्रिकोण नक्षत्र हैं कृत्तिका व उŸारा फाल्गुनी। इनके ऊपर से राहु, सूर्य या शनि का गोचर स्वयं के लिए अनिष्टकारी हो सकता था। जवाहर लाल नेहरू की मृत्यु के दिन 27.05.1964 को शनि शतभिषा नक्षत्र में, राहु आद्र्रा में व सूर्य रोहिणी नक्षत्र में था अर्थात सूर्य ने कृत्तिका नक्षत्र को अभी-अभी पार किया था। नियम ख: सूर्य के अष्टकवर्ग में लग्न से आरंभ कर शनि तक और शनि से आरंभ कर लग्न तक, आए सभी बिंदुओं के योग के बराबर वर्षों में (दोनों वर्ष) स्वयं कष्ट की प्राप्ति होती है। उदाहरण: आरती (26.03.1969, 11ः30, दिल्ली) की कुंडली में लग्न मिथुन है और शनि मेष राशि में है। सूर्य के अष्टकवर्ग में मेष राशि में 5, वृष में 4 और मिथुन अर्थात लग्न में 3 बिंदु हैं, अतः शनि स्थित राशि से लग्न तक के बिंदुओं का योग हुआ 12। जातका दिसंबर 1980 में जब 12वें वर्ष में थी तो सीढ़ियों से गिर गई और उसकी कोहनी की हड्डी टूट गई। नियम ग: सूर्याष्टक वर्ग में लग्न से सूर्य तक के बिंदुओं का योग तथा सूर्य से लग्न तक के बिंदुओं का योग करके देख लेना चाहिए। इन दोनों योगफलों के बराबर आयु वर्षों में जातक के रोग, शोकादि का फलकथन करना चाहिए। उदाहरण: जातका (26.03.1969, 11ः34, दिल्ली) के सूर्याष्टक वर्ग में लग्न से सूर्य राशि तक के बिंदुओं का योग 16 और इन दोनांे योगों का योग 55 आता है। जुलाई 1985 में जब जातका 16 वर्ष की हुई ही थी, तो उसे गर्दन में फोड़ा होने के कारण लंबे समय तक रोग से ग्रस्त रहना पड़ा था और इसी कारण से कक्षा 10 में अच्छे अंकों से उŸाीर्ण न होने के शोक के कारण, घर छोड़कर चली गई थी। पांच दिन के अथक प्रयास के बाद उसे समझा बुझाकर वापिस लाया गया था। 3. शुभ दिशा जानना: ज्योतिष के अनुसार राशि 1,5,9 पूर्व दिशा राशि 2,6,10 दक्षिण दिशा राशि 3,7,11 पश्चिम दिशा और राशि 4,8,12 उŸार दिशा से संबंधित होती हैं। अतः सूर्य के अष्टक वर्ग में जिस दिशा की राशियों को अधिक बिंदु मिले हों, उस दिशा को स्वयं के लिए भाग्यशाली मानना चाहिए। 4. सूर्य के अष्टकवर्ग में जिस राशि में कोई बिंदु न हो, उस राशि में सूर्य के गोचर के समय विवाहादि शुभ कार्य नहीं करने चाहिए। उदाहरण के लिए यहां एक कुंडली प्रस्तुत है जिसके सूर्याष्टक वर्ग में मकर राशि में शून्य बिंदु है। अतः जिस समय सूर्य का गोचर मकर राशि से होगा उस समय विवाहादि करना शुभ नहीं होगा। 5.सूर्य के अष्टकवर्ग में यदि किसी राशि में 5 या अधिक बिंदु हों, और उस राशि से सूर्य का गोचर हो, तो उस मास को शुभ मास जानना चाहिए। उस मास निम्न कार्य किए जा सकते हैं - विवाह, दानपुण्य, तीर्थयात्रा, पर्यटन, नया काम, देव स्थापना आदि। ऊपर दी गई कुंडली में कन्या, धनु, मेष, वृष व मिथुन राशियों में 5 या अधिक बिंदु हैं। इन राशियों में जब-जब सूर्य का गोचर होगा तो उक्त कार्य करना शुभ होगा।


फलादेश तकनीक विशेषांक  अकतूबर 2008

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