आज के बदलते सामाजिक परिवेश तथा उच्च अभिलाषाओं एवं अपने कार्यों की सही रूपरेखा निर्धारण न कर पाने के कारण आज मनुष्य मानसिक स्तर पर अनेक रोगों से ग्रस्त है। भावनाओं तथा संवेदनाओं का सीधा संबंध मस्तिष्क एवं बुद्धि तथा मन से होता है। जब बुद्धि तथा मन के सभी अंगों (ग्रहों) पर पापी ग्रहों का प्रभाव पाया जाता है तो मनुष्य मानसिक रोग से प्रभावित होता है। बुद्धि के द्योतक अंग हैं लग्न, लग्नेश, बुध, पंचम भाव व पंचमेश। मन के द्योतक अंग चतुर्थ भाव, चतुर्थेश (चतुर्थ भाव तथा चतुर्थेष से व्यक्ति की भावनाओं का पता चलता है) और चंद्रमा (जो कि मन का कारक है)। जब इन भावों, इनके स्वामियों तथा चंद्रमा व बुध पर पापी ग्रहों का प्रभाव पाया जाए तो हम कह सकते हैं कि व्यक्ति मानसिक रोग से ग्रस्त है। जन्म कुंडली में चंद्रमा का पक्ष बल व्यक्ति के स्वास्थ्य तथा मानसिक विकास में सबसे अधिक महत्वपूर्ण स्थान रखता है। चंद्रमा शुक्लपक्ष की प्रतिपदा से लेकर दशमी तक मध्यबली, शुक्ल एकादशी से लेकर कृष्णपंचमी तक पूर्णबली तथा कृष्ण षष्ठी से अमावस्या तक अल्पबली होता है, यदि मनुष्य का जन्म शुक्ल पक्ष की 13, 14, 15 तिथि में हो तो जातक का चंद्रमा बहुत शुभ होता है। जातक का चंद्रमा जितना अधिक पक्ष बली होगा, जातक का मानसिक स्तर उतना ही सुदृढ़ तथा विकसित होगा। शास्त्रों अनुसार यदि जातक का जन्म कृष्ण षष्ठी से लेकर अमावस्या की मध्य रात्रि को हो तो जातक का मानसिक स्तर अधिक सुदृढ़ नहीं होता। यदि जातक का जन्म ग्रहण के समय हो तो भी जातक का मानसिक स्तर सुदृढ़ नहीं होता। जातक के मानसिक रोगी होने के निम्नलिखित ज्योतिषीय कारण हैं- Û सर्वाथ चिंतामणि के अनुसार यदि क्षीण चंद्रमा षष्ठ, सप्तम, अष्टम तथा द्वादश भाव में हो तो जातक को मानसिक रोगी हो सकता है। Û यदि क्षीण चंद्रमा (6, 7, 8, 12) भाव में सूर्य तथा मंगल के मध्य हो तो जातक को मानसिक रोगी होने के प्रबल संभावनाएं रहती हैं। Û जातक पारिजात के अनुसार यदि क्षीण चंद्रमा अष्टम भाव में मंगल, शनि व राहू के साथ हो तो जातक मानसिक रोगी हो सकता है। Û चंद्रमा व शनि की युति से जातक का मतिभ्रम हो सकता है। Û क्षीण चंद्रमा के साथ राहू या केतु हो तो जातक मानसिक रोगी हो सकता है। Û यदि पंचमेश 6, 8, 12 भाव में हो तो जातक मतिभ्रम और मानसिक रोग के कारण पीड़ित रह सकता है। यदि पंचमेश स्वग्रही हो तो जातक के इस रोग का परिहार हो जाता है। Û यदि लग्नेश अष्टमेश के साथ लग्न के अतिरिक्त कहीं और बैठा हो तो जातक मानसिक स्तर पर जीवन भर दुखी रहता है। Û चंद्रमा व बुध के दोनों ओर के घरों में शनि, राहु व केतु हो तो जातक सनकी प्रवृति का होता है। Û पंचमेश यदि पापग्रहों से युक्त हो तो जातक मानसिक रोग से पीड़ित हो सकता है। Û बुद्धि कारक अर्थात बुध व बुद्धि स्थान का कारक गुरु पाप ग्रहों से युक्त या दृष्ट हो तो जातक मानसिक रोग से पीड़ित होता है। Û शनि मंगल व राहू यदि तीनों एक ही राशि में स्थित हों तो जातक सनकी प्रवृŸिा का होता है। Û गुलिक तथा शनि दोनों पंचम स्थान में हों तथा शुभ ग्रहों का कोई संबंध न हो तो मनुष्य मानसिक रोग से पीड़ित हो सकता है। Û यदि लग्न, चतुर्थ, पंचम भाव पाप कर्तरी योग से पीड़ित हों तो जातक मानसिक रोग से पीड़ित हो सकता है। Û यदि पंचमेश, पंचमभाव, नवमेश व बुध पाप ग्रहों के मध्य में हों, निर्बल हों तथा पाप ग्रहों से दृष्ट हों तो जातक मानसिक रोग से पीड़ित होता है। Û शनि व चंद्रमा को यदि मंगल देखे तो जातक मानसिक रोग से पीड़ित होता है। Û षष्ठ या अष्टम स्थान में शनि मंगल से युक्त हो तो जातक व्यर्थ की मानसिक परेशानी से ग्रस्त होता है। Û केंद्र स्थान में सूर्य एवं चंद्रमा के साथ शनि हो तो जातक शराब तथा अन्य मादक पदार्थों के कारण मानसिक रोगी हो जाता है। Û लग्न में चंद्रमा यदि शनि, राहू व केतु से युक्त हो तो जातक मानसिक रोगी होता है। Û उपयुक्त सभी योग निम्न कुंडलियों में अध्ययन करने से प्रमाणित होते हैं। जन्मतिथि समय स्थान 26.07.1974 23ः03 दिल्ली 08.01.1962 20ः00 दिल्ली 02.09.1969 19ः00 सोनीपत 28.09.1959 12ः44 दिल्ली 10.10.1952 11ः30 हापुड़ 03.03.1973 10ः30 दिल्ली नोट: उपयुक्त सभी योग कुंडली में आधारित अन्य योगों तथा ग्रहों के शुभ तथा अशुभ प्रभाव के कारण पूर्ण फल देने में समर्थ तथा असमर्थ भी हो सकते हैं। उपयुक्त योगों को दर्शाते हुए अब हम निम्न कुंडली की विवेचना करेंगे। जातक का जन्म लग्न मीन है जो कि एक द्विस्वभाव राशि है। द्विस्वभाव लग्न वाले जातक कोई भी निर्णय लेने के लिए अधिक समय लेते हैं तथा इनके निर्णय लेने की स्थिति हमेशा डावांडोल रहती है जो कि जातक के मानसिक स्तर की दृढ़ता नहीं दर्शाती। जातक का पंचमेश अष्टम स्थान में तुला राशि में स्थित है जो चर राशि है। जातक के पंचमेश चंद्रमा पर किसी भी शुभ ग्रह की दृष्टि नहीं है। जातक का पंचम भाव पाप ग्रह शनि मंगल तथा राहू से पूर्ण रूप से दृष्टि है। पंचम भाव में षष्ठेश सूर्य तथा अष्टमेश शुक्र पाप ग्रह केतु के साथ बैठे हैं तथा पंचम तथा अष्टमेश का आपस में राशि परिवर्तन योग भी बन रहा है तथा नवांश कुंडली में पंचमेश चंद्रमा षष्ट भाव में बुध की मिथुन राशि में उपस्थित है। इन योगों के कारण व्यक्ति का मानसिक स्तर बहुत निम्न स्तर का रहा है। लग्नेश (गुरु) के लग्न तथा पंचम भाव का दृष्टि होने के कारण जातक को मानसिक व्यथा में फिर भी लाभ हो रहा है अर्थात मानसिक स्तर काफी हद तक सुदृढ़ हो रहा है। जातक का चतुर्थ भाव पाप कर्तरी होने के कारण जातक अपनी भावनाओं पर पूर्ण नियंत्रण नहीं रख पाता तथा व्यर्थ की मानसिक परेशानी झेल रहा है। जातक का चतुर्थेश बुध षष्टभाव में पाप ग्रह मंगल से दृष्टि है जिसके कारण जातक मानसिक रोग से ग्रस्त है। इस प्रकार हम देख सकते हैं कि जयोतिषीय विवेचना द्वारा किसी भी जातक के मानसिक रोग का विश्लेषण हम सरलता पूर्वक कर सकते है।


परा विद्यायें विशेषांक  अकतूबर 2010

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