हृदय रोग और ज्योतिष

हृदय रोग और ज्योतिष  

कार्डियाॅलाॅजिकल सोसाइटी के एक सर्वेक्षण के अनुसार हृदय रोग शहरों में 6ः और ग्रामीण क्षेत्रों में 3ः पाया जाता है। कुछ समय पूर्व तक यह रोग प्रौढ़ और वृद्ध लोगों में ही पाया जाता था। किंतु आज बच्चे और युवा भी इससे पीड़ित होते देखे जाते हैं। अमेरिका जैसे सम्पन्न देश में यह 2ण्6ः मगर भारत जैसे प्रगतिशील देश में 7ण्5ः जनसंख्या में पाया जता है। इस प्रकार हम देखते हैं कि 100 करोड़ की जनसंख्या में 7.5 करोड़ लोग हृदय रोग जैसी घातक बीमारी से पीड़ित हैं और इसके 10 करोड़ लोगों तक पहुंचने की संभावना है। इनमें से लगभग 28 लाख हृदय रोगी प्रति वर्ष मौत के मुंह में पहुंच जाते हैं। प्रतिवर्ष 25 लाख व्यक्ति इस रोग से पीड़ित हो रहे हैं। यह स्थिति तब है जब हमारे देश में चिकित्सा विज्ञान ने बहुत प्रगति की है। हृदयाघात के कई कारण हो सकते हैं, लेकिन मुख्य कारण हमारे खान पान में अनियमितता है। देखा गया है कि हृदय रोगी में चर्बी का चयापचय असंतुलित हो जाता है जिससे रक्त में कोलेस्ट्राॅल बढ़ जाता है और धमनियों में रुकावट आ जाती है। इस रुकावट के कारण रक्त और आॅक्सीजन की मात्रा हृदय में कम पहुंचती है और धमनियों का लचीलापन कम होने लगता है। पोषण कम होने से हृदय दुर्बल हो जाता है और एक समय आता है जब वह निष्क्रिय हो जाता है। एक कारण रक्त का थक्का अर्थात थ्राॅम्बोसिस भी हो सकता है जो हृदयाघात की संभावना को प्रबल करता है। हृदय रोगों के 15 कारणों में से लगभग 10 ”आहार“ से जुड़े होते हैं। यहां इस रोग के ज्योतिषीय कारणों का विश्लेषण प्रस्तुत है: त्रिक भावों के स्वामी के रूप में सूर्य, मंगल या शनि अगर चतुर्थ या पंचम भाव में हो तो हृदय रोग को प्रबल कर देता है। इनके ऊपर राहु/केतु का प्रभाव हृदयाघात की संभावना बना देता है। हृदय रोगकारक नक्षत्र: भरणी, कृत्तिका, ज्येष्ठा, स्वाति, विशाखा, आद्र्रा, उत्तरा फाल्गुनी। तिथियां: दोनों पक्षों की 11, 12, 14, 15 और 30। जिनका जन्म शुक्ल पक्ष में हुआ हो उन्हें ये तिथियां कृष्ण पक्ष में तंग करती हैं और जिनका जन्म कृष्ण पक्ष में हो उन्हें शुक्ल पक्ष में तंग करती हंै। कारण: आयुर्वेद में कहा गया है कि रोग त्रिदोषों के कुपित होने पर होते हैं। ”माया मुग्धस्य जीव सज्ञेयोऽश्रतुर्विधः।“ हृदयदौर्बल्य सत् तृष्णां संतापश्चित् विभ्रम। माया से मुग्ध मनुष्य का हृदय दुर्बल होता है और वह झूठी तृष्णा, संताप तथा दिग्भ्रम से ग्रस्त होता है। किसी भी कुंडली में हृदय रोग के लिए कर्क, सिंह, वृश्चिक, मीन, मकर और कुंभ राशियां तथा लग्न व इनके अधिपति और चतुर्थ और पंचम भाव जिम्मेदार हैं। इनके अतिरिक्त इस रोग के कुछ कारक योग भी हैं जिनमें प्रमुख इस प्रकार हैं: Û जन्म काल में सूर्य का कुंभ राशि में होना। Û सिंह का लग्न और केतु का लग्न नक्षत्र होना। Û सिंह का लग्न और मकर व कुंभ राशियों में दुष्ट ग्रहों का होना। Û मिथुन लग्न के लोगों में तनाव। Û सूर्य का कर्क में तथा चंद्र का सिंह में होना और सूर्य का राहु से पीड़ित होना। Û शनि या गुरु का षष्ठेश होकर चतुर्थ भाव में स्थित होना। Û मंगल, गुरु और शनि का चतुर्थ भाव में स्थित होना। Û पंचमेश के नवांशेश का पाप ग्रह होकर षष्ठ भाव में स्थित होना। Û हृदय रोगकारक ग्रहों का उनकी दशा अंतर्दशाओं और सूर्य, दिन तथा जन्म नक्षत्रों में होकर एक ही नारी में स्थित होना। Û दशम भाव में किसी क्रूर या पापी ग्रह का होना। गीता में कहा गया है ”ध्यायतो विषयान्पुसेः“ विषयों का चिंतन करने वाले पुरुष की उनमें आसक्ति हो जाती है। आसक्ति उन विषयों की कामनाएं उत्पन्न करती है और जब उन कामनाओं में विघ्न पड़ने लगता है तो पुरुष को क्रोध होता है। क्रोध करने से हृदय रोग होता है। तिग्यांशौ वैरिनाथे खल विहगयुते तुर्यगे सूर्य सूनौ। हृद्रोगी वान्पतौ वा भवति हृदि नरः कृष्णपित्ती संकपः (गणे जातकालंकार अथयोगाध्याय श्लोक 12) जिस कुंडली में सूर्य षष्ठेश हो और दुष्ट ग्रह से युक्त होकर चतुर्थ भावगत हो उस कुंडली का जातक हृदयरोगी होता है। ”जातक तत्वम“ ”तुर्यगाइज्याशर्कजाहृद्रोगी“ गुरु, मंगल और शनि चतुर्थ स्थान में हों तो व्यक्ति हृदय रोगी होता है। हृद्रोगी पंचमे पापे सपापे च रसातले क्रूरषष्टयंशसंयुक्ते शुभ दृग्योगवर्जिते (जातक पारिजात अध्याय 13 श्लोक 69) यदि चतुर्थ व पंचम स्थानों में पाप ग्रह हों और पाप षष्ठ्यांश में हों तो जातक को हृदय रोग होता है, किंतु शुभ ग्रह का योग हो तो ऐसा नहीं होता। परिचय Û भारत में हृदय रोग काफी तेज़ी से बढ़ रहा है। 20 से 40 वर्ष के आयु खण्ड, जिसे सुरक्षित समझा जाता है, में भी यह रोग प्रायः देखने को मिल रहा है। Û एक चिकित्सकीय सर्वेक्षण जो इंग्लैंड में किया गया था, में कुछ चांैकाने वाले तथ्य सामने आए। Û यूरोप में, खासकर फिनलैंड, आयरलैंड और इग्लैंड के लोगों में यह रोग ज्यादा पाया जाता है। Û एक चैथाई पुरुषों की मौत का कारण यह रोग है। एक तिहाई स्त्रियों की मौत का कारण भी यही रोग है। प्रारंभिक हृदयाघात और एन्जाइना से संबद्ध जो तथ्य सामने आये हैं वे इस प्रकार हंै। आयु पुरुष स्त्री 50 वर्ष 30ः 2ः 60 ष् 10ः 6ः 70 ष् 21ः 11ः 2002 में करीब 7.1 करोड़ अमेरिकियों को यह रोग हुआ जबकि भारत और पाकिस्तान में इस रोग का प्रकोप यूरोप और अमेरिका से ज्यादा है। रोग के लिए जिम्मेदार कारण Û आहार व कोलेस्ट्राॅल Û धूम्रपान Û रक्तचाप Û मोटापा Û शराब का सेवन Û मधुमेह Û तनाव Û शारीरिक गतिविधि का कम होना Û पारिवारिक इतिहास ज्योतिषीय विश्लेषण के माध्यम से उन सभी कारणों को जानकर इस रोग के प्रति सतर्कता बरती जा सकती है और बचाव किया जा सकता है। हमने ‘बार चार्ट’ के माध्यम से सभी ग्रहों, नक्षत्रों व भावों का विश्लेषण किया और पाया कि प्रत्येक ग्रह किसी भाव, राशि व नक्षत्र विशेष में रहने पर हृदय रोग का कारण बनता है। सूर्य: सूर्य 2रे व 4थे भावों में, धनु व कुंभ राशियों में और चित्रा, विशाखा, पूर्वाषाढ़ा, उत्तराषाढ़ा व उत्तरा भाद्रपद नक्षत्रों में हो तो हानिकारक होता है। चंद्रमा: चंद्रमा 5वें, 8वें या 12वें भाव में, मेष, वृष या मीन राशि में तथा अश्विनी, कृत्तिका, मघा, पूर्वा फाल्गुनी, उत्तरा फाल्गुनी, अनुराधा, मूल या उत्तरा भाद्रपद नक्षत्र में हो तो कष्टकारी होता है। मंगल: मंगल 4थे, 5वें या 6ठे भाव में, वृष, सिंह, धनु या मकर राशि में और अश्लेषा, पूर्वा फाल्गुनी या उत्तरा फाल्गुनी नक्षत्र में कष्टकारी होता है। बुध: बुध 2रे, 3रे या 11वें भाव में, वृष, धनु, कुंभ या मीन राशि में और रोहिणी, मघा, अनुराधा, पूर्वाषाढ़ा, उत्तराषाढ़ा, शतभिषा या उत्तराभाद्रपद नक्षत्र में हानिकारक होता है। गुरु: गुरु दूसरे या अष्टम भाव में मेष, कन्या, धनु या मकर राशि में और भरणी, उत्तरा फाल्गुनी, हस्त, श्रवण, मूल, पूर्वाषाढ़ा या उत्तराषाढ़ा नक्षत्र में कष्टकारी होता है। शुक्र: शुक्र 2रे, 9वें या 12वें भाव में, मेष, कन्या, वृश्चिक, धनु या मीन राशि में और अश्विनी, भरणी, रोहिणी, उत्तरा फाल्गुनी, श्रवण, विशाखा, ज्येष्ठा , मूल, उत्तराषाढ़ा, उत्तरा भाद्रपद या रेवती नक्षत्र में हानिकारक होता है। शनि: शनि 1ले, 3रे या 6ठे भाव में, कर्क, तुला, मकर या मीन राशि में और पुनर्वसु, श्रवण, पूर्वाषाढ़ा, धनिष्ठा या उत्तरा भाद्रपद नक्षत्र में कष्टकारी होता है। राहु: राहु प्रथम, 5वें या 8वें भाव में, 1ले, 2रे, 3री या 5वीं राशि में अश्विनी, आद्र्रा, मघा या विशाखा नक्षत्र में कष्टकारी होता है। केतु: केतु 2रे, 7वें या 11वें भाव में तुला, वृश्चिक, धनु या कुंभ राशि में और अश्विनी, चित्रा, विशाखा, ज्येष्ठा, मूल, पूर्वाषाढ़ा, धनिष्ठा, शतभिषा या उत्तरा भाद्रपद में कष्टकारी होता है। लग्नानुसार मिथुन, सिंह या धनु लग्न के जातकों को हृदय रोग की संभावना ज्यादा होती है। इसी प्रकार लग्नेश अगर भरणी, अश्लेषा, हस्त, ज्येष्ठा या धनिष्ठा में हो तो इसकी संभावना प्रबल हो जाती है।


कृष्णमूर्ति पद्धति, मेदिनीय ज्योतिष और वास्तु विशेषांक  जुलाई 2005

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