उज्जयिनी की कुछ विशेषताएं १) यहाँ पर भगवान सूर्य, भगवान शिव और भगवती शक्ति स्वरूपा एक साथ विराजमान हैं २) भगवान श्री कृष्ण का अध्ययन स्थली उज्जयिनी ३) भारतीय ज्योतिष में काल की गणना का स्थान उज्जयिनी ४) विश्व में एकमात्र दक्षिण मुखी ज्योतिर्लिंग उज्जयिनी ५) भगवान सूर्य नारायण के विलक्षण पुत्र अंगराज कर्ण के अंतिम संस्कार का स्थान उज्जयिनी ६) देवी रति को कामदेव की प्राप्ति का स्थान उज्जयिनी ७) यहाँ 7 सागर, 9 नारायण, 108 हनुमान और 84 विशेष शिव लिंग (जिनकी स्थापना भी भगवान शिव शंकर ने ही की)। 8) स्वर्ग की यात्रा करने वाली विश्वभूमि का एक मात्र टुकड़ा। 9) क्षिप्रा में स्वयं गंगा वर्ष में एक बार अपने पाप धोने आती हैं। 10) एशिया का सबसे बड़ा और सिद्ध श्मशान 11) भगवान नरसिंह के क्रोध की शांति का स्थान 12) भगवान राम ने अपने पिता का श्राद्ध यहीं किया। 13) मंगल ग्रह की उत्पत्ति का स्थान 14) भगवान कृष्ण के द्वारा नौ ग्रहों की स्थापना का स्थान 15) यमराज का कदाचित् एकमात्र अति प्राचीन मंदिर। श्रवहप त्ंर - 9871292741 धार्मिक जानकारी जानिए शिवजी क्यों करते हैं इतने विचित्र शृंगार, क्या हैं इसके कारण शिव के स्वरूप का विशिष्ट प्रभाव अपनी अलग-अलग प्रकृति को दर्शाता है, जिसके अंतर्गत यदि हम पौराणिक मान्यता से देखें तो हर आभूषण का विशेष प्रभाव तथा महत्व बताया गया है। जानिए शिवजी के हर शृंगार का अर्थ - पैरों में कड़ा: यह अपने स्थिर तथा एकाग्रता सहित सुनियोजित चरणबद्ध स्थिति को दर्शाता है। योगीजन भी शिव के समान ही एक पैर में कड़ा धारण करते हैं। अघोरी स्वरूप में भी यह देखने को मिलता है। मृगछाला: इस पर बैठकर साध् ाना का प्रभाव बढ़ता है। मन की अस्थिरता दूर होती है। तपस्वी और साधना करने वाले साधक आज भी मृगासन या मृगछाला के आसन को ही अपनी साधना के लिए श्रेष्ठ मानते हैं। रुद्राक्ष: यह एक फल की गुठली है। इसका उपयोग आध्यात्मिक क्षेत्र में किया जाता है। माना जाता है कि रुद्राक्ष की उत्पत्ति भगवान शंकर की आंखों के जलबिंदु (आंसू) से हुई है। इसे धारण करने से सकारात्मक ऊर्जा मिलती है। नाग: भगवान शिव परम योगी, परम ध्यानी, परम तपस्वी हैं। जब अमृत मंथन हुआ था, तब अमृत कलश के पूर्व गरल (विष) को उन्होंने कंठ में रखा था। जो भी विकार की अग्नि होती है, उन्हें दूर करने के लिए शिव ने विषैले नागों की माला पहनी। खप्पर: माता अन्नपूर्णा से शिव ने प्राणियों की क्षुधा शांति के निमित्त भिक्षा मांगी थी, इसका यह आशय है कि यदि हमारे द्वारा किसी अन्य प्राणी का कल्याण होता है, तो उसको प्रदान करना चाहिए। डमरू: संसार का पहला वाद्य। इसके स्वर से वेदों के शब्दों की उत्पत्ति हुई। इसलिए इसे नाद ब्रह्म या स्वर ब्रह्म कहा गया है। त्रिशूल: देवी जगदंबा की परम शक्ति त्रिशूल में समाहित है, यह संसार का समस्त परम तेजस्वी अस्त्र है, जिसके माध्यम से युग युगांतर में सृष्टि के विरुद्ध सोचने वाले राक्षसों का संहार किया है। राजसी, सात्विक और तामसी तीनों ही गुण समाहित हैं, जो समय-समय पर साधक को उपासना के माध्यम से प्राप्त होता रहता है। शीश पर गंगा: संसार की पवित्र नदियों में से एक गंगा को जब पृथ्वी की विकास यात्रा के लिए आह्वान किया गया, तो पृथ्वी की क्षमता गंगा के आवेग को सहने में असमर्थ थी, ऐसे में शिव ने अपनी जटाओं में गंगा को स्थान देकर सिद्ध किया कि आवेग की अवस्था को दृढ़ संकल्प के माध्यम से संतुलित किया जा सकता है। चंद्रमा: चूंकि चंद्रमा मन का कारक ग्रह माना गया है, चंद्र आभा, प्रज्ज्वल, धवल स्थितियों को प्रकाशित करता है जो मन के शुभ विचारों के माध्यम से उत्पन्न होते हैं। ऐसी अवस्था को प्राणी अपने यथायोग्य श्रेष्ठ विचारों को पल्लवित करते हुए सृष्टि के कल्याण में आगे बढ़ें। गोला, भोला ज्योतिष मंच (रजि.) मो. 9971873978 धन लाभ पाने के 12 अचूक उपाय 1. धन के लेन-देन संबंधी कोई भी काम करने के लिए सोमवार और बुधवार को चुनें। इस दिन किया गया धन का लेन-देन फायदेमंद माना जाता है। 2. घर की दीवारों या फर्श पर पेंसिल या चाॅक आदि के निशान न बनाने दें, इससे कर्ज बढ़ने की संभावना रहती है। 3. सफेद रंग के सामान जैसे दूध, खीर, सफेद फूल, चावल आदि का दान करने से धन प्राप्ति के योग बनते हैं। 4. घर की धन संबंधी परेशानियां दूर करने के लिए आटे में शक्कर मिला कर काली चींटियों को खिलाएं। 5. खाने के लिए बनाई जा रही पहली रोटी या चावल का कुछ भाग गाय को खिलाएं, ऐसा करने से घर में दरिद्रता नहीं रहती। 6. आटे के लिए गेहूं शनिवार को पिसवाने का नियम बनाएं, हो सके तो गेहूं में थोड़े से काले चने भी मिला दें। इसके अलावा शनिवार के दिन खाने में किसी न किसी तरीके से काले चने का प्रयोग करें। 7. सुबह घर के किसी भी सदस्य के नाश्ता करने से पहले घर की झाड़ू जरूर लगा लें। 8. घर में शाम के समय झाड़ू-पोंछा नहीं करना चाहिए। ऐसा करने से लक्ष्मी रूठ जाती है। 9. घर में स्थापित भगवान की मूर्तियों या तस्वीरों पर रोज सुबह स्नान करके कुंकुम, चंदन और फूल चढ़ाएं। 10. लक्ष्मी को प्रसन्न करने के लिए हर गुरुवार को किसी एक सुहागन स्त्री को सुहाग की सामग्री दान देने का नियम बनाएं। 11. चेकबुक, पासबुक या पैसे के लेन-देन से जुड़े कागजों को श्रीयंत्र, कुबेर यंत्र आदि के पास रखें। 12. घर की तिजोरी में लक्ष्मी यंत्र या कुबेर यंत्र जरूर रखें. ऐसा करने से तिजोरी में धन हमेशा बना रहता है। पं कंवल कान्त भारद्वाज 886011799 किस वृक्ष के उपयोग से मनुष्य को किस प्रकार का फल मिलता है। - जो मनुष्य अपने घर में फलदार पेड़, पौधे आदि लगाता है और उसकी भली भांति देखभाल करता है, उसे आरोग्य की प्राप्ति होती है। - जो मनुष्य 5 वट वृक्षों का रोपण और उसका पालन किसी चैराहे या मार्ग में करता है तो, उसकी सात पीढ़ियां तर जाती हैं। - जो भी व्यक्ति बिल्व वृक्ष का रोपण शिव मंदिर में करता है वह अकाल मृत्यु से मुक्त हो जाता है। - जो मनुष्य नीम के वृक्ष जितने अधिक लगाता है उतनी अधिक उसकी पीढ़ियां तर जाती हैं। - घर में तुलसी, आंवला, निर्गुण्डी, अशोक आदि के वृक्ष शुभ फलदायी होते हैं। - शीशम के 11 वृक्ष सड़क पर लगाने से लोक और परलोक दोनों ही संवर जाते है। - कनक चम्पा के 2 वृक्ष लगाने वाले का सर्वार्थ कल्याण हो जाता है। - 5 या अधिक महुआ के वृक्षों का रोपण और पालन करने वाला धन प्राप्त करता है तथा उसे अनुरूप यज्ञों का फल भी प्राप्त होने लगता है। - 10 पीपल के वृक्षों का रोपण करने वाला इस लोक में तो कीर्ति प्राप्त करता है, मृत्योपरांत भी मोक्ष को प्राप्त होता है। - जो भी मनुष्य 2 या 2 से अधिक मौलश्री के वृक्षों का रोपण एवं पालन करता है। वह एक सौ यज्ञों को करने का पुण्य प्राप्त करता है। - जो भी मनुष्य 5 या अधिक अशोक वृक्ष का रोपण और पालन करता है, उसके घर परिवार में कभी भी अकाल मृत्यु नहीं होती है। उसके यहां अचानक कोई बड़ी मुसीबत खड़ी नहीं होती तथा उसे आगामी जन्म में पुण्यात्मा होने का सौभाग्य प्राप्त होता है।


हनुमत आराधना एवं शनि विशेषांक  जून 2016

फ्यूचर समाचार के जून माह के हनुमत आराधना एवं शनि विशेषांक में अति विशिष्ट व रोचक ज्योतिषीय व आध्यात्मिक लेख दिए गये हैं। कुछ लेख जो इसके अन्तर्गत हैं- श्री राम भक्त हनुमान एवं शनि देव, प्रेम की जीत, शनि देव का अनुकूल करने के 17 कारगर उपाय, वाट्सएप और ज्योतिष, शनि ग्रह का गोचर विचार आदि। इनके अतिरिक्त स्थायी स्तम्भ में जो लेख प्रकाशित होते आए हैं। स्थायी स्तम्भ में भी पूर्व की भांति ही लेख सम्मिलित हैं।

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