पोलियो : जानलेवा बीमारी से बचाव आचार्य अविनाश सिंह बचपन में होने वाली बीमारियों में से 'पोलियो' एक है। आयुर्वेद में इसे शैशवीय पक्षवध, या अधरांग वात कहा जाता है; अर्थात् शरीर के ऊपरी, या निचले भाग का निष्क्रिय, या संवेदना शून्य हो जाना। पक्षवध, यानी इस भाग से कोई कार्य नहीं हो सकता। उस अंग पर ऐच्छिक नियंत्रण नहीं रह जाता। पोलियो का प्रभाव बच्चे-बूढे़ दोनों पर ही होता है। बूढों को होने वाले पोलियो को अंधरांग वात कहते हैं और बच्चे को होने वाले पोलियो को पक्षाघात, या शैशवीय पक्षवध कहते हैं। आधुनिक चिकित्सा शास्त्र में बच्चों को होने वाले पोलियो को पोलियो मेलाइटिस कहते हैं। रोग के कारण : पोलियो एक शीघ्र उत्पन्न होने वाला संक्रामक रोग है। यह तीन प्रकार के पोलियो विषाणु से उत्पन्न होता है, जिन्हें पोलियो मेलाइटिस वायरस प् प्प् प्प्प् कहते हैं। मानव जाति में पहले और तीसरे प्रकार के विषाणुओं से यह रोग होता है। संक्रमण के बाद इसकी उत्पत्ति 7 से 15 दिन में होती है। मानव शरीर इन जीवाणुओं का आश्रय स्थान है। मक्खी, गंदगी, दूषित दूध, या पानी से शरीर में विषाणु का संक्रमण होता है। मुंह, या गुदा से भी इन विषाणुओं का संक्रमण होता है। पाचन संस्थान में पहुंचने के बाद इनकी संखया बढ़ने लगती है। वहां से ये विषाणु खून में और खून से वातवाहक नाड़ी में पहुंच जाते हैं। इनके प्रसार के अनुरूप ही रोग की अवस्थाएं होती हैं और किसी भी अवस्था में रोग को रोका जा सकता है। रोग के लक्ष्ण : पहली अवस्था में संक्रमण का आभास ही नहीं होता। विषाणु अन्नवाही प्रणाली में रह कर संखया में बढ़ने लगते हैं। यहां किसी प्रकार के लक्षण नहीं पाये जाते। दूसरी अवस्था में विषाणु खून में प्रवेश करने की स्थिति में पहुंच जाते हैं। सिर दर्द, बुखार, गले में खराश इसके लक्षण हैं। यदि दूसरी अवस्था में रोक-थाम न हो, तो विषाणु वात नाड़ी संस्थान में प्रवेश कर जाते हैं। यह तीसरी अवस्था है। इसमें मस्तिष्क के आवरणों में उत्तेजना के लक्षण पाये जाते हैं। सिर दर्द, गर्दन में जकड़न और कड़ेपन का अनुभव होता है। इस अवस्था में पक्षाघात नहीं होता और धीरे-धीरे शरीर के अन्य अंगों में कड़ापन महसूस होता है। जबसे रोग के लक्षण देखें, बच्चे को एक-दो सप्ताह बिस्तर पर पूर्ण आराम करने दें, क्योंकि थोड़ी सी भी चोट, या भाग-दौड़ इस अवस्था को पोलियो में बदल सकती है। इंजेक्शन लगाने और रीढ़ की हड्डी से पानी निकालने का प्रयास भी न करें। पोलियो होने की अवस्था : पोलियो एक साल की उम्र के बच्चों में, बिना किसी लक्षण, या 1 से 4 दिन के बुखार के बाद हो सकता है। इसलिए छह सप्ताह से नौ माह तक बच्चे को, एक-एक माह के अंतराल में, पोलियो निरोधक औषधि की पांच खुराकें पिलाएं। पहली खुराक सिर्फ पोलियो, दूसरी, तीसरी, चौथी खुराकों के साथ ट्रिपल एंटिजन के इंजेक्शन और पांचवी सिर्फ पोलियो की खुराक दिलवाएं। पहला बूस्टर डेढ़ से दो वर्ष के बीच और दूसरा बूस्टर साढ़े चार से पांच वर्ष के बीच, सिर्फ एक बार देने चाहिएं। आयुर्वेद के अनुसार पोलियो, अर्थात् वात व्याधि में रोगी की मालिश करनी चाहिए और सेंक देनी चाहिए। पोलियोग्रस्त भागों पर बलातेल, भाषतेल से मालिश करें। बच्चों का कोष्ठ मृदु होता है। इसलिए उन्हें मुनक्का, गुलाब की कली, अगरवध जैसे द्रव्यों का हल्का विरेचन देना चाहिए। स्नायु की पीड़ा कम करने के लिए और उनकी शक्ति वापस लाने के लिए अग्नितुंडी रस, एकांगवीर रस, बृहद्वात चिंतामणि, बृहदकस्तूरी भैरव जैसी दवाइयां, बच्चे की आयु के अनुसार, उचित मात्रा में देनी चाहिएं। ये सभी दवाइयां वैद्य की सलाह से ही लेनी चाहिएं। बचाव : रोग के बारे में सतर्क रहना चाहिए। रोग की जानकारी और उससे मुक्ति पाने के उपाय समझने चाहिएं। यह रोग तीन साल के पहले बच्चे में पाया जाता है। दूसरे साल में इस रोग के होने की संभावना अधिक हो, तो काल के हिसाब से देखा जाए, तो पूरे साल तक यह रोग हो सकता है। बरसात में, यानी जून से सितंबर माह में इसका खतरा ज्यादा बढ़ जाता है। इस माह में सर्दी, जुकाम, खांसी, या हल्का बुखर आये, तो सतर्क रहना चाहिए। अधिक भीड़, या तैरने की जगह पर बच्चों को न ले जाएं। ट्रिपल एंटिजन के इंजेक्शन लगवाने के पहले पोलियो की खुराक पिला दें। उपचार : उड़द, कौंचाबीज, एरंड की जड़, इनको समान भागों में ले कर, सोलह गुना पानी में, धीमी आंच पर उबालें। जब पानी चौथाई रह जाए, तब उसमें हींग और जीरे का चूर्ण मिला कर रखें। इस काढ़े के 1-1 चम्मच दिन भर में पांच बार बच्चे को पिलाएं। पोलियोग्रस्त बच्चे के लिए व्यायाम एक श्रेष्ठ उपाय है। बच्चे के पैर में धीरे-धीरे ताकत लाने के लिए उन्हे किसी सहारे से खड़ा करना चाहिए। बच्चों को चलने के लिए प्रोत्साहित करना चाहिए। बच्चों के आहार में उड़द, गाय का घी, काला मुनक्का, छुहारा, इनका अधिक उपयोग करें। ये पदार्थ मांसपेशियों का बल बढ़ाने वाले हैं। ज्योतिषीय दृष्टिकोण : पोलियो शीघ्र उत्पन्न होने वाला संक्रामक रोग है, जो विषाणुओं से उत्पन्न होता है और इसके कारण शरीर का कोई भी भाग निष्क्रिय, या संवेदनाशून्य हो जाता है। ज्योतिषीय दृष्टि से देखा जाए, तो संक्रमण राहु-केतु से होता है। निष्क्रियता का संबंध सूर्य और चंद्र से है। क्योंकि पोलियो में विकलांगता भी है, इसलिए शनि का प्रभाव भी विशेष महत्व रखता है। लग्न, लग्नेश, सूर्य, चंद्र यदि दुष्प्रभावों में रहेंगे, तो पोलियो रोग, या अधरांग वात हो सकती है। अंगों में निष्क्रियता किसी भी आयु में आ सकती है, लेकिन बचपन में होने वाली निष्क्रियता को पोलियो कहते हैं। इसलिए उपर्युक्त ग्रहों का प्रभाव बचपन में ही होगा, अर्थात् ग्रहों की दशांतर्दशा गोचर बचपन में ही रहेगा, तो पोलियो हो सकता है। विभिन्न लग्नों में पोलियो रोग : मेष लग्न : सूर्य षष्ठ भाव में चंद्र के साथ हो, राहु, या केतु से दृष्ट हो, लग्नेश मंगल अष्टम भाव में, बुध सप्तम भाव में, शनि एकादश भाव में हो, तो पोलियो हो सकता है। वृष लग्न : सूर्य लग्न में केतु के साथ हो, शनि की सूर्य पर दृष्टि हो, चंद्र, शुक्र से युक्त, एकादश, या द्वादश भाव में हो, तो पोलियो जैसा रोग हो सकता है। मिथुन लग्न : सूर्य लग्न में, या चतुर्थ भाव में हो, बुध अस्त हो, मंगल दशम भाव में चंद्र के साथ हो और केतु से दृष्ट हो, शनि सप्तम भाव में हो और गुरु केंद्र में हो, तो पोलियो होता है। कर्क लग्न : लग्नेश चंद्र शनि से युक्त दशम भाव में हो, सूर्य द्वादश भाव में हो और राहु केतु से दृष्ट हो, बुध लग्न में हो, तो पोलियो होने की संभावना रहती है। सिंह लग्न : सूर्य षष्ठ भाव में शनि से युक्त, या दृष्ट हो, राहु लग्न में, या लग्न पर दृष्टि रखता हो, बुध पंचम भाव में चंद्र से युक्त हो, तो पोलियो की संभावना रहती है। कन्या लग्न : लग्नेश त्रिक भावो में सूर्य से अस्त हो और केतु के प्रभाव में भी हो, मंगल लग्न में, या लग्न को देखता हो, शनि अपनी शत्रु राशि में हो और चंद्र पर उसकी दृष्टि हो, तो पोलियो होने की संभावना रहती है। तुला लग्न : शुक्र अष्टम भाव में और गुरु लग्न में हो, शनि सूर्य से अस्त हो, राहु की दृष्टि लग्नेश पर हो, चंद्र राहु-केतु के प्रभाव में हो, तो पोलियो होता है। मकर लग्न : गुरु लग्न में हो, शनि सूर्य से अस्त हो कर त्रिक भावों में हो, चंद्र केतु से दृष्ट, या युक्त हो, मंगल सप्तम भाव में हो, तो पोलियो हो सकता है। कुंभ लग्न : लग्नेश षष्ठ भाव में सूर्य से अस्त हो, केतु लग्न में, या लग्न पर दृष्टि रखे, बुध सप्तम भाव में चंद्र से युक्त हो और गुरु की लग्न पर दृष्टि हो, तो पोलियो रोग होता है। मीन लग्न : शुक्र लग्न में राहु, या केतु से युक्त, या दृष्ट हो। सूर्य तृतीय, या एकादश भाव में हो और शनि से युक्त, या दृष्ट हो, चंद्र द्वितीय भाव में बुध से युक्त हो, तो पोलिया रोग होता है। उपर्युक्त सभी योग चलित कुंडली पर आधारित हैं। रोग की उत्पत्ति संबंधित ग्रह दशा-तंतर्दशा और गोचर ग्रह के प्रतिकूल रहने से होता है। जब तक दशा-अंतर्दशा प्रतिकूल रहेंगे, शरीर में रोग रहेगा। उसके बाद ठीक हो जाएगा। लेकिन ठीक अवस्था में भी पाचन संस्थान में कुछ व्याधि रहेगी।



श्री विद्या एवम दीपावली विशेषांक  नवेम्बर 2010

श्रीविद्या व दीपावली विशेषांक फ्यूचर समाचार पत्रिका का अनूठा विशेषांक है जिसमें आप रहस्यमी श्रीविद्या, श्रीयंत्र व महालक्ष्मी पूजन की दुर्लभ विधियों के साथ-साथ इस अवसर पर इस महापूजा की पृष्ठभूमि के आधारभूत संज्ञान से परिचित होकर लाभान्वित होंगे।

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