इस बार 3 नवंबर 2010 को धनत्रयोदशी या धनतेरस का पर्व मनाया जाएगा। कार्तिक कृष्णपक्ष त्रयोदशी को धन्वन्तरि जयंती और धनत्रयोदशी दोनों ही मनाने का विधान है। इस दिन घर में नई वस्तु खासकर बरतन, सोना-चांदी खरीद कर लाने का विधान एवं परंपरा है। इस दिन धन का अपव्यय नहीं किया जाता तथा किसी को उधार भी नहीं दिया जाता। इसलिए कुछ लोग खासकर व्यापार में लेन-देन करने से भी बचते हैं। ऐसी मान्यता है कि धनतेरस के दिन धन का अपव्यय रोकने से अगले वर्ष धन का संचय होता है। इस दिन प्रदोषकाल में घर के बाहर यम के लिए दीपदान करना चाहिए। ऐसा करने से घर के सदस्यों को अकालमृत्यु का भय नहीं रहता है। आयुर्वेद के प्रवर्तक धन्वन्तरि की जयंती भी प्रमुखता से मनाई जाती है। नरक चतुर्दशी 4 नवंबर 2010, कार्तिक कृष्णपक्ष चतुर्दशी को नरक चतुर्दशी या नरक चैदस के रूप में मनाने की परंपरा है। कुछ जगहों पर इसे छोटी दीपावली के रूप में तथा अधिकांश स्थानों पर हनुमान जयंती के रूप में मनाते हैं। इस दिन कुबेर की भी पूजा की जाती है। इस तिथि को रूप चैदस के रूप में भी मनाने की परंपरा है। प्रातःकाल सूर्योदय से पहले उठकर तुंबी (लौकी) को सिर पर से घुमाने के बाद स्नान करने से रूप और सौंदर्य बना रहता है तथा लोग नरकगामी होने से भी बच जाते हैं। यह भी मान्यता है कि भगवान ने इसी दिन वामन के रूप में अवतार लिया था। इस दिन दान करने से लक्ष्मी की कृपा प्राप्त होती है। इस दिन निशामुखी वेला में दीपदान भी करना चाहिए। दीपावली इस वर्ष दीपावली 5 नवंबर 2010 को मनाई जाएगी। हिंदुओं के लिए इस पर्व का अत्यधिक महत्व है। वैसे पूरे भारत वर्ष में और अन्य देशों में भी जहां भारतीय मूल के लोग हंै, यह पर्व सभी संप्रदायों एवं धर्मों को मानने वालों के द्वारा हर्ष एवं उल्लास के साथ मनाया जाता है। इस दिन लोग बड़ी श्रद्धा और विश्वास के साथ लक्ष्मी एवं गणेश का पूजन करते हैं। दीपावली की रात्रि को महानिशीथ काल की संज्ञा दी गई है। तंत्र की साधना, लक्ष्मी पूजा एवं काली पूजा के लिए इस रात्रि से बढ़कर कोई भी समय नहीं होता। अतः साधक एवं भक्त लोग इस रात्रि की प्रतीक्षा में रहते हैं एवं इसकी पूजा एवं उपासना में पूरे मनोयोग से सम्मिलित होते हैं। इस दिन सभी घरों, दुकानों एवं व्यापारिक प्रतिष्ठानों में महालक्ष्मी का पूजन अवश्य होता है। व्यापारी लोग खाता-बही, तिजोरी एवं तुला की पूजा भी करते हैं। प्रत्येक स्थान को दीप जलाकर प्रकाशित किया जाता है क्योंकि यह प्रकाशपर्व भी है। इस दिन मिठाइयां एवं उपहारों को बांटने की परंपरा भी है। दीपावली के दिन लक्ष्मी की पूजा करने से उनकी कृपा अवश्य प्राप्त होती है। और भक्तों एवं साधकों के धन तथा समृद्धि की वृद्धि होती है। लक्ष्मी की पूजा के लिए सायंकाल में वृषभ एवं निशीथ काल में सिंह लग्न अधिक प्रशस्त माना गया है क्योंकि शास्त्रकारों के अनुसार लक्ष्मी की पूजा के लिए स्थिर लग्न ही फलदायी माना गया है। गोवर्धन पूजा 6 नवंबर 2010, कार्तिक शुक्लपक्ष प्रतिपदा गोवर्धन पूजा तथा अन्नकूट का पर्व मनाया जाएगा। इस दिन ब्रज में गोवर्धन पूजा एवं परिक्रमा का विधान है। लोग अपने गोधन की पूजा करते हैं एवं गोवंश के संवर्धन का प्रण लेते हैं। यह दिन विश्वकर्मा जयंती के रूप में भी मनाया जाता है। चित्रगुप्त जी की पूजा भी इसी दिन की जाती है। भाईदूज दिनांक 7 नवंबर 2010 कार्तिक शुक्ल पक्ष द्वितीया को भ्रातृद्वितीया या यमद्वितीया के रूप में मनाने का रिवाज है। इसे भाई दूज भी कहा जाता है। इस दिन यमुना में स्नान, दीपदान आदि का महत्व है। इस दिन बहनें, भाइयों के दीर्घजीवन के लिए यम की पूजा करती हैं और व्रत रखती हैं। जो भाई इस दिन अपनी बहन से स्नेह और प्रसन्नता से मिलता है, उसके घर भोजन करता है, उसे यम के भय से मुक्ति मिलती है। भाइयों का बहन के घर भोजन करने का बहुत माहात्म्य है। छठ दिनांक 11 नवंबर 2010, कार्तिक शुक्लपक्ष षष्ठी को सूर्यषष्ठी व्रत या छठ पर्व मनाया जाएगा। सूर्य, जो साक्षात नारायण स्वरूप हैं, की पूजा और आराधना का भारतीय समाज में बहुत महत्व है। सूर्य की आराधना से स्वास्थ्य, समृद्धि एवं पुत्रलाभ होता है। सूर्यषष्ठी व्रत या छठ व्रत का अनुष्ठान बिहार एवं उत्तरप्रदेश में अत्यधिक श्रद्धा और भक्ति के साथ किया जाता है। षष्ठी के सायंकाल एवं सप्तमी के प्रातःकाल में सूर्य भगवान को अघ्र्य दिया जाता है। आश्विन शुक्लपक्ष एवं कार्तिक मास व्रत पर्वों आदि की दृष्टि से अत्यधिक महत्वपूर्ण हैं। कार्तिक मास में प्रातः गंगास्नान, गंगातटवास एवं दीपदान का बहुत बड़ा माहात्म्य है।


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