हथेली पर ग्रहों का स्थान एक अध्ययन

हथेली पर ग्रहों का स्थान एक अध्ययन  

हथेली पर ग्रहों का स्थान एक अध्ययन पं. सत्यनारायण जांगिड़ स्वभाव और भाग्य की दृष्टि से हाथों को छः सात भागों में बांटा गया। प्रत्येक वर्ग या विभाजन का अलग संकाय रखा गया। इस प्रकार हाथ की बनावट को देख लेने भर से ही जातक के स्वभाव का कच्चा चिट्ठा सामने आ जाता है। इसके साथ-साथ अंगुलियां, कर पृष्ठ (हथेली के पीछे का भाग), हाथों के रोएं या बाल, नाखून व अंगुलियों, अंगूठों के जोड़ आदि के संबंध में एक पूरा शास्त्र गढ़ दिया गया है। हथेली पर ग्रहों की अवधारणा हथेली में क्योंकि ग्रह अपने स्थान से उठ जाते हैं या खिसक जाते हैं अतः इनको एक नाम पर्वत भी दिया गया है। हथेली को छोटे-छोटे नौ हिस्सों (पर्वत या क्षेत्र) में विभाजित कर प्रत्येक हिस्से को एक पृथक व स्वतंत्र नाम दिया गया है व आसानी के लिए इनको सौर मंडल के ग्रहों के नाम पर इनका नामकरण कर दिया गया है। आयरलैंड के विश्व प्रसिद्ध हस्तरेखा शास्त्री श्री काऊंट लूइस हेमन (कीरो) भी यह मानते हैं कि इन नामों की स्थापना अटकल या कल्पना पर आधारित है। कीरो ने स्वयं इन ग्रहों को ज्यादा महत्व नहीं दिया था। परंतु यह निश्चित है कि ग्रहों के हथेली पर उन्नत होने पर जीवन में भौतिक सुख की प्राप्ति होती है। यह एक संपूर्ण सत्य है। अगर ग्रह क्षेत्र उन्नत नहीं है तो जीवन में सफलता विशेष रूप से भौतिक सफलता कम ही मिलती है। धन की हमेशा परेशानी बनी रहती है। हथेली पर जिन नौ ग्रहों की स्थापना की गई है वे हैं- सूर्य, चंद्रमा, मंगल, बुध, बृहस्पति, शुक्र, शनि, राहु और केतु। इन सभी को अपना एक पृथक स्थान आवंटित है जैसा कि इस चित्र में दिखाया गया है। सबसे विशाल स्थान शुक्र और चंद्रमा को आमने-सामने दिया गया है। मंगल को दो क्षेत्रों का स्वामी बनाया गया है। अंगूठे के पास का मंगल स्थान नकारात्मक कहलाता है और चंद्रमा के ऊपर का मंगल सकारात्मक कहा गया है। हथेली के मध्य भाग को राहु का क्षेत्र कहा जाता है। जन्मकालीन ग्रहों का प्रभाव हथेली के पर्वतों पर भी होता है। यदि जन्मकुंडली भाग्यशाली ग्रहों को दर्शाती है तो सभी ग्रह हथेली में अपने स्थानों पर उभर आते हैं। अक्सर यह भी देखने में आता है कि जन्म कुंडली में जो ग्रह अकारक हो वह भी हथेली में उन्नत ही दिखाई देता है। इस प्रकार वह अपने प्रभाव की बजाए अपने स्वभाव को दर्शाता है। हथेली में बृहस्पति का सीधा संबंध बुद्धि से है। जन्मकुंडली में वह चाहे किसी भी भावों का स्वामी क्यों न हो हथेली में जिन लोगों के गुरु क्षेत्र का अभाव है अर्थात बृहस्पति दबा हुआ है, ऐसे जातक अत्यंत सामान्य बुद्धि के होते हैं। और मात्र भोगी बन कर जीवन को नष्ट कर देते हैं। ये लोग श्रमशील जीवन बिताते हैं और बुद्धि को कम-से-कम उपयोग में लेते हैं। अक्सर अविकसित बृहस्पति के जातक कुएं के मेंढ़क पाये जाते हैं। शोध के दौरान यह भी सामने आया कि अविकसित या अर्धविकसित गुरु के क्षेत्र के स्वामी धार्मिक प्रवृत्ति के पाये गए। दूसरी तरफ गुरु प्रधान या उन्नत और विकसित गुरु के स्वामी प्रखर बुद्धि वाले होते हैं। जीवन में मिली उपलब्धियों से संतुष्ट न होने वाले ये जातक इधर-उधर हाथ पांव मारते रहते हैं और 40 वर्ष की आयु के आते-आते समाज में एक निश्चित और प्रतिष्ठित स्थान बना लेते हैं। यदि बृहस्पति का पर्वत अन्य पर्वतों की तुलना में बहुत ज्यादा उभार लिए हो तो ऐसा जातक अभिमानी होता है। बृहस्पति ग्रह के पास व मध्यमा अंगुली के ठीक नीचे जो स्थान शनि अधिकृत है वह गुफा की तरह गंभीर प्रवृत्ति को व्यक्त करता है। बहुत अधिक हाथों में इसे अविकसित पाया गया। कुछ मामलों में यह बृहस्पति पर्वत से भी जा मिलता है। जिन लोगों की हथेलियों में एक मात्र शनि ही विकसित हो वे आवश्यकता से ज्यादा गंभीर होते हैं। ये लोग एकांतवास पसंद करते हैं और कम से कम लोगों से मेल रखते हैं। प्रायः ये लोग निगूढ़ विद्याओं में कुछ असर रखते हैं। अनामिका के नीचे का क्षेत्र जिसको सूर्य का क्षेत्र कहते हैं, स्वतंत्र रूप से उठा हुआ नहीं देखा गया। जिन लोगों के हाथ में यह क्षेत्र गढे्दार है वे अपनी शिक्षा पूर्ण नहीं कर पाते। अच्छे और पूर्ण विकसित सूर्य क्षेत्र के स्वामी समाज में प्रतिष्ठित और धनिक होते हैं। ऊपर के चारों ग्रहों के समान ही सूर्य की भी स्थिति रहती है। यदि तीन अन्य ग्रह अविकसित हैं तो सूर्य भी प्रायः अविकसित ही होगा। अकेला गुरु प्रधान जातक मिल सकता है तथापि अकेला सूर्य प्रधान जातक बहुत कम देखने में आता है। सूर्य प्रधान लोग समाज को नेतृत्व प्रदान करते हैं। यदि सूर्य रेखा भी बलवान हो तो जातक को राजनीति में सफलता प्राप्त होती है। कनिष्ठिका अंगुली के ठीक नीचे का स्थान जिन लोगों के उठावदार हों वे अधिकारी वर्ग के जातक होते हैं। यदि इस पर्वत पर दो चार खड़ी रेखाएं हो तो जातक जीवन में सफल रहता है। अच्छे बुध प्रधान जातक अपने आस-पास एक प्रतिष्ठा का घेरा बना कर रखते हैं। ये बहुत वाकपटु और चालाक होते हैं। उच्च पदस्थ अधिकारियों के हाथों में बुध की प्रधानता देखी गई है। वाणी पर इनका विशेष अधिकार होता है। जिस जातक का मंगल विकसित होता है वे परिवर्तनशील जीवन बिताते हैं। उनमें तुरंत शांत हो जाने वाले क्रोध की मात्रा अधिक होती है। ये लोग रोगों का शीघ्रता से शिकार बनते हैं। यह ग्रह स्थान अधिक आड़ी तिरछी रेखाओं के जाल से युक्त हो तो जातक का जीवन बहुत उतार-चढ़ाव पूर्ण रहेगा। प्रायः जीवन में संघर्ष रहेगा और लड़ाई झगड़े होते रहेंगे। बहुत सी बाधाएं आ कर जीवन में समस्याएं पैदा करती हैं। दुःसाहसी लोगों के हाथों में मंगल को पूर्ण विकसित पाया गया है। मंगल आत्मविश्वास देता है परंतु व्यक्ति को जल्दबाज भी बनाता है। चंद्रमा का क्षेत्र कल्पनाशक्ति और बुद्धि का कारक है। कल्पनाशील व्यक्तियों के हाथों में इसे विकसित पाया गया है। जिन जातकों के हाथों में चंद्रमा का पर्वत अविकसित हो या इस पर आड़ी तिरछी रेखाओं का जाल हो तो ऐसा जातक पेट संबंधी रोगों से ग्रस्त रहता है। जीवन के आरम्भिक काल में इनको दुर्भाग्य का भी सामना करना पड़ सकता है। चंद्रमा के स्थान पर गहरा गड्ढा हो तो जातक मानसिक रूप से परेशान रह सकता है। ऐसे लोगों के पारिवारिक संबंधों में वैमनस्य और परस्पर सामंजस्य का अभाव होता है। राहु और केतु को हथेली में सर्वमान्य स्थान नहीं प्राप्त है। तथापि जैसा कि चित्र में दर्शाया है वे स्थान राहु और केतु के लिए वर्तमान में निर्धारित किये गये हैं। यदि भाग्य रेखा राहु क्षेत्र से आरंभ हो तो वह अपने सही समय की बजाए देरी से फलित करती है। राहु के क्षेत्र अर्थात हथेली के मध्य में गहरापन हो तो भी जातक जीवन भर अभावग्रस्त ही रहता है। केतु के स्थान से जातक को अचानक मिलने वाली संपत्ति के बारे में पता लगाया जाता है। केतु का स्थान विकसित हो या इस स्थान पर कोई शुभ चिह्न हो तो जातक को धन का अभाव नहीं होता। शुक्र के क्षेत्र के संबंध में एक स्थूल तथ्य तो यह उभर कर सामने आया है कि जिन जातकों के हाथों में एक मात्र शुक्र का क्षेत्र ही विकसित हो और शेष ग्रह विकसित नहीं हो या अर्धविकसित हों तो ऐसा जातक बुद्धिहीन और स्थूल विचारों का होता है। इस श्रेणी के कुछ जातकों का दांपत्य जीवन भी उलझा हुआ मिला। शुक्र से संबंधित जो तथ्य अब तक प्रचारित हैं वे सब शोध के निष्कर्ष में खरे नहीं उतरे। अधिकतर तथ्य तो विपरीत ही प्राप्त हुए हैं। जैसे शुक्र से संबंधित यह एक सर्वमान्य तथ्य है कि जिन जातकों के शुक्र का क्षेत्र पूर्ण विकसत हो वे लोग सौंदर्यप्रिय, जीवन शक्ति से ओत-प्रोत, कला पारखी और संगीत के शौकीन होते हैं। परंतु उपरोक्त उन्नत शुक्र का फलित सर्वदा विपरीत ही दिखाई देता है। बड़े-बड़े शुक्र के स्वामियों को सीधा-साधा जीवन जीते देखा गया है। वे कला, साहित्य व संगीत से परिचित ही नहीं न उनकी इनमें रूचि ही मिली। अच्छे शुक्र प्रधान व्यक्ति कला या सौंदर्य के क्षेत्र में भी काम करते नहीं पाये गये। वे सभी कठिन कार्य में रत मिले। अनुभव के आधार पर अकेला शुक्र यदि विकसित हो तो व्यक्ति मात्र भोगी ही होता है। लेकिन शुक्र के साथ यदि बृहस्पति, सूर्य और बुध भी पूर्ण विकसित हों तो ही व्यक्ति सफल जीवन जी सकता है। यह तथ्य तो अनुभव में अवश्य आता है कि यदि जन्मकुंडली में शुक्र अस्त हो तो उसका सीधा असर हथेली के शुक्र पर होता है। ऐसी अवस्था में शुक्र भली प्रकार से विकसित या कांतिपूर्ण नहीं रहता है। शुक्र क्षेत्र पर बनने वाला काला धब्बा या बड़ा तिल जातक की काम शक्ति को कम करता है।



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