दीपावली महापर्व ज्योतिष के आइने में

दीपावली महापर्व ज्योतिष के आइने में  

पूर्ण आभामय स्वरूप में सोलह श्रृंगार किये जब पृथ्वी पर महालक्ष्मी का पदार्पण होता है तब यह रात्रि साक्षात महारात्रि बन जाती है जो दीपावली की रात्रि कहलाती है। दीपावली कार्तिक कृष्ण अमावस्या को ही क्यों मनाई जाती है इसका ज्योतिषमय स्वरूप कालपुरुष की कुंडली अनुसार जाना जा सकता है। दीपावली त्योहार ही नहीं अपितु महापर्व है जो पंच दिवसीय उत्सव के रूप में उत्साह एवं उमंग से मनाया जाता है। जीवन में सदैव प्रकाश हो एवं महलक्ष्मी का पदार्पण होकर स्थायी निवास व सुख समृद्धि हो यही कामना की जाती है। सूर्य की कन्या संक्रांति में पितृ श्राद्ध पक्ष मनाया जाता है जिसमें पितरों का पृथ्वी पर आगमन होता है एवं उनको परिवार द्वारा तृप्त किया जाता है। तुला संक्रांति में पितृगण उनके स्व स्थान में प्रस्थान करते हैं। उनके मार्ग दर्शन के लिए दीपदान का विधान अमावस्या (पितृ तिथि) को किया गया है जिससे पितृ प्रसन्न होते हैं। पितरों के प्रसन्न होने से देवतागण भी प्रसन्न होते हैं। देवतागणों की प्रसन्नता से ही महालक्ष्मी से धनागम होता है। अतः दीपदान ही दीपावली पर्व है जो कार्तिक कृष्ण अमावस्या को ही पड़ता है। सूर्य तुला राशि स्वाति नक्षत्र में होता है एवं चंद्रमा भी तुला राशि में होता है। शुक्र भी स्वाति नक्षत्र में विचरण करता है, अतः इस दिन स्वाति नक्षत्र हो तो बहुत सर्वश्रेष्ठ मुहूर्त घटित होता है। इस वर्ष यह योग स्वाति नक्षत्र एवं तुला राशि के चंद्रमा शुक्रवार को घटित हो रहा है अतः सर्वश्रेष्ठ मुहूर्त योग है। ज्योतिषीय दृष्टि से तुला राशि शुक्र कि होती है। शुक्र सर्वभोगप्रद ग्रह है, वीर्यत्व प्रधान है तथा काल पुरुष की कुंडली में सप्तम भाव और धन भाव का स्वामी शुक्र है। हर मानव की मूल प्रवृŸिा धन ऐश्वर्य को प्राप्त कर सुख उपभोग करने की रहती है। शुक्र की राशि तुला में जब सूर्य और चंद्र की स्थिति होगी तब केंद्र त्रिकोण संबंध से लक्ष्मी योग बनेगा क्योंकि सूर्य पंचमेश है और चंद्रमा चतुर्थेश, दोनों की एक ही राशि में युति के कारण चतुर्थेश पंचमेश योग से लक्ष्मी योग बनेगा। नीच का सूर्य अपनी उच्च राशि तथा लग्न मेष को देखकर स्वास्थ्य वृद्धि करेगा। दीपावली के दिन लक्ष्मी के आगमन का विधान है। जब लक्ष्मी आ रही है तो उसका स्वागत व पूजन अभिष्ट है, अतः दीपावली का यह दिन और उसमें प्रदोष वेला लक्ष्मी पूजन से संबंधित बनी है, फिर इसमें सिंह लग्न आए तो तृतीय स्थान व चंद्रमा की युति तो रहेगी। साथ स्वाति नक्षत्र होने एवं नक्षत्र का स्वामी राहू होने से तीसरे स्थान में पराक्रम वृद्धि एवं सर्व बाधा निवारण योग भी बन जाएगा। द्वादशेश चंद्र राहू से पीड़ित होकर खर्च के योग पर नियंत्रण रखेगा। लग्नेश सूर्य उपचय में जाने से बलवान होगा और अपनी नीच राशि में स्थित होकर राहू से पीड़ित होकर विपरीत राज योग से धन वृद्धि करेगा वहां भाग्य की मेष (उच्च) राशि को सप्तम दृष्टि से देखकर भाग्य को भी बलवान करेगा। अतः दीपावली में लक्ष्मी पूजन के लिए सिंह लग्न को महŸाा दी गई है। इस तरह के योग बन जाना भी इस दिन का रोचक तथ्य है। सायं प्रदोष समय या स्वाति नक्षत्र सिंह लग्न में लक्ष्मी प्राप्ति के सभी तरह के अनुष्ठान सिद्ध किये जाते हैं। आधी रात में जब सिंह लग्न आता है उस समय लक्ष्मी का आगमन माना गया है। अर्द्धरात्रे भवेत्येव लक्ष्मी राश्रयिंतु गृहान् ब्रह्मपुराण में ‘‘प्रदोषार्धराव व्यापिन मुरया’’ कहकर अर्द्धरात्रि में लक्ष्मी का पूजन श्रेष्ठ माना है। प्रदोष समये राजन कर्तव्या दीपमलिका कहकर प्रदोष काल में दीपों की पंक्ति से घर सजाने का विधान दिया है और अर्द्धरात्रि तक उसके स्वागत पूजन की तैयारी कही है। लक्ष्मी की बड़ी बहिन ज्येष्ठा अलक्ष्मी के रूप में विख्यात है। उसे प्रातःकाल के पूर्व नगाड़ा, घंटा, ढोल आदि बजाते हुए अपने घर के आंगन से निकालने का विधान, गहने रत्न और भावस्थ पुराण में भी दिया गया है जो ब्रह्म मुहूर्त के पूर्व का समय है। शक्ति गं्रथों ने दीपावली के इस पर्व को त्रिरात्रि पर्व बताया है। महाकाली, महालक्ष्मी और महासरस्वती - इन त्रिगुणात्मिका शक्तियों का पूजन क्रमशः धनतेरस, रूप चैदस व दीपावली में किया जाता है व इन तीनों रात्रियों में अखंड दीपक जलाए जाते हैं। अतः यह त्रिरात्रि उपासना भी है:- इस श्लोक के अनुसार कालरात्रि, धनतेरस और मोहरात्रि दीपावली शिवरात्रि और दारूणा यह है। अतः काल को प्रसन्न करने हेतु धनतेरस की सायं अखंड दीपक जलाने का शाक्त तंत्र में विधान है। कालदर्श में उल्लेख है कि दीपावली के दिनों में अपनी दरिद्रता दूर करने के लिए तीनों ही दिन लक्ष्मी की आराधना करनी चाहिए। प्रत्युष आश्रयुग्दर्शेकृताभ्यंगादि मंगलः। भक्तया प्रपूजये देवीमलक्ष्मी विनिवृचये।। सूर्य आत्मा है (सूर्य आत्माः जगतः सस्थुश्रय), अपने निजका स्वरूप है और चंद्रमा मन है (चंद्रमा मनसो जातः)। अतः अमावस्या एक ऐसा अवसर है जब मन (चंद्रमा) पूर्ण रूप से आत्मा (सूर्य) के समीपतम होकर आत्मरूप होता है। उस दिन आत्मा के प्रकाश से मन आत्मरूप हो जाता है। यही अवस्था मनुष्य का अंतिम ध्येय है। अतः अमावस्या आध्यात्मिक दृष्टिकोण से मन के आत्मरूप हो जाने को दर्शाती हुई ज्योतिष शास्त्र अर्थ की गरिमा को प्रकट करती है। अतः मन के लिए अमावस्या से बढ़कर और कोई महत्वपूर्ण दिन आध्यात्मिक दृष्टिकोण से नहीं है। मौलिक और आर्थिक दृष्टि से सूर्य और चंद्रमा का सामीप्य भले ही शुभ फलप्रद न हो, परंतु आध्यात्मिक दृष्टिकोण से अमावस्या से अच्छा और कोई प्रतीक नहीं हो सकता जो मन और आत्मा के कई भेदों को हम पर प्रकट करने वाला दिन है। फलित ज्योतिष के अनुसार सूर्य और चंद्रमा दोनों राज्य से संबंधित हंै। सूर्य राजा है तो चंद्रमा रानी। आमावस की रात को रानी राजा से मिलती है मानो दोनों प्रेमपूर्वक गले मिलते हों। भगवान राम तो स्वयं राजाधिराज हैं और सीता उनकी अति प्रिय रानी है, चैदह वर्ष के वनवास के बाद अमावस्या की रात्रि को ही उनका वैवाहिक संबंध अयोध्या में लौटकर हुआ था। वनवास में तो वे सन्यासियों के रूप में रहते थे। इस प्रकार राम और सीता का अमावस्या में मिलन ज्योतिष शास्त्र का अनुमोदन लिए हुए है। ज्योतिष शास्त्र अनुसार वस्तुओं के अतिरिक्त चंद्रमा जनता का प्रतिनिधित्व भी करता है। भगवान राम के वनवास के दिनों में अयोध्या की जनता व्याकुल थी कि कब यह अवधि समाप्त हो और उन्हें अपने प्यारे सूर्यवंशी राजा के दर्शनं का सौभाग्य प्राप्त हो। सूर्य से ही सूर्य वंश चलता है। जनता ने (जिसका प्रतिनिधित्व चंद्रमा करता है।) एक ऐसा दिन अपने राजा के स्वागत के लिए चुना जिस समय प्रकृति में भी जनता (चंद्रमा) राजा (सूर्य) से मिल रही हो। वह समय दीपावली का समय है। अतः अनादि काल से यह दीपावली पर्व, जब से मानव ने पैदा होकर ज्योतिष का आश्रय लिया, तब से चला आ रहा है। अतः ज्योतिषमय स्वरूप दीपावली महापर्व प्रकाशवान ज्योति प्रज्ज्वलित करने वाला ज्योतिष पर्व है।


अपने विचार व्यक्त करें

blog comments powered by Disqus
.