संजीवनी व जीवन रेखा

संजीवनी व जीवन रेखा  

अक्षया जन्मपत्रियां ब्रह्मणा निर्मिता स्वयम्। ग्रह रेखाप्रदा यास्यां याववज्जीवं व्यवस्थिता।। अर्थात मनुष्य का हाथ ऐसी जन्मपत्री है जो कभी नष्ट नहीं होती। स्वयं ब्रह्मा जी ने इसे बनाया है। नस्ति हस्तात्परं ज्ञानं त्रेलोक्ये सचराचरे। यदब्रह्मा पुस्तकं हस्ते धृत बोधाय जान्मिनाय।। तीनों लोकों में हस्त ज्ञान सबसे बढ़कर है। इसकी रचना स्वयं ब्रह्मा जी ने की है। वास्तव में यह मनुष्य का मार्गदर्शन करती रहेगी। भारतीय ज्योतिष विज्ञान के अंतर्गत अंग लक्षण विज्ञान का अध्ययन किया जाता है और मनुष्य की शारीरिक संरचना एवं गुण-अवगुण का कथन किया जाता है। सामुद्रिक शास्त्र में भी लक्षण शास्त्र की तरह चलने, उठने-बैठने और अंग पर तिल, मस्सों को देखकर व्यक्ति के विचारों का ज्ञात किया जाता है। मनुष्य के समस्त अंगों की बजाय केवल हाथ से ही गुण, धर्म, स्वभाव और भाग्य को जानने-समझने की तकनीक को अपनाया जा रहा है। इसी तकनीक को हस्तरेखा विज्ञान का नाम दिया। संजीवनी रेखा: जीवन रेखा एक महत्वपूर्ण रेखा है। जीवन रेखा से जीवन प्रवाह देखा जाता है। यह लंबी, तंग व गहरी होनी चाहिए। जीवन रेखा अंगूठे और तर्जनी के बीच से आरंभ होती है और गोलाई लिए हुए शुक्र क्षेत्र को घेरती हुई मणिबंध या उसके समीप तक आती है। इसे गुरुड़ पुराण में कुल रेखा भी कहते हैं। कुल रेखा तु प्रथमा अंगुष्ठादनुवर्तते। भारतीय मत के अनुसार जीवन रेखा को बहुत नामों से जाना जाता है:- 1. पितृ रेखा, 2. गोत्र रेखा, 3. बल रेखा, 4. मूल रेखा, 5. वृक्ष रेखा, 6. धर्म रेखा, 7. धृति रेखा इसी जीवन रेखा को पाश्चात्य मत के अनुसार स्पमि स्पदम अथवा टपजंस स्पदम कहते हैं। प्रत्येक हाथ में इसकी लंबाई कम या ज्यादा हो सकती है। किसी के हाथ में यह रेखा सीधी आगे को बढ़ती है जिससे इसका शुक्र क्षेत्र छोटा हो जाता है। एक अच्छे पामिस्ट को यह सब ध्यान में रखना चाहिए। इसे हमने संजीवनी रेखा का नाम दिया है। प्रकृति ने जिस प्रकार हमारे चेहरे पर नाक, कान के स्थान निर्दिष्ट किए हैं उसी प्रकार हाथ में जीवन रेखा, शीर्ष रेखा तथा अन्य चिन्हों के स्थान भी निर्दिष्ट किए हैं। इसलिए अगर कोई रेखा अपने प्राकृतिक स्थान से हटकर असाधारण स्थिति को ग्रहण कर ले तो असाधारण परिणामों की आशा करना युक्तिसंगत होगा। अगर मनुष्य के स्वाभाविक गुणों में इस प्रकार परिवर्तनों का प्रभाव पड़ सकता है तो उसके स्वास्थ्य पर क्यों नहीं पड़ेगा। हस्त विज्ञान या सामुद्रिक विज्ञान रेखाओं द्वारा रोग और मृत्यु के संबंध में भविष्यवाणी कर सकता है। इस बात को हम सभी स्वीकार करते हैं कि प्रत्येक मनुष्य के शरीर में कीटाणु स्नायुओं के तालमेल को दूषित करते हैं। उसका प्रभाव स्नायु के माध्यम से हाथ पर पड़ता है। इस रेखा पर जीवन की अवधि, रोग और मृत्यु अंकित होती है और अन्य जिन घटनाओं का पूर्वाभास कराती हैं उनकी पुष्टि जीवन रेखा करती है। संजीवनी रेखा कैसी होनी चाहिए जीवन रेखा लंबी, तंग व गहरी होनी चाहिए, चैड़ी कदापि नहीं होनी चाहिए। यह भी देखा जाता है कि प्रायः कोमल हाथ वाले व्यक्ति रोग आदि से लड़ने की कम क्षमता रखते हैं। थुलथुल हाथ वाले कुछ आरामतलब होते हैं जबकि गठीले हाथ वाले शक्तिशाली होते हैं। संजीवनी रेखा के गुण-दोष जीवन रेखा में कुछ अच्छाई होती है और कहीं खराब होने से उसमें दोष आ जाता है। इसलिए जीवन रेखा के गुण-दोषों का संबंध समझना आवश्यक है। 1. गहरी और अच्छी जीवन रेखा प्राणशक्ति और ताकत को बढ़ाती है। 2. चैड़ी और हल्की जीवन रेखा में उपरोक्त दोनों गुणों का ही अभाव होता है। जीवन रेखा के चैड़ी व हल्की होने पर जातक शारीरिक रूप से इतना शक्तिशाली नहीं होता है कि उसमें उपरोक्त गुण पर्याप्त मात्रा में विद्यमान हों और जब जीवन प्रवाह दुर्बल होता है तो बौद्धिक विकास भी पूर्ण नहीं हो सकता। 3. बलवान गहरी और स्पष्ट जीवन रेखा अच्छी होती है। इसमें अच्छी प्राणशक्ति व ताकत होती है किंतु ऐसे हाथ में यदि शुक्र पर्वत बहुत उन्नत हो तो जातक अत्यधिक काम वासना में लिप्त रहकर अपना जीवन नष्ट कर देते हैं। बलवान जीवन रेखा से अच्छी पाचन शक्ति भी प्राप्त होती है किंतु अंगुलियों के तीसरे पोर मोटे व लंबे हों तो उसे रक्तचाप की शिकायत रहती है। 4. यदि किसी की हथेली का रंग गुलाबी हो और बृहस्पति की अंगुली का तीसरा पोर मजबूत हो तो वह बहुत ज्यादा खाने-पीने का शौकीन होता है। वह मिर्गी के रोग का शिकार भी हो सकता है। परंतु उसका ऊपरी मंगल क्षेत्र बहुत उन्नत हो तब ऐसा होता है। 5. तंग और पतली जीवन रेखा से भी जीवन प्रवाह शक्ति सामान्य से कम प्रकट होती है। ऐसे व्यक्ति शारीरिक परिश्रम नहीं कर सकते। उनमें धैर्य की कमी होती है। ये जल्दी बीमार हो जाते हैं और सुस्त भी रहते हैं। 6. कभी-कभी जीवन रेखा छोटी-छोटी रेखाओं में बंटी होती है तब भी जीवन प्रवाह की कमी प्रकट होती है। यह जातक में सामान्य दुर्बलता, गिरा हुआ स्वास्थ्य और स्नायविक कमजोरी प्रकट करती है। ऐसी रेखा वाला व्यक्ति उदास होता है। 7. श्रृंखलाकार जीवन रेखा भी दोषपूर्ण मानी जाती है। रेखा में जहां भी श्रृंखला होगी जातक उस समय बीमार होगा। जो व्यक्ति बचपन में ज्यादा बीमार रहता है उसकी जीवन रेखा आरंभ में किसी अन्य रेखा की तरह या श्रृंखलाबद्ध या दोषपूर्ण होती है। यदि जीवन रेखा कुछ दूरी तक ही श्रृंखलाबद्ध है और आगे अच्छी व दोषरहित है तो जातक उसी अवधि तक अस्वस्थ रहता है जहां तक रेखा श्रृंखलाबद्ध है। 8. यदि यह रेखा श्रृंखलाबद्ध ही नहीं अपितु चैड़ी व हल्की भी हो तो और भी खराब होती है क्योंकि ऐसी जगह दो हानिकारक कारण एकत्रित होते हैं। 9. सीढ़ीनुमा रेखा - यह रेखा छोटे-छोटे खंडों के रूप में होती है। जीवन रेखा का आरंभ: जीवन रेखा साधारणतया बृहस्पति पर्वत के नीचे से शुरू होकर शुक्र पर्वत को घेरती हुई मणिबंध या उसके समीप तक जाती है। अगर रेखा बृहस्पति पर्वत से आरंभ हो तो इससे अभिमान व महत्वाकांक्षा प्रकट होती है। जीवन रेखा का संबंध शीर्ष रेखा और हृदय रेखा से यदि जीवन रेखा शीर्ष रेखा से जुड़ी हो तो इसका तात्पर्य यह है कि जातक काफी बुद्धिमान होगा और तर्क व कारण सहित निष्कर्ष निकालता है। लेकिन व्यक्ति को भावुक भी बनाता है। इसमें स्वतंत्र विचार की कमी हो सकती है। जीवन रेखा से वंश वृद्धि: जीवन रेखा को भारतीय मत के अनुसार गोत्र रेखा या कुल रेखा कहते हैं। दोनों का अर्थ है वंश वृद्धि। इसका अर्थ हुआ कि जिसकी जीवन रेखा सुंदर और बलवान होगी तथा जीवन रेखा से घिरा हुआ भाग गुणयुक्त होगा उसी के कुल की वृद्धि होगी। पुत्र, पौत्र, प्रपौत्र आदि की वृद्धि भी इसी से देखी जाती है। अगर संतान स्वस्थ होती है तो कुल या गोत्र की वृद्धि संभव है। इसलिए भारतीय महर्षियों ने कुल वृद्धि या गोत्र वृद्धि का अर्थ केवल पुत्र तक ही सीमित नहीं रखा है। यदि किसी को निर्बल अवस्था में निर्बल पुत्र हो गया और आगे उसकी वंश वृद्धि नहीं हुई तो गोत्र वृद्धि नहीं मानी जाएगी। पुरुषों तथा स्त्रियों दोनों की संतानोत्पादक शक्ति, शुक्र क्षेत्र तथा जीवन रेखा पर बहुत अधिक मात्रा में अवलंबित है। इसी कारण अंगुष्ठ के नीचे के भाग पर करपृष्ठ की ओर निकली हुई रेखाओं से संतान का विचार किया जाता है। भविष्य पुराण में लिखा है: अंगुष्ठ मूल रेखाः पुत्राः स्युर्दारिकाः सूक्ष्मा। प्रयोग पारिजात में लिखा है- मूलांगुष्ठस्य नृणां स्थूल रेखा भविन्त यावत्यः। तादन्तः पत्राः स्य सूक्ष्माभिः पत्रिकास्ताभि।। अर्थात् अंगूठे के मूल में जो स्थूल रेखाएं हों उन्हें पुत्र रेखा तथा जो सूक्ष्म रेखाएं हों उन्हें कन्या रेखा समझना चाहिए। स्त्रियों के हाथ में भी इन्हीं रेखाओं को संतान रेखा माना जाता है। मोटी रेखाएं हों उतने पुत्र और जितनी कटी हुई रेखाएं हों उतनी कन्या संतानें होंगी। जीवन रेखा या आयु रेखा द्वारा समय का निर्धारण: मनुष्य की आयु प्रमाण सौ वर्ष ही वर्णित किया गया है जो कि ऋषियों द्वारा वेद मंत्रों में किया गया है। किंतु इस वर्तमान युग में मनुष्य की आयु का प्रमाण निर्धारित नहीं हो सकता है क्योंकि हम यही देखते हैं कि बच्चा मां के पेट से लेकर 100 वर्ष की अवस्था तक किसी समय भी मृत्यु को प्राप्त हो सकता है। इसलिए शत प्रतिशत ठीक बात तो ईश्वर के अतिरिक्त कोई नहीं जानता है। फिर भी श्वासों की गिनती के अनुसार सुंदर, साफ और स्पष्ट जीवन रेखा को देखकर यह अनुमान लगाया जा सकता है कि अमुक व्यक्ति वर्षों की गणना के अनुसार वर्षों की अमुक संख्या तक जीवित रह सकता है। फिर भी जिन मनुष्यों की अवस्था 100 से अधिक होती है उनकी आयु या जीवन रेखा मणिबंध से कलाई तक पहुंच जाती है। फिर छोटी आयु वाले व्यक्ति की जीवन रेखा छोटी और बड़ी आयु की जीवन रेखा बड़ी होती है। आधुनिक और प्राचीन सभी हस्त विशेषज्ञों में अपनी-अपनी गणना के अनुसार इस आयु विभाग गणित में कुछ अंतर तथा मतभेद अवश्य ही रहा है। देखने में अभी तक यही आया है कि यूरोप निवासियों से करीब-करीब सभी ने सप्तवर्षीय नियम को अपना है और भारतीय प्राचीन गं्रथों ने पंचवर्षीय नियम को अपनाकर अपना निर्णय लिया है। रेखाओं के आधार पर घटनाओं का निश्चित समय तय किया जा सकता है। समय निर्धारण मुख्यतः जीवन रेखा के आधार पर किया जाता है। कुछ लोग शनि रेखा का भी प्रयोग करते हैं नीचे कुछ रीतियां इस प्रकार हैं- मनुष्श् को यह मानना होगा कि दुःखमय जीवन से छुटकारा हमें ईश्वर ही दे सकता है उसी पर भरोसा करे। अगर कोई दुःख है तो उसे स्वीकार करके तन-मन अर्पण करके ईश्वर से प्रार्थना करे कि इस कष्ट को भोगने की शक्ति दे। ईश्वर अच्छे सुख के दिन लायेगा विश्वास करे। जो ईश्वर के भक्त हैं वह कहते हैं- 1. भगवान ने जो परिस्थिति दी वह साधन रूप है। विश्वास करके उसे बरतो, फल महान अनूप है। 2. श्विासहीन मनुष्य को सर्वत्र अन्धा कूप है। विश्वास से ही मिलते हरि विश्वास प्रभु का रूप है। अतः मनुष्य को सुख के लिए नित्य प्रयत्न करते रहना चाहिए यही ज्योतिष शास्त्र के ज्ञान के उद्देश्य हैं।

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परा विद्यायें विशेषांक  अकतूबर 2010

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