विवादित वास्तु

विवादित वास्तु  

प्रश्न: सीढ़ियां कहां तथा किस दिशा में होनी चाहिए? इसके गलत स्थान व दिशा में होने से घर में लोगों को क्या समस्याएं हो सकती हैं? इसको ठीक करने में प्रभावी उपाय क्या हो सकते हैं? उत्तर: ‘वास्तु में सीढ़ियां महत्वाकांक्षा, उपलब्धि, प्रगति एवं सफलता का प्रतीक हं। रावण, स्वर्ग तक सीढ़ियां बनाना चाहता था, यह रामायण में उल्लेखित है। उपरोक्त प्रतीक होने के कारण इन्हें सदैव सुंदर एवं स्वच्छ रखें। यदि सीढ़ियों में कोई टूट-फूट हो रही है तो वह प्रगति के मार्ग को अवरूद्ध करती है, अतः इसकी मरम्मत कर इन्हें ठीक करवायें ताकि प्रगति होती रहे। टूटी-फूटी सीढ़ियां अशांति, कलह व झगड़े आदि उत्पन्न करती है। 1. दिशा जातक का भूखंड किसी भी दिशा को देखता हुआ क्यों न हो, इसे सदैव र्नैत्य (द. प.) में बनवानी चाहिए। इस दिशा में बनवायी गयी सीढ़ियां धन-संपत्ति व स्वास्थ्य वृद्धि विवादित वास्तु आई. एल. खत्री करती है। र्नैत्य के अलावा दक्षिण या पश्चिम दिशा में भी इन्हें बनवाना शुभ रहता है, कोई हानि नहीं होती है। सावधानी इन्हें कभी भी ईशान (उ. पू.) अथवा पूर्व या उत्तर दिशा में नहीं बनवानी चाहिए नहीं तो गृहस्वामी (मुखिया) के लिये हानिकारक होती है। इसके अलावा यह अड़चनें, धननाश, व्यापार में हानि, नौकरी में परेशानी एवं कलह का कारण बनती है। संतान पक्ष भी प्रभावित होता है। धन संपत्ति में बाधा व परिवार में अशांति बनी रहती है। पुत्र संतान प्राप्ति की संभावना कम हो जाती है। बच्चों पर भी बुरा प्रभाव पड़ता है। पेशेगत परेशानी, धनहानि तथा कर्ज वृद्धि की समस्या उत्पन्न हो जाती है। उपाय यदि किसी के भवन में ईशान कोण में सीढ़ियां बनी हैं तो हटा दें या भवन के र्नैत्य कोण में एक कमरा ऊपरी मंजिल पर बनाने से यह वास्तुदोष समाप्त हो जाता है। इस बनाये गये कमरे की ऊंचाई, सीढ़ियों की गुमठी (हेडरूम/छत) से अधिक हो। भवन का र्नैत्य भाग ऊंचा व भारी तथा ईशान भाग नीचा व हल्का होना चाहिये। 2. वायव्य या आग्नेय कोण में निर्माण करने से बच्चों में परेशानी बढ़ती है। 3. ब्रह्मस्थान (मध्य) में निर्माण करने से कई प्रकार के कष्ट मिलते हैं, तनाव होता है। इसके अलावा मध्य में बनाने पर बंटवारा भी जल्दी हो जाता है। संख्या वास्तु अनुसार सीढ़ियों की संख्या विषम होनी चाहिए ताकि जिस पांव से व्यक्ति सीढ़ियां चढ़ना आरंभ करे, उसी पांव पर सीढ़ियां समाप्त करे या आखिरी सीढ़ी पर पहुंचे। विषमगत संख्या में निकालने के लिये तीन का भाग देते हैं। भागफल, विषम में जाये और शेष दो बचे। शून्य या 1 नहीं। इस प्रकार गणना करने पर सीढ़ियों की न्यूनतम संख्या 5 पांच होती है तथा इससे आगे 11, 17, 23, 29, 35, 41 आदि के क्रम से बढ़ती हैं। अर्थात् 5, 11, 17, 23 ....... सीढ़ियों की संख्या की गणना ‘इंद्र-यम-राज’ क्रम में करनी चाहिये। अतः सम संख्या में कभी भी सीढ़ियों का निर्माण न करवायें। घुमाव आजकल घुमावदार या गोलाकार सीढ़ियों का प्रचलन भी बढ़ रहा है। ये वास्तु अनुसार शुभ एवं उत्तम नहीं मानी जाती है क्योंकि ये घर के मुखिया के लिये ठीक नहीं रहती है। यदि ऐसी सीढ़ियां बनवानी ही पड़े तो चढ़ते समय व्यक्ति दाहिनी तरफ मुड़ता हुआ जाये अर्थात् घड़ी की सुइयों की दिशा में (क्लाकवाइज)। बायीं तरफ या एन्टीक्लाकवाइज घुमावदार सीढ़ियां नहीं होनी चाहिए। र्नैत्य (दक्षिण-पश्चिम) कोण दिशा में सीढ़ियों का निर्माण इस तरह करवायें कि उतरते समय व्यक्ति का मुंह, उत्तर या पूर्व की ओर रहे। सीढ़ियों को पूर्व से पश्चिम अथवा उत्तर से दक्षिण दिशा की ओर चढ़ती हुई बनवायें। घुमावदार सीढ़ी में एक सीढ़ी, यम (काल) घर पर अवश्य आनी चाहिए। घुमावदार सीढ़ियों को लक्ष्मी का प्रतीक माना जाता है। 4. गुमटी (हेडरूम या छत) सीढ़ियों की छत पर एक गुमटी अवश्य बनानी चाहिए। इसे खुला नहीं रखना चाहिए। सीढ़ियों के ऊपर व नीचे द्वार (दरवाजा) अवश्य रखना चाहिये तथा नीचे के द्वार से ऊपर का द्वार ऊंचाई में बारह भाग कम हो। अर्थात नीचे का द्वार 12 भाग बड़ा हो। गुमटी की ऊंचाई भवन के र्नैत्य भाग की ऊंचाई से कम रखें। आमतौर पर गुमटी की ऊंचाई साढ़े 6 या 7 फीट हो तथा रोशनी के लिये जाली भी लगानी चाहिये। खुला होना हानिप्रद रहता है। अतः यहां पर स्लैब या टीन आदि का इस्तेमाल करना चाहिए। 5. ऊंचाई प्रत्येक सीढ़ी की ऊंचाई समान होनी चाहिये अर्थात् एक सीढ़ी से दूसरी सीढ़ी की ऊंचाई बराबर हो। ये इस प्रकार रखें कि चढ़ने वाले व्यक्ति को कोई समस्या नहीं लगे, इन पर आसानी से चढ़ जाये। सुविधाजनक सीढ़ियों में ऊंचाई 6 या 7 इंच रखनी चाहिए। सबसे उत्तम ऊंचाई 9 इंच होती है तथा पांव पसार 10 इंच रखना चाहिए। 6.ब्रह्मस्थान (मध्य या केंद्र स्थान) इसे सदैव खुला रखना चाहिये क्योंकि यह ब्रह्माजी का स्थान है। इस पर सीढ़ियां नहीं बनवानी चाहिये, नहीं तो मानसिक तनाव आदि कई प्रकार के कष्ट मिलते हैं। इसके अलावा, भवन के प्रवेश द्वार के सामने सीढ़ियां नहीं बनवानी चाहिये। सीढ़ियां घर के भीतर बनवाना ही ठीक रहता है। भूलकर भी इसे घर से बाहर न बनवायें। 7. जीना 1. यदि भवन के र्नैत्य में जीना बनवाना हो तो इस प्रकार से बनवायें कि यह पूर्व से पश्चिम की ओर बढ़े तथा इसकी लैंडिंग के बाद यह दायीं ओर घुमकर पूर्व की ओर ही खुले। 2. जीना बनवाते समय इस बात का ध्यान अवश्य रखें कि इसमें रेलिंग अवश्य लगी हो। यह रेलिंग किसी भी तरह की हो सकती है। 3. जीने की प्रथम सीढ़ी, तिकोनी या गोलाई में न बनवायें। 4. जहां जीना समाप्त होता है वहां वेध करता है। अतः जीना चढ़ने के बाद घर या कमरे में सीधा न खुलकर घूमकर खुले। जीना कमरे या बैठक में खुलने से परिवार में अशांति रहती है। 8. निषिद्ध सीढ़ियों के नीचे खाली स्थान में शौचालय, स्नानगृह, पूजाघर, रसोई, तिजोरी आदि न बनवायें। शौचालय बनवाने से स्वास्थ्य खराब होता है। बवासीर भी हो सकता है। पूजाघर या तिजोरी बनवाने से भारी विपत्तियों आदि का सामना करना पड़ता है। सीढ़ियों के नीचे दुकानें आदि भी नहीं बनानी चाहिये अन्यथा चल नहीं पाती। इस स्थान का उपयोग कबाड़घर, स्टोररूम आदि के लिये कर सकते हैं। सीढ़ियों का आरंभ घर में उपरोक्त वस्तुओं की जगह से भी नहीं होना चाहिये। सीढ़ियों पर जूते-चप्पल, झाड़ू, बाल्टी, मग आदि कम महत्वपूर्ण सामान भी न रखें। अनावश्यक भार न डालें। सीढ़ियों को बेडरूम से भी नहीं खुलना चाहिये। घर के मुख्य द्वार के पास या सामने सीढ़ियां न बनायें। यदि मुख्य द्वार के खुलने पर या मेहमानों के घर में प्रवेश करते समय सीढ़ियां दिखे तो यह भी वास्तु दोष उत्पन्न करता है। इन्हें दीवार या दरवाजा लगाकर बंद करायें या फिर पार्टीशन द्वार ढंककर वास्तु दोष दूर कर सकते हैं। ऊपर की मंजिलों पर जाने वाली सीढ़ियां तथा तलघर में जाने वाली सीढ़ियां एक नहीं होनी चाहिए। बाउन्ड्री वाल के ऊपर सीढ़ियों का निर्माण या टिकाव नहीं हो। बाउन्ड्री वाल से कुछ दूरी पर इनका निर्माण कराये। ऐसी सीढ़ी जो घर के चारों ओर घूमती हुई हो व्यक्ति/परिवार को लगातार अशांति में घेरे रहती है तथा अनेक विपत्तियों का कारण बनती है। अतः ऐसी सीढ़ी न बनायें। 9. अन्य सुझाव 1. सीढ़ियों की ऊंचाई, चैड़ाई ऐसी रखें कि इन पर आसानी से चढ़ व उतर सकें। 2. सुविधाजनक, सुंदर, स्वस्थ व कलात्मक सीढ़ियां अच्छे वास्तु की निशानी है। 3. सीढ़ियों के टूटे किनारे या टूट-फूट, दरार आदि वास्तुदोष उत्पन्न करते हैं। अतः इन्हें सही करायें। 4. सीढ़ियों के दोनों ओर दीवार नहीं होने पर रेलिंग या हत्थे अवश्य लगवायें। यह सुरक्षा का कार्य करेंगे ताकि गिरकर कोई दुर्घटना न हो। 5. सीढ़ियों में सदैव हल्के रंगों का प्रयोग करें। राशि अनुरूप उपयुक्त रंग को हल्के राड में रंगे। 10. विभिन्न दिशाओं में प्रवेश द्वार एवं सीढ़ियां वास्तु में प्रवेश द्वार की सीढ़ियों का एक विशेष ही महत्व है। (बाहरी सीढ़ियों के लिए) 1. ईशान (उत्तर-पूर्व) कोण: उत्तरी दीवार पर प्रवेश द्वार हैं तो उसकी सीढ़ियों का पश्चिमी भाग सपाट और पूर्वी भाग क्रमशः तिकोना होकर नीचे उतरना चाहिये। इससे धन (लक्ष्मी) का आगमन बढ़ जाता है। 2. इसके पूर्वी दीवार पर प्रवेश द्वार हं तो उसकी सीढ़ियों का दक्षिणी हिस्सा सपाट बनवायें और उत्तरी हिस्सा तिकोना होते हुये नीचे उतारं। इससे घर में धन की वर्षा होती है। ईशान कोण के उत्तरी व पूर्वी प्रवेश द्वार की किसी भी तरह की अकेली या संयुक्त सीढ़ियों की पाठियां ज्यादा ऊंची नहीं होनी चाहिए और सीढ़ियां जितने नीचे तक जा सके, ले जायें। इससे सौभाग्य लक्ष्मी प्रसन्न होकर धन वर्षा करती है। इसमें ही दक्षिण और पश्चिम दिशा में स्थित प्रवेश द्वार बड़े और चैड़े होने चाहिए तथा उनकी सीढ़ियां भी विशाल और चैड़ी होनी चाहिए। इससे धन लक्ष्मी का घर में आगमन होता है तथा परिवार के सदस्यों में प्रेम स्नेह बना रहता है। इन दोनों ही दिशाओं के अतिरिक्त धनागमन के लिये ऊंचे -ऊंचे चबूतरे भी बनाने चाहिये। यदि किसी पूर्वमुखी फ्लैट या भवन के ठीक सामने सीढ़ियां हैं तो इससे मान-सम्मान में कमी आती है। भवन निर्माण से पूर्व ऐसा नहीं होना चाहिये। यदि ऐसी स्थिति भवन में है तो इसके सुधार हेतु घर के बाहर ‘‘कनवेक्स मिरर (हाफ राउंड)‘‘ लगवाना उचित रहता है। यदि यह नहीं मिले तो फेंगशुई का गैजेट पाकवा दर्पण लगाकर वास्तुदोष में सुधार कर सकते हैं। पूर्वमुखी भवन या दुकान हेतु बाहर जाने की सीढ़ियां पूरी दुकान या भवन की लंबाई में चैड़ी सीढ़ियां बना सकते हैं। यदि ऐसा नहीं हो पूर्व आग्नेय (द. पू.) से दुकान/भवन के बीच तक चबूतरा बनाकर ईशान में सीढ़ियों का निर्माण कर सकते हैं। ऐसी स्थिति में सीढ़ियां उत्तर-ईशान (पू. उ.) तक बनानी होगी। वायव्य कोण: (उ. प.) - यदि प्रवेश द्वार वायव्य कोण की उत्तरी दीवार में है तो बाहर सीढ़ियां उत्तरी दीवार पर पूर्व से उत्तर की ओर चढ़ते हुये बना सकते हैं। यह स्थिति शुभ रहती है। - यदि प्रवेश द्वार वायव्य कोण की पश्चिमी दीवार में है तो अंदर जाने के लिये पश्चिमी दीवार पर पश्चिम से दक्षिण की ओर सीढ़ियां द्वार तक ले जा सकते हैं। वायव्य कोण के सामने सीढ़ी के बीचों-बीच त्रिकोण पर गमले रखकर उपाय करने पर धन की वर्षा होती है। चारा ओर उन्नति भी होती है। - यदि आग्नेय (द. पू.) या र्नैत्य (द-प.) में प्रवेश द्वार दक्षिणी दीवार पर है तब प्रवेश द्वार तक सीधी सीढ़ियां ऊपर तक बनाना शुभ व लाभकारी होता है। - आग्नेय कोण की दक्षिणी दीवार और वायव्य कोण की पश्चिमी दीवार पर बड़े प्रवेश द्वार ही होने चाहिये और इस ओर के कमरों के दरवाजे भी प्रवेश द्वार की सीध में होने चाहिये। इससे धन का आगमन अधिक होता है। - पश्चिम सिंह द्वार वाले भवन या दुकान की सीढ़ियां वायव्य में या फिर र्नैत्य से भवन/दुकान के बीच तक चबूतरे बनवाकर,बचे आधे भाग वायव्य में बना सकते हैं। यदि हो सके तो बीच में अर्धचंद्राकार सीढ़ियां बनाना भी शुभ रहता है। - उत्तरमुखी द्वार वाले दुकान या भवन की सीढ़ियां ईशान में बना सकते हैं। वायव्य से ईशान तक पूरे में सीढ़ियां बना सकते हैं। यदि संभव हो तो वायव्य से बीच तक चबूतरे बनवाकर ईशान में सीढ़ियां बनानी चाहिए। - दक्षिणी मुख वाले दुकान या भवन की सीढ़ियां दक्षिण, आग्नेय में बनानी चाहिये अथवा दक्षिण-आग्नेय से दक्षिणी र्नैत्य तक पूरे में सीढ़ियां बना सकते हैं। यदि संभव हो तो बीच में अर्धचंद्राकार सीढ़ियां भी बना सकते हैं। -उत्तरमुखी और दक्षिणमुखी भवनों में सीढ़ियां घर के बाहर पूर्वी या पश्चिमी दीवार को छूते हुए बनायें। - ईशान कोण में उत्तरी और पूर्वी दिशा में, आग्नेय कोण में दक्षिण दिशा में तथा वायव्य कोण में पश्चिमी दिशा में सीढ़ियां घर के बाहर बनाना शुभ रहता है। यहीं से प्राणिक ऊर्जा का प्रवेश होता है तथा साथ ही लक्ष्मी जी (धन) का भी आगमन होता है। - घुमावदार सीढ़ियों में बाजार की बनी बनाई स्टील या एल्यूमीनियम धातु की सीढ़ियों का उपयोग मुख्यतः आग्नेय या वायव्य कोण में नहीं करना चाहिए क्योंकि ये दोनों ही धातुएं इन दोनों कोणों में वास्तुदोष उत्पन्न करती है। इन कोणों में ईंट व सीमेंट की सीढ़ियां ही वास्तु अनुसार अनुकूल एवं शुभ रहता है।



पराविद्या विशेषांक  जुलाई 2013

फ्यूचर समाचार पत्रिका के पराविद्या विशेषांक में शिक्षा के क्षेत्र में सफलता/असफलता के योग, मानसिक वेदना, विवाह के लिए गुरु, शुक्र एवं मंगल का महत्व, ईश्वर एवं देवताओं के अवतार, वास्तु दोष व आत्महत्या, श्रीयंत्र का अध्यात्मिक स्वरूप, पितृमोक्ष धाम का महातीर्थ ब्रह्म कपाल, फलित ज्योतिष में मंगल की भूमिका, प्रेम का प्रतीक फिरोजा, स्त्री रोगों को ज्योतिष व वास्तु द्वारा आकलन, हृदय रोग के ज्योतिषीय कारण, क्या है पूजा में आरती का महत्व, राजयोग तथा विपरीत राजयोग, चातुर्मास का माहात्म्य इत्यादि रोचक व ज्ञानवर्धक आलेखों के अतिरिक्त दक्षिणामूर्ति स्तोत्र, अंक ज्योतिष के रहस्य, सीमा का वहम नामक सत्यकथा, अर्जुन की शक्ति उपासना नामक पौराणिक कथा, कालसर्प दोष से मुक्ति के लिए लालकिताब के अचूक उपाय, भगवान श्री गणेश और उनका मूल मंत्र तथा जियोपैथिक स्ट्रेस व अन्य नकारात्मक ऊर्जाओं आदि विषयों पर भी विस्तृत रूप से चर्चा की गई है।

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