प्रत्येक यक्ति के मन में यह जानने की उत्सुकता होती है कि उसे वाहन कब प्राप्त होगा। जन्मपत्रिका में वाहन सुख का अध्ययन चैथे और ग्यारहवें भाव से किया जाता है। वाहन का कारक ग्रह शुक्र माना गया है। व्यक्ति को वाहन सुख चतुर्थेश और एकादशेश की दशा में भी प्राप्त होता है। यदि चतुर्थेश बारहवें भाव में हो, तो व्यक्ति वाहन के लिए चिंतित देखा जाता है। चतुर्थ भाव में गुरु उच्च का हो, तो दक्षिणा में वाहन मिलता है। देखिए निम्न जन्मपत्रिका। इस व्यक्ति को शनि में बुध की अंतर्दशा आने पर वाहन प्राप्त हुआ। बुध ग्यारहवें स्थान में शुक्र के साथ है। इसे कारक ग्रह शुक्र के कारण वाहन प्राप्त हुआ। चलित चक्र में सूर्य उच्च राशि मेष में आ जाता है एवं ग्यारहवें भाव को देख रहा है। इस कारण ग्यारहवां स्थान बली है तथा भाग्य की दशा में चतुर्थेश की अंतर्दशा थी। अतः यह एक बलवान वाहन योग सिद्ध हुआ। ग्यारहवें घर में गुरु होने के कारण इस व्यक्ति को धन और वाहन प्राप्ति के विशेष योग हंै। दशमेश भी ग्यारहवें भाव में है। अतः यह पिता की सुदृढ़ स्थिति का सूचक है। अष्टमेश चतुर्थ स्थान में वाहन से दुर्घटना का योग बनाता है। किंतु मित्र राशि में होने के कारण यही योग दुर्घटना से बचाता भी है। लग्नेश भी ग्यारहवें स्थान में है। अतः इस जन्मपत्रिका वाले व्यक्ति का जीवन अभी तक सुचारु रूप से चल रहा है एंव आनंदमय जीवन व्यतीत हो रहा है। Û व्ययेश चैथे स्थान में हो, तो व्यक्ति स्वयं उपार्जित धन से वाहन खरीदता है। Û लाभेश, सप्तमेश तथा तृतीयेश चतुर्थ भाव में हों तथा सप्तमेश की दशा हो, तो व्यक्ति अपने मित्रों के वाहन का उपयोग करता है। Û अष्टमेश चतुर्थ भाव में हो, तो वाहन दुर्घटना का योग बनता है। Û षष्ठेश चतुर्थ भाव में हो, तो वाहन के कारण झगड़ा होता है। Û सप्तमेश चतुर्थ भाव में हो, शुभ ग्रह साथ में हो, तो विवाहोपरांत वाहन सुख प्राप्त होता है। Û पंचमेश चतुर्थ भाव में हो, तो चतुर्थेश की दशा में अचानक वाहन प्राप्ति का योग बनता है। वाहन निम्न प्रकार का होगाः साइकिल: चतुर्थेश शु़क्र के साथ हो, तो साइकिल मिलती है, या चतुर्थेश की दशा हो और चतुर्थ छठवें, या बारहवें भाव में हो। मोटर साईकिल: चतुर्थेश की दशा हो और उसको शुक्र, या गुरु देखता हो, तो मोटर साइकिल आदि का योग बनता है। लग्नेश, पाप ग्रह हो कर, चतुर्थ भाव में हो, या चतुर्थेश की दशा हो, तबभी मोटर साइकिल प्राप्त होती है। कार: ग्यारहवें भाव की दशा में चतुर्थेश हो, लग्नेश और ग्यारहवें का मालिक चतुर्थ भाव में हो और चतुर्थेश भाग्य भाव में हो, तो कार का सुख प्राप्त होता है। वायुयान: लग्नेश की दशा में ग्यारहवें भाव की अंतर्दशा हो, उसमें चतुर्थेश की प्रत्यंतर्दशा हो, गोचर में लग्न में लग्नेश, चतुर्थेंश, एकादशेश, भाग्येश लग्न, या चतुर्थ भाव में हो एवं गुरु केंद्र में, शुक्र केंद्र, या बारहवे भाव में हो, तब वायुयान सुख का योग बनता है। इसके साथ कुंडली में उच्च प्रकार के राजयोग और लक्ष्मी योग होना जरूरी है। पानी का जहाज: अष्टम भाव, या लग्न में केतु हो, चंद्रमा अष्टम में हो, शुक्र बारहवें भाव में हो, गुरु पंचम भाव में हो, चंद्रमा पूर्ण बली हो, केतु बली हो तथा नेप्च्यून बली हो, लग्नेश की दशा में अष्टमेश की अंतर्दशा हो, अष्टमेश चंद्र हो, अष्टम भाव में चंद्र, या केतु की दृष्टि हो, तब पानी के जहाज का सुख मिलता है। इसके लिए भाग्येश और लग्नेश बली होना अत्यंत आवश्यक है।


विवाह, स्वास्थ्य और कृष्णमूर्ति पद्धति विशेषांक  जुलाई 2004

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