वनस्पति वास्तु तथा रत्न

वनस्पति वास्तु तथा रत्न  

वराह मिहिर से वृक्ष विज्ञान के विषय में अत्यंत दुर्लभ ज्ञान प्राप्त होता है, जिसके अनुसार वृक्षों के द्वारा अपने घर, मकान, दुकान, उद्योग के वास्तु दोष दूर कर सकते हैं। वृक्ष वास्तु से ज्ञान प्राप्त होता है कि कौन-कौन से वृक्ष घर की सीमा के बाहर लगाने चाहिएं तथा कौन से वृक्ष घर के भीतर। वृक्षों को सदैव पूजनीय माना गया है। हिंदू धर्म में बरगद, तुलसी, पीपल, अशोक, बेल पत्र आदि पूजे जाते हैं। बौद्ध धर्म के अनुसार भी गौतम बुद्ध ने ‘बोधि वृक्ष’ के नीचे बैठ कर ही ज्ञान प्राप्त किया। पूजा तथा अन्य पूजनीय कार्यों में उपयोग किये जाने वाले फल, फूल, हवन सामग्री आदि वृक्षों से ही प्राप्त होते हैं। बेल पत्र शिव पर चढ़ाया जाता है। कमल विष्णु भगवान को तथा लक्ष्मी जी को कचनार के फूल प्रिय हैं। पीपल में यक्ष, दाड़िम में लक्ष्मी जी का वास होता है। वृक्ष लगाने के नियम तथा नक्षत्र: वृक्ष लगाने से पूर्व व्यक्ति को, स्नान आदि कर के, चंदन से वृक्ष की पूजा करनी चाहिए तथा शुभ नक्षत्रों में ही वृक्षारोपण करना चाहिए। रोहिणी, मृगशिरा, रेवती, चित्रा, अनुराधा, विशाखा, उत्तराफाल्गुनी, उत्तराषाढ़, उत्तराभाद्रपद, पुष्य, श्रवण, हस्त तथा अश्विनी नक्षत्र पौधे तथा वृक्षों को लगाने के लिए शुभ हैं। वारों में बुधवार पौधों के लिए शुभ है। यदि घर में कलह हो, या आर्थिक स्थिति खराब होती जा रही हो, तो बुधवार के दिन घर में बागबानी करें। घर में लगाने योग्य वृक्ष: Û घर के आंगन में तुलसी का पौधा लगाना अति शुभ माना गया है। तुलसी में औषधि के गुण होते हैं। Û खजूर, अमरूद, केला, नींबू, मिर्च, बेर जिस घर में होते हैं, वहां क्लेश रहता है। Û फल, फूल वाले वृक्ष पूर्व में, कमल तथा पीपल घर के पश्चिम में लगाने चाहिएं। Û दूध वाले वृक्ष लगाने हों, तो उन्हें दक्षिण में ही लगाएं (वैसे इन वृक्षों को न लगाना ही शुभ होता है) Û जो वृक्ष स्त्री के नाम से जाने जाते हैं, जैसे चंपा, चमेली, चांदनी, जूही आदि घर में न लगाएं। यदि लगाने हैं, तो पुरुष वृक्ष के साथ रख कर, जोड़ा बना कर, जैसे चांदनी $ मोतिया, चमेली $ गुलाब, सुंदर $ रूपा, जूही $ अशोक आदि लगाएं। Û टेढ़ेमेढ़े तथा कुबड़े वृक्ष घर में न लगाएं। Û किसी रोगी, या माली से वृक्ष ले कर न लगाएं। Û श्मशान तथा उजाड़ स्थानों से लाये वृक्षों को घर में नहीं लगाना चाहिए। Û रात्रि वृक्ष, कभी भी, चारदीवारी के भीतर न लगाएं। इन्हें लगाना ही है, तो घर के बाहर की तरफ लगाना चाहिए। वृक्षों द्वारा उपाय: Û यदि कोई जमीन खरीदी है, तो उसमें, शुक्ल पक्ष के हस्त नक्षत्र में, दाड़िम का पौधा लगा कर, उस वृक्ष को श्री सूक्त के पाठ से जागृत करें, तो भूमि शुभ हो जाएगी। वह स्थान सुख-समृद्धिदायक हो जाएगा। Û सफेद आक की जड़, जिसमें भगवान गणेश की प्रतिमा बनी हो (श्वेतार्क गणपति) को घर में ला कर प्रतिदिन पूजा करने से धन, यश की प्राप्ति होती हैं। Û पीपल के वृक्ष का पत्ता तोड़ कर (शुभ नक्षत्र में) उसपर अनार की लकड़ी से बनी कलम तथा केसर की स्याही से, पूर्व कीेे तरफ मुंह कर के बैठ कर, ‘‘¬ नमो भगवते वासुदेवाय नमः‘‘ तीन बार लिखना चाहिए तथा उस पत्ते को पवित्र स्थान पर स्थापित कर दें। प्रतिदिन पूजा करने से मानसिक शांति प्राप्त होती हैं, क्योंकि बिगड़े काम बनने लगते हैैं। Û यदि काफी प्रयत्न करने पर काम नहीं बनते हैं, तो एक नारियल लें। उसपर कुमकुम से स्वस्तिक बनाएं। उस नारियल को, स्नानादि करने के पश्चात, प्रातः काल अपने सामने, शुद्ध आसन बिछा कर, उसपर रखें तथा पूजा करें और अपनी समस्या हाथ जोड़ कर कहें। फिर उस नारियल को भैरों जी के मंदिर में रख आएं। बिगडे़ कार्य बनने लगेंगे। Û शत्रु पर विजय प्राप्त करने के लिए, या लंबे समय से चल रहे मुकद्दमों आदि में विजय प्राप्त करने के लिए, रवि पुष्य, या गुरु पुष्य नक्षत्र में, चमेली की जड़ की माला धारण करें, या इस माला को अपनी तिजोरी तथा जहां कागजात हैं, वहां स्थापित करें। अवश्य विजय प्राप्त होगी। Û विवाह के लिए गुरुवार के दिन केले के वृक्ष की पूजा करने से शीघ्र विवाह होता है। Û भगवान विष्णु की कमल पुष्पों द्वारा पूजा करने से करोड़ों पाप नष्ट हो जाते हैं तथा विष्णु जी पर तुलसी अवश्य चढाएं। Û देवताओं पर फूलों की वर्षा से तथा सुगंधित पुष्प चढ़ाने से स्वर्ग की प्राप्ति होती है। फल, फूल तथा तांबूल के बिना की गयी पूजा निष्फल होती है। उस पूजा का कोई फल प्राप्त नहीं होता। Û श्री गणेश की पूजा तुलसी से तथा दुर्गा जी की पूजा दुर्वा से कभी नहीं करनी चाहिए। Û गणेश पूजन में जामुन अवश्य चढ़ाएं तथा लड्डू का भोग लगाएं। Û शिव की पूजा बेल पत्र द्वारा संपन्न होती है तथा भगवान शंकर पर शमी के फूल चढ़ाने चाहिएं। भांग पत्र, धतूरा आदि तथा आक के फूल भगवान शंकर पर चढ़ाये जाते हैं। रत्नों का प्रतिनिधित्व करती जड़ी-बूटियां: ऋषि-मुनियों ने ऐसे व्यक्तियों के लिए, जो अमूल्य रत्न धारण नहीं कर सकते हैं, ग्रह शांति के लिए जड़ी-बूटियों द्वारा उपाय बताये हैं, क्योंकि ये जड़ी-बूटियां ग्रहों को शांत करने में समर्थ होती हैं। प्रत्येक के स्वामी के अनुकूल ही इन जड़ों को धारण किया जाता है। बारह राशियां होती हैं और राशि का प्रतिनिधित्व ग्रह करते हैं। मेष तथा वृश्चिक: इन राशियों का स्वामी मंगल होता है। मंगल ग्रह के लिए मूंगा धारण करते हैं। परंतु किसी कारणवश मूंगा धारण न कर सकें, तो अनंत मूल की जड़, लाल धागे में, मंगलवार के दिन धारण करें। मंत्र ऊँ अं अंगारकाय नमः जप संख्या 10000 वृष तथा तुला: यदि शुक्र पीड़ाकारक है, तो हीरा धारण करने का प्रावधान है। परंतु सरपौंखा की जड़, या वृष्ला मूल की जड़ भी, सफेद धागे में, शुक्रवार को धारण कर सकते हैं। मंत्र- ऊँ शुं शुक्राय नमः जप संख्या 16000 मिथुन तथा कन्या: यदि बुध पीड़ादायक है, तो विधारा की जड़, सफेद धागे में, बुधवार के दिन धारण करें। मंत्र- ऊँ बुं बुधाय नमः जप संख्या - 9000 कर्क: कर्क राशि का स्वामी चंद्र है। यदि चंद्र पीड़ित है, तो मोती धारण करना चाहिए, या शतावरी की जड़, सफेद धागे में, सोमवार के दिन धारण करें। मंत्र- ऊँ सो सोमाय नमः जप संख्या - 1100 सिंह: सिंह राशि का स्वामी सूर्य है तथा सूर्य का रत्न माणिक है। यदि सूर्य पीड़ित है, तो बेल पत्र की जड़, गुलाबी धागे में, रविवार के दिन धारण करें। मंत्र- ऊँ घृणिः सूर्याय नमः जप संख्या - 700 धनु तथा मीन: धनु तथा मीन के स्वामी गुरु हैं। इनके लिए पुखराज अति उत्तम है। जो व्यक्ति पुखराज धारण करने में असर्मथ हैं, वे कच्ची हल्दी की गांठ, या नारंगी, केले की जड़, पीले धागे में, गुरुवार के दिन धारण करें। मंत्र- ऊँ वृं बृहस्पतये नमः जप संख्या - 19000 मकर तथा कुंभ: मकर तथा कुंभ का स्वामी शनि ग्रह है, जिसका रत्न है नीलम। यदि शनि पीड़ाकारक है, तो बिछुए की जड़, काले धागे में, धारण करें। इसके लिए शनिवार की संध्या का समय उत्तम है। मंत्र- ऊँ शं शनैश्चराय नमः जप संख्या - 23000 राहु: राहु छाया ग्रह है। इस दिखाई न देने वाले राहु के लिए गोमेद रत्न है। परंतु गोमेद न धारण करने की स्थिति में सफेद चंदन, नीले धागे में, बुधवार के दिन, धारण करें। मंत्र- ऊँ रां राहवे नमः जप संख्या - 18000 केतु: यह भी छाया ग्रह है, जिसका रत्न है लहसुनिया। केतु के लिए असगंध की जड़, आसमानी धागे में, गुरुवार के दिन धारण करें। मंत्र - ऊँ कें केतवे नमः जप संख्या - 1700


विवाह, स्वास्थ्य और कृष्णमूर्ति पद्धति विशेषांक  जुलाई 2004

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