लाल किताब और रोग निवारण

लाल किताब और रोग निवारण  

व्यूस : 3901 | जून 2006

ज्योतिषी डाॅक्टर की भूमिका नहीं निभाते परंतु जन्म पत्रिका या हस्तरेखा के आधार पर यह बताने का प्रयत्न करते हैं कि अमुक व्यक्ति को भविष्य में कौन सी बीमारी होने की संभावना है। जैसे यदि जन्म पत्रिका में तुला लग्न या राशि पीड़ित हो तो व्यक्ति को कटि प्रदेश में कष्ट होने की संभावना रहती है। जन्म पत्रिका में बीमारी का घर छठा स्थान माना जाता है और अष्टम स्थान आयु स्थान है। तृतीय स्थान अष्टम से अष्टम होने से यह स्थान भी बीमारी के प्रकार को इंगित करता है। जैसे तृतीय स्थान में चंद्र पीड़ित हो तो टीबी की बीमारी होने की संभावना बनती है। इसी स्थान में स्थित मंगल के पीड़ित होने से चोट लगने या शल्य चिकित्सा की संभावना रहती है। इसी स्थान में शुक्र पीड़ित हो तो शुगर की बीमारी डायबीटीज की संभावना रहती है। शनि या राहु तृतीय स्थान में पीड़ित होने से जहर खाने, पानी में डूबने, ऊंचाई से गिरने और जलने से घाव होने आदि की संभावना बनती है।

लाल किताब के अनुसार ग्रहों के योग से होने वाले रोग इस प्रकार हैं:

Û जब सूर्य से शुक्र, बुध या गुरु मिलता है तो जातक को सांस की बीमारी होती है।

Û चंद्र और राहु के संबंध से निमोनिया या पागलपन की बीमारी होती है।

Û शुक्र एवं राहु का संबंध नामर्दी का कारक होता है।

Û चंद्र और बुध या मंगल के टकराव से ग्रंथियां प्रभावित होती हैं।

Û गुरु और राहु के योग से दमा, टी.बीआदि की संभावना रहती है। ग्रह दोष निवारण के लिए लाल किताब में कई टोटके दिए गए हैं जो बहुत लाभकारी सिद्ध हुए हैं।

इनमें विभिन्न ग्रहों से संबंधित दान तथा कुछ अन्य उपाय इस प्रकार हैं।

Û सूर्य - गेहूं, गुड़ एवं तांबा धर्म स्थान मंे दें। हरिवंश पुराण का पाठ करें। रात्रि को अग्नि या चूल्हे को दूध से बुझाएं और शुभ कार्य के प्रारंभ में मुंह मीठा करें।

Û चंद्र - मोती, चावल और चांदी दान करें।

Û मंगल - देशी खांड और मसूर दान करें।

Û बुध - साबुत मूंग दान करें।

Û गुरु - चना दाल, केसर और हल्दी दान करें।

Û शुक्र - ज्वार, दही और हीरा दान करें।

Û शनि - लोहा अथवा पीतल दान करें।

Û राहु - जौ, गोमेद और सरसों दान करें।

Û केतु - तिल दान करें।

यहां पर यह ध्यान रखना आवश्यक है कि जो ग्रह अच्छा फल देने वाला है उसकी वस्तु का दान कभी नहीं करें। यहां यह स्पष्ट करना आवश्यक है कि देवताओं की आराधना पुराणों में वर्णित विधि से करनी चाहिए जिससे लाभ की पूर्ण संभावना बनती है। उपर्युक्त उपायों के अतिरिक्त संबंधित कष्ट कारक ग्रह के मंत्र जप से भी बहुत लाभ होता है। इसी प्रकार महामृत्युंजय मंत्र का जप भी प्रत्येक असाध्य बीमारी में लाभकारी होता है क्योंकि इस मंत्र के जप से भोलेनाथ श्री शिवशंकर प्रसन्न होकर आशीर्वाद देते हैं और उनके आशीर्वाद से रोगी ठीक होने लगता है। मेडिकल एस्ट्राॅलाॅजी के संबंध में कुछ नियम वेद-पुराणों में भी दिए गए हैं।

विष्णु पुराण तृतीय खंड अध्याय 11 के श्लोक 78 में आदेश है कि भोजन करते समय मुख पूर्व या उत्तर दिशा में होना चाहिए। इससे पाचन क्रिया उत्तम रहती है और शरीर स्वस्थ रहता है। इसी प्रकार विष्णु पुराण तृतीय अंश अध्याय 11 के श्लोक 111 में उल्लेख है कि शयन करते समय सिर पूर्व या दक्षिण में होना चाहिए। इससे स्वास्थ्य उत्तम रहता है। उत्तर दिशा में सिर रख कर कभी न सोएं क्योंकि उत्तर दिशा में पृथ्वी का उत्तरी ध्रुव है और मानव शरीर का चुंबक सिर है। अतः दो चुंबकों के एक दिशा में होने से असंतुलन होगा और नींद ठीक से नहीं आएगी। स्वास्थ्य पर विपरीत असर पड़ेगा और उच्च रक्तचाप हो जाएगा।

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