राहू केतु के प्रतिकूल प्रभावों को दूर करने वाला चमत्कारिक यंत्र

राहू केतु के प्रतिकूल प्रभावों को दूर करने वाला चमत्कारिक यंत्र  

व्यूस : 8553 | आगस्त 2008
राहु केतु के प्रतिकूल प्रभावों को दूर करने वाला चमत्कारिक यंत्र आचार्य रमेश शास्त्री जन्म के समय सूर्य ग्रहण, चंद्र ग्रहण जैसे दोषों के होने से जो प्रभाव जातक पर पड़ता है, वही प्रभाव काल सर्प योग होने पर पड़ता है। कुंडली में कालसर्प होने से जातक की अपेक्षित प्रगति में अड़चनें आती हैं। ऐसा जातक शारीरिक एवं आर्थिक दृष्टि से परेशान रहता है। लेकिन यदि काल सर्प योग से प्रभावित जातक इसके निवारण का समुचित उपाय करे, तो वह अवश्य ही अपने लक्ष्य को प्राप्त करने में सफल हो सकता है। उपाय: काल सर्प योग में सर्प को देवता मान कर नागों की पूजा-उपासना की जाती है। महामृत्युंजय जप आदि भी सार्थक सिद्ध होते हैं। यदि संभव हो, तो कालसर्प की शांति के लिए सूर्य एवं चंद्र ग्रहण के दिन रुद्राभिषेक करवाना चाहिए। चांदी के नाग-नागिन के जोड़े की पूजा आदि कर के उसे शुद्ध नदी में प्रवाहित करने से भी कालसर्प की शांति होती है। गणेश एवं सरस्वती की उपासना भी लाभकारी मानी जाती है। कालसर्प योग के समस्त उपायों में नाग-नागिन को प्रवाहित करना या शिवलिंग पर चढ़ाना ही श्रेष्ठ है। कालसर्प यंत्र की पूजादि करना भी श्रेष्ठ है। इस यंत्र के प्रभाव से संपूर्ण सुख एवं लाभ मिलता है। काल सर्प के जातक को राहु-केतु की दशा-अंतर्दशा, के दौरान शांति कराने से अधिक लाभ मिलता है। राहु-केतु तमोगुणी, विषैले एवं राक्षसी प्रवृत्ति के होने पर भी ऊर्जा के स्रोत हैं तथा नवीन तकनीक से जुड़े विदेशी व्यापार के स्वामी हैं। अतः इनकी उपासना जीवन को सफल एवं सबल बनाती है। यदि कोई जातक कालसर्प यंत्र को अपने घर में, व्यावसायिक स्थल पर, अथवा अपने आसपास कहीं भी स्थापित करे, तो जातक को पुष्टि मिलती है तथा वह मानसिक, शारीरिक एवं आर्थिक विकास की ओर अग्रसर होने लगता है। इस यंत्र में अन्य कई यंत्रों को समाहित किया गया है, जो राहु-केतु की समस्त नकारात्मक प्रभावों को परिवर्तित कर, सकारात्मक परिणाम प्रदान करते हैं। जब अनेक प्रकार के दान-तप, यज्ञ, पूजादि करते समय खर्चों, विघ्नों एवं त्रुटियों का भय बना होता है, तो ऐसी स्थिति में इस यंत्र को स्थापित करना एक अच्छा विकल्प माना गया है। इस यंत्र को शुद्ध भावना से स्थापित मात्र करने से अनोखा लाभ होता है। बिना किसी वस्तु के, बिना किसी मंत्र एवं माला के, मात्र शुद्ध भावना से मानसोपचार पूजा करना ही सर्वोत्तम यज्ञ है। अतः यदि कोई यह सोचे कि यंत्र को घर में स्थापित करने से अनेक नियम-संयम पालन करने होंगे, तो यह उसका मिथ्या भ्रम है। अतः इस यंत्र को कोई भी जातक स्थापित कर के लाभान्वित हो सकता है। काल सर्प यंत्र की स्थापना के पश्चात् यदि जातक चाहे तो लघु मृत्युंजय मंत्र, मृत संजीवनी मंत्र, महामृत्युंजय मंत्र, राहु या केतु का मंत्र अथवा नाग स्तुति का जप या पाठ कर सकते हैं। यंत्र स्थापना विधि: वैदिक, तांत्रिक, मानसिक, वाचिक, कायिक, चल, अचल किसी भी पद्धति द्वारा इसे प्रतिष्ठित किया जा सकता है। जातक स्वयं, अथवा किसी कर्मकांडी से किसी भी माह शुक्ल पक्ष, सोम, बुध, गुरु, शुक्र, वारों में स्थापित कर सकते हैं। विशेष: जिन जातकों के कुंडली में कालसर्प योग नहीं है। वे राहु एवं केतु के यंत्र को स्थापित करके लाभ प्राप्त कर सकते ं।

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राहु-केतु विशेषांक  आगस्त 2008

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