काल सर्प दोष निवारण के उपाय

काल सर्प दोष निवारण के उपाय  

काल सर्प दोष निवारण के उपाय बसंत कुमार सोनी, गौतम पटेल, सीतेश कुमार पंचैली काल सर्प दोष निवारण के अनेक उपाय हैं। इस योग की शांति विधि विधान के साथ योग्य, विद्वान एवं अनुभवी ज्योतिषी, कुल गुरु या पुरोहित के परामर्श के अनुसार किसी कर्मकांडी ब्राह्मण से यथा योग्य समयानुसार करा लेने से दोष का निवारण हो जाता है। इस दुर्योग से पीड़ित जातक को काल सर्प यंत्र की स्थापना कर इसका लाॅकेट या अंगूठी पहननी चाहिए। रुद्राक्ष माला से महामृत्युंजय मंत्र का नित्य 108 बार जप करना चाहिए। साथ ही दशांश हवन भी करना चाहिए। महाशिवरात्रि, नाग पंचमी, ग्रहण आदि के दिन शिवालय में नाग नागिन का चांदी या तांबे का जोड़ा अर्पित करें। सर्प पकड़े हुए मोर या गरुड़ का चित्र अपने पूजा घर में लगाकर दर्शन करते हुए नव नाग स्तोत्र का जप करें। स्तोत्र: अनंत वासुकिं शेषं पद्मनाभं च कंबल। शंखपालं धार्तराष्ट्रं तक्षकं कालियं तथा। एतानि नवनामानि नागानां च महात्मानां सायंकालेपठेन्नित्यं प्रातः काले विशेषतः।। राहु-केतु के बीज मंत्र का 21-21 हजार की संख्या में जप कराएं, हवन कराएं, कंबल दान कराएं व विप्र पूजा करें। चांदी का छर्रा, जो पोला न हो अर्थात ठोस हो, कपूर की डली के साथ पास में रखने से दिन भर सर्प भय नहीं रहता। भगवान गणेश केतु की पीड़ा शांत करते हैं और देवी सरस्वती पूजन अर्चन करने वालांे की राहु से रक्षा करती हैं। भैरवाष्टक का नित्य पाठ करने से काल सर्प दोष से पीड़ित लोगों को शांति मिलती है। महाकाल शिव के समक्ष घृत दीप जलाकर सर्प सूक्त का नित्य पाठ करना चाहिए। नित्य ऊन के आसन पर बैठकर रुद्राक्ष की माला से नाग मंत्र गायत्री का जप करना चाहिए। ‘‘¬ नवकुलाय विद्महे विषदंताय धीमहि तन्नो सर्पः प्रचोदयात्’’ काल सर्प योग की शांति का मुख्य संबंध भगवान शिव से है। क्योंकि काल सर्प भगवान शिव के गले का हार है, इसलिए किसी भी शिव मंदिर में काल सर्प योग की शांति का विधान करना चाहिए। साथ ही पंचाक्षरीय मंत्र ‘‘¬ नमः शिवाय’’ का जप करना चाहिए। 500 ग्राम, सवा किलो ग्राम या ढाई किलो ग्राम के पारद शिव लिंग की पांच सौ प्राण प्रतिष्ठा कराकर विधिवत रुद्राभिषेक करना चाहिए। गं गणपतये नमः, ¬ नमो भगवते वासुदेवाय, ¬ रां राहवे नमः, ¬ भ्रां भ्रीं भ्रौं सः राहवे नमः, अर्धकायं महावीर्यं चंद्रादित्य विमर्दनम्। सिंहिका गर्भसंभूतं तं राहुं प्राणमाम्यहम्।। हनुमान चालीसा, सुंदर कांड इत्यादि का पाठ, माता सरस्वती की उपासना, श्री बटुक भैरव मंत्र का जप, रुद्राष्टाध्यायी और नवनाग स्तोत्र का पाठ करना चाहिए। नाग पाश यंत्र अथवा काल सर्प यंत्र, पारद शिव लिंग, चांदी के अष्ट नागों, अष्टधातु के नाग, तांबे के नाग, रुद्राक्ष, एकाक्षी नारियल और नवग्रहों का पूजन करना चाहिए या नवग्रहों का दान देना चाहिए। नारियल का फल बहते पानी में बहाना चाहिए। बहते पानी में मसूर की दाल डालनी चाहिए। पक्षियों को जौ के दाने खिलाने चाहिए। मोर या गरुड़ का चित्र बनाकर उस पर नाग विष हरण मंत्र लिखें और उस मंत्र के दस हजार जप कर दशांश होम के साथ ब्राह्मणों को खीर का भोजन कराएं। नाग की पत्थर की प्रतिमा बनवाकर उसकी मंदिर हेतु प्रतिष्ठा कर नाग मंदिर बनाएं। कार्तिक या चैत्र मास में सर्प बलि कराने से भी काल सर्प दोष का निवारण होता है। अपनी लंबाई का मरा हुआ सर्प कहीं मिल जाए तो उसका शुद्ध घी से अग्नि संस्कार कर तीन दिन तक सूतक पालें और बाद में सर्प बलि कराएं अथवा जीवित सर्प की पूजा कर उसे जंगल में छुड़वा दें। नाग पंचमी के दिन सर्पाकार सब्जियां खुद न खाकर, न काटकर उनका दान करें। अपने वजन के हिसाब से गायों को घास खिलाकर जीवित नाग की पूजा करें। अपने घर में दीवार पर नौ नागों का सचित्र नागमंडल बनाकर अनंत चतुर्दशी से पितृ श्राद्ध तक नित्य धूप, दीप, खीर नैवेद्य के साथ पूजा के बाद अपनी अनुकूलता के अनुसार नाग बलि कराएं। आचार्यों एवं विद्वानों द्वारा सुझाए गए उपाय भैरवाष्टक प्रयोग कर काल सर्प योग के भय से बचा जा सकता है। योग में आए सर्प को देवता मान कर नाग पूजा करनी चाहिए। महामृत्युंजय का जप एवं सर्पराज भगवान आशुतोष शिव की आराधना सर्वश्रेष्ठ एवं कारगर उपाय है। सूर्य-चंद्र ग्रहण के दिन ग्रहण के समय रुद्राभिषेक कराएं। अभिषेक के पहले चांदी से निर्मित नाग-नागिन का जोड़ा भगवान शंकर को चढ़ा दें और अभिषेक की समाप्ति पर उसे पहले से जल भरे तांबे के पात्र में विसर्जित कर दें और उस पात्र को अभिषेक कराने वाले पंडित को दान कर दें। इसे काल सर्प योग शांति का राम बाण प्रयोग बताया गया है। 500 ग्राम का पारद शिव लिंग (परिवार में एक से अधिक व्यक्तियों को होने पर ढाई किलोग्राम का) बनवा कर विधि-विधान से पूजा करने से दोष से मुक्ति मिलती है। सहनुमान जी की नित्य पूजा से भी इस योग की शांति होती है, क्योंकि हनुमान जी ने ही लक्ष्मण जी को नाग पाश से मुक्त कराया था। शिव उपासना एवं रुद्र सूक्त से अभिमंत्रित जल से स्नान करने से यह योग शिथिल हो जाता है। सूर्य अथवा चंद्र ग्रहण के दिन सात अनाज से तुला दान करें। शिव लिंग पर चढ़ाने योग्य तांबे का एक बड़ा सर्प बनाएं। साथ ही सर्प-सर्पिणी का चांदी का जोड़ा बनवाएं। तांबे के सर्प को प्राण प्रतिष्ठित कर ब्रह्म मुहूर्त में शिवालय पर चढ़ा आएं तथा सर्प-सर्पिणी के चांदी के जोड़े को बहते पानी में छोड़ दें। पलाश का फूल गौ मूत्र में कूट कर छांव में सुखाएं। इसका चूर्ण बना कर नित्य स्नान के जल में मिला कर स्नान करें। 72 बुधवार तक ऐसा करने से काल सर्प योग नष्ट होता है। 72000 राहु मंत्र ‘¬ रां राहवे नमः’ का जप करने से काल सर्प योग शांत होता है। प्रत्येक बुधवार को काले वस्त्र में एक मुट्ठी उड़द या मूंग डाल कर, राहु मंत्र का जप कर, भिखमंगे को देने या बहते पानी में डालने से अवश्य लाभ होता है। ऐसा 72 बुधवार को करना चाहिए। काल सर्प योग की विशिष्ट अंगूठी को प्राण प्रतिष्ठित कर बुधवार को कनिष्ठा में धारण कर, उस दिन राहु की सामग्री का आंशिक दान करने से चमत्कारिक लाभ मिलता है। नाग पंचमी का व्रत एवं नव नाग स्तोत्र का पाठ करना चाहिए। मोर या गरुड़ का चित्र बना कर, उस पर नाग विष हरण मंत्र लिख कर, उस मंत्र के 10,000 जप कर, दशांश हवन कर ब्राह्मणों को खीर का भोजन कराएं। कार्तिक या चैत्र मास में सर्प बलि कराने से काल सर्प योग दोष का निवारण होता है। गेहूं या उड़द के आटे की सर्प मूर्ति बना कर एक साल तक पूजन करने और बाद में नदी में छोड़ देने तथा तत्पश्चात् नाग बलि कराने से काल सर्प योग शांत होता है। सराहु एवं केतु के नित्य 108 बार जप करने से भी यह योग शिथिल होता है। राहु माता सरस्वती एवं केतु श्री गणेश की पूजा से भी प्रसन्न होता है। हर पुष्य नक्षत्र को महादेव पर जल एवं दुग्ध चढ़ाएं तथा रुद्र का जप एवं अभिषेक करें। हर सोमवार को दही से महादेव का ¬ हर-हर महादेव कहते हुए अभिषेक करना चाहिए। राहु-केतु की वस्तुओं का दान करें। राहु का रत्न गोमेद पहनें। कुल देवता की पूजा करें। चांदी का नाग बना कर उंगली में धारण करें। शिव लिंग पर तांबे का सर्प अनुष्ठानपूर्वक चढ़ाएं। राहु के मंत्र का हमेशा जप करना चाहिए। सकिसी स्त्री को यह योग है और संतति का अभाव है, तो किसी अश्वत्थ (वट) वृक्ष की नित्य 108 बार प्रदक्षिणा करंे, 2800 प्रदक्षिणाएं पूरी होने पर दोष दूर होगा और संतान की प्राप्ति होगी। लाल किताब के उपाय लाल किताब में काल सर्प योग का नाम नहीं आता है, किंतु लाल किताब के नियमों को ध्यान में रखते हुए काल सर्प के सही उपाय किए जा सकते हैं। प्रथम भाव में राहु और सप्तम भाव में केतु: यहां राहु का उपाय होगा। चांदी की ठोस गोली पास रखें। द्वितीय भाव में राहु और अष्टम भाव में केतु: यहां केतु का उपाय होगा। केतु दोरंगी या बहुरंगी वस्तुओं का कारक है, अतः ऐसा कंबल जो दोरंगा या बहुरंगी हो, मंदिर में दें। तृतीय भाव में राहु और नवम भाव में केतु: यहां केतु का उपाय होगा। यहां केतु बृहस्पति के पक्के भाव में है, इसलिए सोना, जो बृहस्पति का कारक है, धारण करने से केतु का प्रभाव शुभ हो जाएगा। चतुर्थ भाव में राहु और दशम भाव में केतु: इस स्थिति में राहु का उपाय नहीं, बल्कि दशम भाव के केतु का उपाय करें। चांदी की डिब्बी में शहद भर कर उसमें लाल किताब को डालकर घर से बाहर जमीन में दबाएं। पंचम भाव में राहु और एकादश भाव में केतु: यहां राहु का उपाय होगा। घर में चांदी का ठोस हाथी रखना चाहिए। अंदर से अगर खोखला हो, तो उस अंधेरे में भी राहु का प्रभाव रह जाता है। छठे भाव में राहु और बारहवें भाव में केतु: बेशक छठे भाव में राहु हर मुसीबत को काटने वाला चूहा है, किंतु फिर भी उसमें कुछ बुरे प्रभाव देने की प्रवृत्ति होती है। राहु के बुरे प्रभाव को दूर करने के लिए बुध को शक्तिशाली करना चाहिए। इसके लिए बहन की सेवा करें या कोई फूल अपने पास रखें। बुध को इसलिए शक्तिशाली किया जाता है कि यहां पर काल पुरुष कुंडली के हिसाब से बुध की कन्या राशि आती है और बुध राहु से मित्रता रखता है। सप्तम भाव में राहु और प्रथम भाव में केतु: इस स्थिति के काल सर्प योग में दोनों ग्रहों के उपाय करने होंगे। प्रथम भाव, काल पुरुष कुंडली के हिसाब से, मंगल का घर है। इसलिए केतु को शांत करने के लिए लोहे की गोली पर लाल रंग कर के अपने पास रखना चाहिए क्योंकि लाल रंग मंगल का कारक है, जिसके द्वारा केतु को दबाया जा सकता है। सप्तम भाव में राहु होने पर बृहस्पति और चंद्र के असर को मिला कर राहु के अशुभ प्रभाव को कम करना होगा। इसके लिए चांदी की एक डिब्बी में गंगा जल या बहती नदी या नहर का पानी डाल कर, जो गुरु का कारक है, उसमें चांदी का एक चैकोर टुकड़ा डाल कर, ढक्कन लगा कर घर में रखना चाहिए। ध्यान रहे कि डिब्बी का पानी सूखे नहीं; अर्थात डिब्बी में पानी डालते रहें। अष्टम भाव में राहु और द्वितीय भाव में केतु: यहां राहु का उपाय करना होगा। राहु के अशुभ प्रभाव को दूर करने के लिए 800 ग्राम सिक्के के आठ टुकड़े कर के एक साथ बहते पानी में डालने चाहिए। नवम भाव में राहु और तृतीय भाव में केतु: यहां केतु का उपाय होगा। केतु के मित्र गुरु की सहायता से केतु को शांत करने के लिए तीन दिन, लगातार, चने की दाल बहते पानी में डालनी चाहिए। दशम भाव में राहु और चतुर्थ भाव में केतु: यहां केतु के अशुभ असर को दूर करने के लिए चतुर्थ भाव की बुनियाद को मजबूत करना होगा। इसके लिए पीतल के बरतन में बहती नदी या नहर का पानी भर कर घर में रखना चाहिए। ऊपर पीतल का ढक्कन होना चाहिए क्योंकि काल पुरुष कुंडली के हिसाब से यहां पर गुरु की उच्च की राशि कर्क आती है। पीतल का बरतन तथा बहता पानी दोनों ही गुरु के कारक हैं। केतु गुरु का मित्र है, अतः इस उपाय से शुभता आ जाएगी। एकादश भाव में राहु और पंचम भाव में केतु: यहां राहु के अशुभ प्रभाव को दूर करना होगा, जिसके लिए 400 ग्राम सिक्के के दस टुकड़े करा कर एक साथ बहते पानी में डालने चाहिए। द्वादश भाव में राहु और छठे भाव में केतु: यहां दोनों की स्थिति अशुभ होने के कारण दोनों ग्रहों का उपाय करना चाहिए। राहु के दोष को दूर करने के लिए बोरी के आकार की लाल रंग की एक थैली बना कर उसमें सौंफ या खांड भर कर जातक को अपने सोने वाले कमरे में रखनी चाहिए। ध्यान रहे कि कपड़ा चमकीला न हो क्योंकि लाल रंग मंगल का कारक है और सौंफ तथा खांड की मदद से राहु के अशुभ प्रभाव को दबाया जाता है। केतु को शुभ करने के लिए गुरु को शक्तिशाली करना चाहिए। गुरु की कारक धातु सोना पहनने से केतु के फल में शुभता आ जाएगी। बहते पानी मंे कोयला बहाना चाहिए। नारियल के फल बहते पानी में बहाएं। रसोई घर में बैठ कर ही भोजन करें। मुख्य द्वार पर चांदी का स्वास्तिक लगाना चाहिए। श्राद्ध पक्ष में पितरों का श्राद्ध श्रद्धापूर्वक करना चाहिए। श्रावण मास में 30 दिन तक महादेव का अभिषेक करें। नाग पंचमी को चांदी के नाग की पूजा करनी चाहिए, पितरों को याद करना चाहिए तथा बहते पानी या समुद्र में नाग देवता का श्रद्धापूर्वक विसर्जन करना चाहिए। गुरु सेवा एवं कुल देवता की पूजा-अर्चना नित्य करनी चाहिए। शयन कक्ष में लाल रंग के पर्दे, चादर तथा तकियों का उपयोग करें। बहते पानी में मसूर की दाल डालनी चाहिए। सहरिजन को मसूर की दाल तथा पैसे दान करें। सपक्षियों को जौ के दाने खिलाएं।



राहु-केतु विशेषांक  आगस्त 2008

राहू केतु का ज्योतिषीय, पौराणिक एवं खगोलीय आधार, राहू-केतु से बनने वाले ज्योतिषीय योग एवं प्रभाव, राहू केतु का द्वादश भावों में शुभाशुभ फल, राहू केतु की दशा-अंतर्दशा का फलकथन सिद्धांत, राहू केतु के दुष्प्रभावों से बचने हेतु उपाय

सब्सक्राइब

अपने विचार व्यक्त करें

blog comments powered by Disqus
.