राहू-केतु का पौराणिक एवं ज्योतिषीय आधार

राहू-केतु का पौराणिक एवं ज्योतिषीय आधार  

राहू केतु का पौराणिक एवं ज्योतिषीय आधार पं. विजय कुमार शर्मा राहु और केतु के बारे में प्रायः सभी जानते हैं परंतु पौराणिक एवं ज्योतिषीय दृष्टि से राहु-केतु निम्नवत् हैं। पौराणिक आधार पुराणों के अनुसार, असुरराज हिरण्यकश्यप की पुत्री सिंहिका का विवाह विप्रचिर्ती नामक दानव के साथ हुआ था। इन दोनों के योग से राहु का जन्म हुआ। जन्मजात शूर-वीर, मायावी राहु प्रखर बुद्धि का था। कहा जाता है कि उसने देवताओं की पंक्ति में बैठकर समुद्र मंथन से निकले अमृत को छल से प्राप्त कर लिया। लेकिन इस सारे घटनाक्रम को सूर्यदेव तथा चंद्रदेव देख रहे थे। उन्होंने सारा घटनाक्रम भगवान विष्णु को बता दिया। तब क्रोधित होकर भगवान विष्णु ने अपने सुदर्शन चक्र से राहु का मस्तक धड़ से अलग कर दिया। किंतु राहु अमृतपान कर चुका था, इसलिए मरा नहीं, बल्कि अमर हो गया। उसके सिर और धड़ दोनों ही अमरत्व पा गए। उसके धड़ वाले भाग का नाम केतु रख दिया गया। इसी कारण राहु और केतु सूर्य और चंद्र से शत्रुता रखते हैं और दोनों छाया ग्रह बनकर सूर्य व चंद्र को ग्रहण लगाकर प्रभावित करते रहते हैं। ज्योतिषीय आधार ज्योतिष के विद्वानों ने राहु और केतु के प्रभावों का स्पष्ट उल्लेख इस प्रकार किया है। राहु और केतु सदैव वक्री गति करते हुए एक-दूसरे से ठीक 1800 अंश की रेखीय दूरी पर रहते हुए सूर्य के चक्कर लगाते हैं। एक राशि पर राहु और केतु लगभग 18 महीने अर्थात् डेढ़ वर्ष तक रहते हैं। संपूर्ण राशिपथ को पूरा करने में इन्हें अठारह वर्षों का समय लगता है। छाया ग्रह होने के कारण इन्हें किसी भी राशि का स्वामित्व प्राप्त नहीं है, लेकिन कुछ ज्योतिषीगण कन्या राशि को राहु और मीन को केतु की राशि मानते हैं। कुछ लोग वृष को राहु की उच्च राशि मानते हैं तो कुछ अन्य मिथुन को। स्पष्ट है, जो राशि राहु के लिए उच्च होगी, वह केतु के लिए नीच होगी और जो राहु के लिए नीच होगी वह केतु के लिए उच्च होगी। राहु को मेष, वृष, मिथुन, कर्क, कन्या, वृश्चिक या कुंभ राशि और नवम भाव में होने पर शक्तिशाली माना जाता है। नैसर्गिक रूप से इन दोनों को पाप ग्रह माना जाता है। ये जन्मकुंडली के जिस भाव में होते हंै, उस भाव से पंचम, सप्तम तथा नवम भावों को पूर्ण दृष्टि से देखते हैं। ये जिस ग्रह की राशि में बैठते हंै, उसी के स्वभाव के अनुसार फल देने लगते हंै। जैसे, मेष राशि में होने पर मंगल के समान फल, वृष राशि में शुक्र के समान, मिथुन में बुध के समान आदि। जन्मकुंडली में शक्ति, हिम्मत, शौर्य, पाप कर्म, भय, शत्रुता, दुख, चिंता, दुर्भाग्य, संकट, राजनीति, कलंक, धोखा, छल-कपट आदि का अध्ययन राहु से किया जाता है। मानसिक स्तर के सभी रोग, हृदय रोग, किसी भी प्रकार के विष और विष जनित रोग, कोढ़, सर्प, भूत-प्रेत, जादू-टोने, टोटके, अचानक घटने वाली दुर्घटनाओं आदि का एक मात्र कारक और प्रतिनिधि ग्रह राहु है। जन्मराशि से प्रथम, तृतीय, पंचम, सप्तम, अष्टम, नवम या दशम भाव में स्थित राहु शुभ फलदायक होता है। इसी प्रकार, केतु को वृश्चिक, धनु या मीन राशि में बलवान माना जाता है। कर्क और सिंह राशियां इसकी शत्रु हैं। यह भी राहु के समान अचानक फल देता है। यह मोक्ष प्राप्ति का कारक ग्रह है। यदि यह किसी राशि में स्वगृही ग्रह के साथ हो तो उस ग्रह और उस भाव के फलों में चैगुनी वृद्धि कर देता है। शेष समस्त फल राहु के समान ही फलित होते हैं। विशेष: राहु से दादा तथा केतु से नाना का भी विचार किया जाता है। अतः पितृ दोष, ब्रह्म दोष आदि के लिए इन दोनों का अध्ययन आवश्यक है। दूसरी तरफ राहु चंद्र या सूर्य के साथ होने पर ग्रहण योग तथा गुरु के साथ होने पर चांडाल योग बनाता है। ऐसी स्थिति में राहु का प्रभाव नकारात्मक होता है। इस प्रकार, किसी भी व्यक्ति की जन्मकुंडली में राहु-केतु का विशेष अध्ययन कर यह जाना जा सकता है कि वह किस ऊंचाई तक पहुंचेगा। व्यक्ति विशेष को बुलंदियों पर पहुंचाने अथवा नीचे गिराने में ये दोनों ग्रह विशेष भूमिका निभाते हैं।



राहु-केतु विशेषांक  आगस्त 2008

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