राहू-केतु कि दशाओं का फल

राहू-केतु कि दशाओं का फल  

राहु-केतु की दशाओं का फल डाॅ. भगवान सहाय श्रीवास्तव किसी भी जातक को राहु अथवा केतु की दशा-अंतर्दशा का फल कुंडली में उसकी स्थितियों, भावों एवं अन्य ग्रहों के संबंधों पर निर्भर करता है। राहु जब शुभ प्रभाव में हो तो अपनी दशा में जातक की भलाई, धन एवं यश की वृद्धि करता है जबकि शुभ प्रभावों में होने पर विभिन्न रोग, संकट एवं शत्रुता देता है। राहु उच्च राशि का हो तो जातक को उच्च पद की प्राप्ति होती है। वह अत्यंत साहसी होता है और उसे मित्रों का सहयोग, स्त्री, पुत्र तथा भाइयों से सुख और यात्रा के अवसर आदि प्राप्त होते हैं। किंतु साथ ही वह बवासीर और सिर दर्द से ग्रस्त तथा अधर्म के प्रति प्रवृत्त होता है। जब राहु नीच राशि का होता है तो जातक को छाती में पीड़ा, शत्रु, अग्नि तथा, शस्त्र का भय और चोटों से हानि होती है। उसके मित्रों तथा बांधवों का पतन होता है और वह स्वयं शासक वर्ग के कोप का शिकार होता है। इसके अतिरिक्त उसके माता-पिता, स्त्री, संतान, दादा-दादी, नाना-नानी का स्वास्थ्य खराब रहता है और उनकी मृत्यु की संभावना भी रहती है। राहु से युक्त ग्रह बलवान भी हांे तो उसकी दशा में अरिष्ट होता है और दशा के अंत में दुःख, हानि तथा परदेश गमन होता है। केतु के शुभ प्रभाव में जातक को सर्वत्र विजय मिलती है। क्रूर कार्य करने से या म्लेच्छ राजा से धन की प्राप्ति होती है और शत्रु का नाश होता है। इसके विपरीत यदि केतु पाप प्रभाव में हो तो अत्यधिक कष्ट मिलता है। उसे कार्यों में असफलता शूलरोग, हड्डियों में ज्वर आदि से ग्रस्त होता है। वह ब्राह्मणों से द्वेष रखता है तथा उसका व्यवहार मूर्खतापूर्ण होता है। केतु उच्च का हो तो जातक अत्यधिक साहसी होता है। उसे कार्यों में सफलता तथा उच्च पद की प्राप्ति होती है। उसकी धर्म के प्रति निष्ठा होती है और वह यदा-कदा तीर्थ यात्रा करता है। उसे महात्माओं के दर्शन होते हंै। यदि केतु अच्छे स्थान में स्थित हो तो मनुष्य को मोक्ष भी देता है। यदि केतु नीच का हो तो स्वजन, भाई, चोर, वनपशु, मित्रों तथा बंधु बांधवों के कारण हानि होती है। इसके अतिरिक्त जातक संग्रहणी, फोड़ा-फंुसी आदि से पीड़ित होता है और उसे कारावास का दंड भी भोगना पड़ता है। महादशा एवं अंतर्दशाओं का फलादेश: राहु का दशाफल: राहु की महादशा में जातक दुःस्वभावी हो जाता है। उसमें सुशीलता नहीं रहती। किसी भयंकर बीमारी के कारण उसे पीड़ा भी होती है। उसकी पत्नी तथा पुत्र को कष्ट होता है और उसे विष से पीड़ा और शासक वर्ग से हानि होती है। पीड़ा होती है। राहु की महादशा में मंगल की अंतर्दशा में जातक को शत्रु, शस्त्र, अग्नि तथा चोरों का भय निरंतर बना रहता है। उसे अन्य अनेक प्रकार के कष्ट भी प्राप्त होते हैं। राहु की महादशा में सूर्य की अंतर्दशा हो तो जातक को रोग, शस्त्र, चोर, अग्नि और राजा से भय और उसके धन का नाश होता है। राहु की महादशा में राहु की अंतर्दशा हो तो जातक के भाई या पिता की मृत्यु, धन का नाश आदि होते हंै। साथ ही, वह रोगग्रस्त होता है और उसकी प्रतिष्ठा धूमिल होती है। राहु की महादशा में चंद्र की अंतर्दशा हो तो जातक को कलह, धन की हानि, बंधु बांधवों के विरोध तथा अन्य अनेक प्रकार के कष्टों का सामना करना पड़ता है। किंतु इस दशा में उसे स्त्री का सुख प्राप्त होता है। राहु की महादशा में शुक्र की अंतर्दशा हो तो जातक को मित्र के कारण संताप, भाई बंधुओं से कलह एवं कष्ट भोगना पड़ता है। किंतु इस दशा के दौरान उसे स्त्री सुख तथा धन की प्राप्ति होती है। राहु की महादशा में बुध की अंतर्दशा हो तो जातक का मित्र एवं भ्राताओं के साथ स्नेह बढ़ता है। बुद्धि, धन तथा सुख की वृद्धि होती है, किंतु दुख भी भोगना पड़ता है। राहु की महादशा में बृहस्पति की अंतर्दशा हो तो जातक देवी-देवता की पूजा और ब्राह्मणों की सेवा करने वाला, धनी तथा व्याधियों से मुक्त होता है। राहु की महादशा में केतु की अंतर्दशा हो तो जातक को अग्नि, ज्वर, शस्त्र तथा शत्रुओं से पीड़ा होती है और उसकी मृत्यु की संभावना रहती है। राहु की महादशा में शनि की अंतर्दशा हो तो जातक को रक्त-पित्त की पीड़ा, हाथ, पैर अथवा शरीर के किसी अन्य अंग के टूटने स्वजनों से कलह आदि की संभावना रहती है। केतु का दशाफल: केतु की महादशा में जातक को अनिष्ट फल का सामना करना पड़ता है। स्त्रियों तथा धनिकों, अफसरों या मालिक से उसे कष्ट मिलता है। इस दशा में उससे कोई गंभीर अपराध हो सकता है। धन के नाश होने के साथ-साथ ऐसी परिस्थिति बन सकती है कि उसे अपना घर और देश तक छोड़ना पड़। उसे कफ जनित रोग अथवा पैर तथा दांत में कष्ट भी हो सकता है। केतु की महादशा में बुध की अंतर्दशा हो तो जातक को भाई-बंधुओं का स्नेह सुख, बुद्धि लाभ, धन लाभ आदि की प्राप्ति होती है। इस दशा में उसे किसी भी प्रकार का कष्ट नहीं उठाना पड़ता। केतु की महादशा में शनि की अंतर्दशा हो तो जातक को स्वजनों से कलह तथा वात-पित्त की पीड़ा का शिकार होना पड़ता है। उसे परदेश गमन भी करना पड़ता है। केतु की महादशा में मंगल की अंतर्दशा हो तो जातक का अपने गांव, या मोहल्ले के लोगों से झगड़ा होता है। उसे चोट तथा देह पीड़ा का सामना भी करना पड़ता है। केतु की महादशा में केतु की अंतर्दशा हो तो जातक को पुत्र-पुत्री की मृत्यु, धन हानि, अग्नि से भय, दुष्ट स्त्रियों से कलह, रोग आदि अनेक प्रकार के संकटों का सामना करना पड़ता है। केतु की महादशा में सूर्य की अंतर्दशा हो तो जातक को शासक वर्ग से पीड़ा, शत्रुओं से विरोध, अग्निदाह, तीव्र ज्वर, विदेश गमन आदि कष्टों का सामना करना पड़ता है। केतु की महादशा में शुक्र की अंतर्दशा हो तो अग्नि दाह, तीव्र ज्वर, स्त्री से कलह, स्त्री वियोग आदि के दुःख भोगने पड़ते हैं और घर में कन्या का जन्म होता है। केतु की महादशा में चंद्र की अंतर्दशा हो तो जातक को धन व स्त्री का लाभ लेकिन यश की हानि होती है। इस प्रकार इस अवधि मंे शुभ एवं अशुभ दोनों प्रकार के फल प्राप्त होते हैं। केतु की महादशा में बृहस्पति की अंतर्दशा हो तो जातक का शासक वर्ग से संपर्क होता है। उसके घर में पुत्र का जन्म तथा भूमि, धन आदि का लाभ भी होता है। केतु की महादशा में राहु की अंतर्दशा हो तो जातक को चोरों का भय, शत्रुओं से विरोध तथा अन्य प्रकार के कष्टों का सामना करना पड़ता है। उसके अंग-भंग होने की आशंका बनी रहती है।



राहु-केतु विशेषांक  आगस्त 2008

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