राहू-केतु का फलित सिद्धांत

राहू-केतु का फलित सिद्धांत  

राहु-केतु का फलित सिद्धांत पं. अंजनी उपाध्याय राहु और केतु दोनों छाया- ग्रह हैं। इनका अपना कोई अस्तित्व नहीं है। ये दोनों जिस भाव में स्थित हों या जिस भावेश के साथ हों उनका फल प्रबल रूप से करते हैं। पराशरी के अनुसार राहु या केतु जिस भाव में जिस ग्रह के साथ होगा उसी के अनुरूप फल देगा। राहु और केतु के ग्रहों के साथ सहायक संबंध को ही सभी विद्वानों ने एकमत से स्वीकार किया है। लेकिन ये दोनों ग्रह सूर्य और चंद्र के साथ होने पर उनके फलों में मात्र अड़चन पैदा करते हैं, उनमें वृद्धि नहीं होती। जब ये भाव 3,6 या 12 में होते हैं, तभी फलों की वृद्धि करते हैं। राहु और केतु के योगकारकत्व का विचार यदि राहु अथवा केतु कंेद्र में त्रिकोणेश के साथ हो अथवा त्रिकोण में केंद्रेश के साथ हो तो योगकारक होता है। यदि राहु अथवा केतु केंद्र में केंद्रेश अथवा त्रिकोण में त्रिकोणेश के साथ हो तो योगकारक होता है। यदि राहु अथवा केतु शुभ स्थान में स्थित हो तथा किसी योगकारक ग्रह से दृष्ट अथवा युत हांे तो योगकारक होते हैं। यदि राहु अथवा केतु कंेद्र में ही शुभराशि में अकेले हो तो भी योगकारक होता है। राहु-केतु के मारकत्व का विचार राहु या केतु की युति यदि मारकेश के साथ हो तो मारक हो जाता है। यदि मिथुन लग्न हो व गुरु और राहु की सप्तम भाव में युति हो तो राहु प्रबल मारक होता है। राहु और केतु के दशाफल का विचार राहु या केतु छायाग्रह है जो जिस भाव में या जिस भावेश के साथ स्थित होता है उसी भाव या भावेश के अनुरूप फल देता है। राहु और केतु यदि त्रिकोण में हों तो योगकारक ग्रह की महादशा में अपनी अंतर्दशा में योगफल देते हैं। जब राहु की महादशा में शुभ ग्रह की अंतर्दशा आती है तो वे उत्कृष्ट और अशुभ ग्रह की अंतर्दशा हो तो हीन फल देते हैं। जब राहु अथवा केतु त्रिकोण में कन्या या मिथुन राशि में हो और किसी भी ग्रह से उसका संबंध हों तो अंतर्दशा के शुभ अथवा अशुभ गुणों के अनुसार राजयोग देने वाला होता है। राहु या केतु यदि लग्न, पंचम अथवा नवम भाव में हो तो अपनी महादशा में त्रिकोण की अंतर्दशा में अथवा त्रिकोणेश की महादशा में अपनी अंतर्दशा में शुभफल देता है। राहु अथवा केतु यदि त्रिषडायस्थ हो और उसके साथ कोई ग्रह नहीं हो तो ऐसी परिस्थति में पापी ग्रहों की अंतर्दशा में पापफल, शुभ ग्रहों की अंतर्दशा में पाप और कारक ग्रहों की अंतर्दशा में अतिपाप फल मिलता है। यदि राहु अथवा केतु द्वितीयस्थ, सप्तमस्थ, अष्टमस्थ, द्वादशस्थ अथवा त्रिषडायस्थ होकर मारकेश के साथ हो तो स्वयं मारकेश होता है। यदि राहु अथवा केतु केंद्र या त्रिकोण के अतिरिक्त पाप स्थानगत हो तथा उसमें संबंधित शुभ ग्रहों की अंतर्दशा न आए तो पाप फल मिलता है। यदि राहु केंद्र स्थान में मेष, वृश्चिक, मिथुन, कन्या, कर्क या मकर राशि में स्थित हो तो पाराशर मुनि के अनुसार वह स्वयं राजयोग कारक होता है। सामान्यतः राहु की दशा के प्रारंभ में दुःख, मध्य में सुख तथा अंत में पदच्युति, स्थान परिवर्तन व माता-पिता को कष्ट होता है। राहु केंद्र या त्रिकोण में स्थित हो अथवा उसका नवमेश या दशमेश से संबंध हो तो राहु की दशा धन, मान, पद, प्रतिष्ठा, भाग्य व सुख बढ़ाती है। राहु यदि अष्टम अथवा व्यय स्थान में हो तो उसकी दशा कष्टप्रद होती है। उसका पाप ग्रह से संबंध या मारक ग्रह से युति हो अथवा वह नीच राशिस्थ हो तो जातक को स्त्री-पुत्र का शोक, व्यथा, कुमति, पीड़ा तथा धन-संपत्ति का क्षय होता है। राहु का शुभ भाव में शुभ ग्रह से दृष्टि युति संबंध धन, मान व सुख-सफलता देता है। राहु का राशिगत फल यदि राहु कर्क, वृष या मेष में हो तो उसकी दशा में धन और धान्य का लाभ होता है। इसके अतिरिक्त विद्या, राजा से सम्मान और स्त्री-पुत्र का पूर्ण सुख मिलता है। यदि राहु कन्या, मीन या धनु राशि में हो तो पुत्र और स्त्री का सुख मिलता है, लेकिन महादशा के अंत में सुख-वैभव का नाश हो जाता है। यदि राहु वृष, कर्क, सिंह अथवा कन्या राशि का हो तो जातक को राजा के सदृश वैभव प्राप्त होता है। वह सभी का उपकार करता है और बहुत धनी होता है।



राहु-केतु विशेषांक  आगस्त 2008

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