नवग्रहों के नक्षत्रों में स्थित राहू के फल

नवग्रहों के नक्षत्रों में स्थित राहू के फल  

नवग्रहों के नक्षत्रों में स्थित राहु के फल पं. निर्मल कुमार झा जिस तरह राहु-केतु किसी राशि या भाव में स्थित होकर उसी राशि या भाव के अनुसार फल देते हैं, उसी तरह विभिन्न नक्षत्रों पर अवस्थित होने पर भी इनके प्रभावों में अंतर आता है। यदि राहु अशुभ भावों के नक्षत्रों के अधिपतियों या अन्य अशुभ भावों के भावेशों के साथ युति में हो तो अशुभ फल देता है। सूर्य के नक्षत्र में स्थित राहु उदाहरणार्थ राहु यदि सूर्य के नक्षत्र कृत्तिका, उत्तर फाल्गुनी या उत्तराषाढ़ा पर हो तो जातक को राहु की दशा या अंतर्दशा में उच्च ज्वर, हृदय रोग, सिर में चक्कर, शरीर में झुनझुनाहट, संक्रामक रोग, शत्रु उपद्रव, हानि, गृह-कलह आदि का सामना करना पड़ता है। उसके मन में अपने भागीदारों के प्रति शंका रहती है। उसका स्थान परिवर्तन, दूर गमन, संक्रामक रोग आदि होते हैं। सूर्य, जो नक्षत्रेश है, के साथ राहु के होने तथा सूर्य के अशुभ स्थान में होने से ऐसा होता है। लेकिन, सूर्य जब शुभ स्थिति में हो तो प्रोन्नति, राज लाभ, प्रसिद्धि, यश तथा नाम प्रतिष्ठा एवं सम्मान में वृद्धि होती है। चंद्र के नक्षत्र में स्थित राहु जब चंद्र स्वयं अशुभ स्थिति में और राहु उसके नक्षत्र में हो तो राहु के चंद्र के नक्षत्र रोहिणी, हस्त तथा श्रवण में अशुभ फल मिलता है। ऐसी स्थिति में जातक की जल में डूबने से मृत्यु, शीत रोग, टी. बी. या स्नोफिलियां हो सकता है। इसके अतिरिक्त पत्नी के रोग ग्रस्त होने या उसकी अकाल मृत्यु के साथ-साथ जातक के अंगों में सूजन अनचाहे स्थान पर स्थानांतरण की संभावना रहती है। मंगल के नक्षत्र में राहु राहु जब मंगल के नक्षत्र मृगशिरा, चित्रा या धनिष्ठा पर होता है तो धन की हानि, अग्नि, चोर तथा डाकू के द्वारा नुकसान, मुकदमे में पराजय तथा पैसे की बर्वादी होती है। इस अवधि में किसी से शत्रुता, मित्र अथवा पार्टनर से धोखा मिलना, पुलिस या अन्य उच्चाधिकारी से विवाद आदि होते हंै। लेकिन मंगल यदि शुभ स्थिति में हो तो भूमि, भवन, और वाहन का लाभ, निर्माण कार्य, ठेकेदारी, बीमा, एजेंसी, जमीन जायदाद के कारोबार आदि से लाभ होता है। बुध के नक्षत्र में राहु राहु जब बुध के नक्षत्र आश्लेषा, ज्येष्ठा या रेवती पर हो तो व्यक्ति लोकप्रिय होता है, उसकी आय के कई साधन होते हैं, राजकृपा की प्राप्ति, दूर-दराज के लोगों से परिचय तथा उनके साथ कार्य करने की स्थिति बनती है। उसे संतान, वाहन आदि का सुख मिलता है। यदि बुध दुःस्थान में हो तो व्यक्ति को धोखेबाज, छली तथा कपटी बना देता है। उसकी बात पर लोग विश्वास नहीं करते। उसे थायरायड रोग भी हो सकता है। बृहस्पति के नक्षत्र में राहु राहु के बृहस्पति के नक्षत्र पुनर्वसु विशाखा या पूर्वभाद्र पर अवस्थित होने से शत्रु पर विजय और चुनाव में जीत होती है। इसके अतिरिक्त लक्ष्मी का आगमन, संतान की उत्पत्ति, परिवार में हर्ष, उल्लास, उमंग एवं सुख में वृद्धि आदि फल मिलते हैं। किंतु बृहस्पति के अशुभ भाव या प्रभाव में होने पर व्यक्ति को अपमान, पराजय, संपत्ति की हानि, कार्य में बाधा आदि का सामना करना पड़ता है। शुक्र के नक्षत्र में राहु राहु जब शुक्र के नक्षत्र भरणी, पूर्व फाल्गुनी या पूर्वाषाढ़ा पर हो तो वाहन तथा मूल्यवान और सुंदर वस्तुओं का क्रय सुंदर फर्नीचर आदि से घर की सज्जा, आभूषण आदि का क्रय, संबंधियों से मधुर संबंध, स्त्री सुख, धन-आगमन, आदि परिणाम मिलते हैं। कन्या संतान सुख भी इसी अवधि में होता है। लेकिन शुक्र अशुभ स्थिति में हो तो किसी स्त्री के द्वारा ब्लैकमेलिंग, यौन रोग, स्त्री के कारण धन की क्षति आदि की संभावना रहती है। राहु के नक्षत्र में राहु यदि राहु अपने नक्षत्र आद्र्रा, स्वाति या शतभिषा पर हो तो व्यक्ति मानसिक कष्ट, विष भय, स्वास्थ्य में गिरावट, जोड़ों के दर्द, चोट, भ्रम, दुश्ंिचताओं आदि से ग्रस्त होता है। इस अपधि में उसके परिवार में किसी बुजुर्ग की मृत्य,ु जीवन संगिनी का वियोग होता है। इसके अतिरिक्त उसके स्थान परिवर्तन और अपयश की संभावना रहती है। किंतु यदि राहु शुभ ग्रह की महादशा के अंतकाल में होता है तो आनंद, प्रोन्नति तथा विदेश भ्रमण आदि सुयोग देता है। केतु के नक्षत्र में राहु राहु केतु के नक्षत्र अश्विनी, मघा या मूल में हो तो जातक शंकालु, स्वभाव का होता है। उदसे सांप का भय होता है और उसकी हड्डी के टूटने तथा बवासीर की संभावना रहती है। उसे जीवन साथी से परेशानी तथा बड़े लोगों से शत्रुता रहती है और उसके धन तथा प्रतिष्ठा की हानि होती है। यदि जन्मकुंडली में केतु की स्थिति अच्छी हो तो व्यक्ति बहुमूल्य आभूषणों की खरीदारी करता है और उसे विवाह, प्रोन्नति, भूमि-भवन आदि का सुख प्राप्त होता है। त शनि के नक्षत्र में राहु राहु जब शनि के नक्षत्र पुष्य, अनुराधा या उत्तरभाद्र पर हो तो व्यक्ति अपयश, चोट, किसी गंभीर रोग, गठिया या वात से पीड़ा, पित्तजन्य दोष आदि से ग्रस्त तथा मंदिरा का व्यसनी हो सकता है। अपने पार्टनर के प्रति उसके मन में गलतफहमी रहती है। उसके तलाक स्थान परिवर्तन आदि की संभावना भी रहती है।



राहु-केतु विशेषांक  आगस्त 2008

राहू केतु का ज्योतिषीय, पौराणिक एवं खगोलीय आधार, राहू-केतु से बनने वाले ज्योतिषीय योग एवं प्रभाव, राहू केतु का द्वादश भावों में शुभाशुभ फल, राहू केतु की दशा-अंतर्दशा का फलकथन सिद्धांत, राहू केतु के दुष्प्रभावों से बचने हेतु उपाय

सब्सक्राइब

अपने विचार व्यक्त करें

blog comments powered by Disqus
.