द्वादश राशियों पर राहू का गोचरीय प्रभाव

द्वादश राशियों पर राहू का गोचरीय प्रभाव  

द्वादश राशियों पर राहु का गोचरीय प्रभाव डाॅ. लक्ष्मी नारायण शर्मा ‘मयंक’ राहु को अंग्रेजी में ‘ड्रेगन्स हेड’ या ‘असेंडिंग नोड’ कहते हैं। राहु बुध, शुक्र और शनि से मित्रता तथा सूर्य, चंद्र और मंगल से शत्रुता रखता है। गुरु एवं केतु से इसके सम संबंध हंै। यह मिथुन राशि में 15 अंश तक उच्च का और धनु में 15 अंश तक नीच का माना जाता है। कर्क इसकी मूल त्रिकोण राशि है। कुछ विद्वानों के अनुसार यह कुंभ या कन्या राशि में स्वराशि का माना जाता है। यह एक राशि को 18 महीने में पार कर लेता है। भचक्र की एक परिक्रमा राहु 18 वर्ष में पूर्ण करता है। जन्मांग में भाव 3, 6, 10 या 11 में इसकी स्थिति शुभ और 1, 2, 5, 7 या 9 में अशुभ होती है। भाव 4, 8 एवं 12 में अत्यंत ही अरिष्टकारक होता है। यह अपने स्थान से भाव 5, 7 तथा 9 पर दृष्टि डालता है। यदि राहु शुभ और बली हो तो व्यक्ति मनोविज्ञान तथा विभिन्न भाषाओं का ज्ञाता होता है। किंतु जीवन यापन के लिए वह दलाली, लाॅटरी, सर्प पालना, उद्योग, पशु तथा जंतु पालन, मांस विक्रय, कबाड़, या जादू का कार्य करता है। यद्यपि ज्योतिष के विद्वानों का मत है कि राहु-केतु का स्वतंत्र अस्तित्व नहीं होने के कारण ये दोनों जिस भाव में होते हैं उस भाव के स्वामी के अनुसार फल देते हैं, लेकिन वास्तव में इनका स्वतंत्र प्रभाव भी अनुभव किया गया है। यदि राहु कुंडली में बलवान और शुभ स्थिति में हो तो अपनी महादशा या अंतर्दशा में शुभ फल देता है। धन संचय, व्यवसाय में धन लाभ, उच्च पद की प्राप्ति, सुख, तीर्थ यात्रा आदि शुभ राहु की दशा के ही फल हैं। किंतु यदि यह कुंडली में अशुभ स्थिति में हो तो वह अपनी महादशा या अंतर्दशा में अशुभ फल देता है, जैसे धन-हानि, बेरोजगारी कलह, निर्धनता, स्वास्थ्य हीनता, लाइलाज रोग, परिवार में किसी की मृत्यु आदि। वर्तमान समय में राहु गोचर में गत 5 मई से मकर में है और 2 नवंबर 2009 तक इसी में रहेगा। इस प्रकार, विभिन्न राशियों के जातक राहु के गोचरीय प्रभाव निम्न प्रकार अनुभव कर सकते हैं- मेष के लिए: इस स्थिति में धार्मिक कार्यों में रुचि, सब तरफ से सफलता, सुख आदि प्राप्त होते हैं। वृष के लिए: वृष राशि वाले जातक पारिवारिक विरोध, भाग्य दोष, खर्च की वृद्धि, अपयश, धार्मिक कार्यों में अरुचि आदि महसूस कर सकते हैं। मिथुन के लिए: समस्याओं की जटिलता, कष्ट एवं दुर्घटना आदि इस समय सामने आ सकती हैं। कर्क के लिए: राहु की यह स्थिति कर्क राशि वालों के लिए मानसिक तनाव, दाम्पत्य जीवन में मतभेद, वाणी में कटुता एवं क्रोध में वृद्धि का कारण बन सकती है। सिंह के लिए: इस स्थिति में उन्नति, नौकरी और व्यवसाय में सफलता, आनंद आदि मिलते हैं तथा भाग्य साथ देता है। कन्या के लिए: यह स्थिति क्लेश, असफलता, वाद-विवाद, मित्रों से असहयोग आदि प्रतिकूल दे सकती है। तुला के लिए: काम का बिगड़ना, शत्रुओं में वृद्धि, माता को कष्ट व चोट एवं दुर्घटना आदि इस चतुर्थ राहु के फल हंै। वृश्चिक के लिए: राहु यदि जन्म राशि से तृतीयस्थ हो तो जातक के बिगड़े काम बनते हैं और पराक्रम में वृद्धि तथा धन-लाभ एवं सुख की प्राप्ति है। धनु के लिए: राशि से द्वितीय राहु प्रतिकूलता, आर्थिक हानि एवं दुख देता है। मकर के लिए: लग्नस्थ राहु अस्त-व्यस्त जीवन, शारीरिक दुर्बलता एवं हानि देने वाला होता है। कुंभ के लिए: राशि से द्वादश भाव में स्थित राहु के कारण जातक के धन का अपव्यय होता है और वह स्वयं कुसंगति का शिकार होता है। इसके अतिरिक्त आंखों के रोग, जेल जाने के डर तथा नित्य कर्मों में अवरोध का सामना करना पड़ता है। मीन के लिए: मीन राशि वालों के लिए राहु काम-काज में उन्नति, कार्य-व्यवसाय का विस्तार, भूमि, भवन एवं वाहन का सुख आदि फल देता है। राहु जनित कष्टों से मुक्ति के उपाय हेतु राहु के अशुभ प्रभाव से ग्रस्त जातकों को राहु से संबंधित किसी भी मंत्र का जप कम से कम 18000 एवं अधिक से अधिक 72000 बार करना चाहिए। शुभ प्रभाव के लिए राहु यंत्र भी धारण किया जा सकता है। मां दुर्गा, काली एवं गणेश की उपासना से राहु का दुष्प्रभाव दूर हो जाता है।



राहु-केतु विशेषांक  आगस्त 2008

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