सूर्य की कक्षा का दूसरा ग्रह शुक्र

सूर्य की कक्षा का दूसरा ग्रह शुक्र  

सूर्य की कक्षा का दूसरा ग्रह शुक्र आचार्य अविनाश सिंह शुक्र, जिसे भोर या शाम का तारा भी कहते हैं, का स्थान बुध के बाद दूसरा है। सूर्य की परिक्रमा करने वाले ग्रहों की कक्षाओं में शुक्र की कक्षा दूसरी है। इसकी कक्षा क्रांतिवृŸा के दोनों ओर अधिकतम 3°24श् का कोण बनाते हुए झुकी है। सूर्य से इसकी औसतन दूरी लगभग 672 लाख और व्यास लगभग 7500 मील है। शुक्र की नक्षत्र परिक्रमा अवधि 224.7 तथा संयुति काल 584 दिन है। बुध और शुक्र आंतरिक या अंतः ग्रह हैं जो हमेशा सूर्य के आस-पास ही पश्चिम या पूर्व की दिशा में दिखाई पड़ते हैं। शुक्र को कभी सूर्योदय सूर्यास्त के बाद देखा जा सकता है। यह अन्य ग्रहों और तारों से अधिक प्रकाश मान दिखाई पड़ता है। शुक्र पर घना वातावरण और मेघ है। अतः वहां जीवधारी के होने की कल्पना की जा सकती है। सूर्य और पृथ्वी के बीच शुक्र के आ जाने पर कभी छोटा सा ग्रहण भी लगता है जिसे शुक्र का अतिक्रमण भी कहते हैं। इस स्थिति में सूर्य पर एक छोटा सा काला धब्बा चलता दिखाई देता है। ऐसा इसलिए होता है क्योंकि शुक्र की कक्षा सूर्य और पृथ्वी के बीच है। शुक्र गुरु से छोटा है फिर भी उससे अधिक तेजस्वी दिखाई देता है। इसका कारण यह है कि वह गुरु की अपेक्षा सूर्य और पृथ्वी के अधिक निकट है। शुक्र सूर्य से 470 से अधिक दूरी पर कभी नहीं जाता, अर्थात् शुक्र और सूर्य की भचक्र में आपसी दूरी अधिकतम 47 अंश ही हो सकती है। इसी कारण शुक्र सूर्योदय से पूर्व और सूर्यास्त के बाद पूर्व या पश्चिम में ही दिखाई देता है। दिन के समय यह दिखाई नहीं देता यह मार्गी और वक्री दोनों स्थितियों में भ्रमण करता है। मार्गी शुक्र सूर्य से 100 के अंतर पर अस्त और 100 के अंतर पर ही उदित होता है। वक्री गति में शुक्र सूर्य से 80 के अंतर पर अस्त होता है। मार्गी गति में जब अस्त होता है तो लगभग दो माह के लिए अस्त हो जाता है जबकि वक्री गति में अस्त होने पर यह कम से कम 5 और अधिक से अधिक 15 दिनों के लिए अस्त होता है। शुक्र की कलाएं भी बढ़ती-घटती रहती हैं। इसकी कलाओं को देखा भी जा सकता है। पौराणिक दृष्टिकोण: शुक्र राक्षसों के गुरु माने जाते हैं। इनका वर्ण श्वेत है, सिर पर सुंदर मुकुट तथा गले में माला है। श्वेत कमल इनका आसन है। उनके चार हाथों में क्रमशः दंड, रुद्राक्ष माला, पात्र तथा वरद मुद्राएं सुशोभित हैं। मत्स्यपुराण के अनुसार शुक्राचार्य ने असुरों के कल्याण के लिए कठोर व्रत का अनुष्ठान किया। इस व्रत से उन्होंने भगवान् शिव को प्रसन्न कर उनसे युद्ध में देवताओं को पराजित करने का वरदान प्राप्त किया। शिव ने यह वरदान भी दिया कि उन्हें कोई नहीं मार सकेगा साथ ही भगवान् उन्हें धन का भी अध्यक्ष बना दिया। इस तरह शुक्राचार्य इस लोक और परलोक की सारी संपŸिायों के स्वामी बन गए। महाभारत के अनुसार संपŸिा ही नहीं शुक्राचार्य औषधियों, मंत्रों तथा रसों के भी स्वामी हैं। उनकी सामथ्र्य अद्भुत है। किंतु उन्होंने अपनी समस्त संपŸिा अपने शिष्य असुरों को दे दी और स्वयं ही बने रहे। शुक्राचार्य योग के आचार्य भी हैं। अपने शिष्य असुरों पर उनकी कृपा सदा बरसती रहती है। उन्होंने भगवान शिव की तपस्या से मृत संजीवनी विद्या भी प्राप्त की जिसके बल पर वह युद्ध में मरे हुए असुरों को जीवित कर देते थे। ब्रह्मा की प्रेरणा से शुक्राचार्य ग्रह बनकर तीनों लोकों को प्रभावित करने लगे। कभी वृष्टि तो कभी अनावृष्टि, कभी भय, कभी अभय उत्पन्न कर वह प्राणियों को प्रभावित करते हैं। वह ग्रह के रूप में ब्रह्मा की सभा में भी उपस्थित होते हैं। लोकों के लिए वह अनुकूल ग्रह हैं। उनके अधिदेवता इंद्राणी तथा प्रत्यधि देवता इंद्र हैं। मत्स्य पुराण के अनुसार शुक्राचार्य का वर्ण श्वेत है। उनका वाहन रथ है जिसमें अग्नि के समान आठ घोड़े जुटे होते हैं। रथ पर ध्वजाएं फहराती रहती हैं। उनका आयुध दंड है। ज्योतिषीय दृष्टिकोण- ज्योतिषीय दृष्टि से शुक्र एक ग्रह है जिसका प्रभाव जन-जीवन पर पड़ता है। शुक्र ग्रह से प्रभावित जातक सुंदर, तीक्ष्ण नैन-नक्श, विशाल शरीर, घुंघराले बाल, श्वेत वर्ण और आकर्षक व्यक्तित्व वाला होता है। ऐसे जातक विज्ञान, ललित कला, संगीत, नृत्य, भवन निर्माण कला, अभिनय, ड्रेस डिजाइनिंग, इंटीरियर, डिजाइनिंग आदि में रुचि रखते हैं। शुक्र विज्ञान और कला का मिश्रण है। आधुनिक युग में शुक्र का प्रभाव विशेष रूप से देखने को मिलता है चांद पर उतरने के बाद आज का मानव अन्य ग्रहों नक्षत्रों को भी छूने की कोशिश में है। तकनीकी और कला के क्षेत्रों में वह बहुत आगे पहुंच गया है। दूर संचार के उपकरण तकनीकी की देन हंै। वहीं इन उपकरणों के माध्यम से होने वाली सुख सुविधा व कला के क्षेत्र शुक्र का ही मिश्रित रूप हैं। शुक्र कल्पनाओं को साकार करने में सहायक है। इलेक्ट्राॅनिक मीडिया, कंप्यूटर आदि शुक्र के प्रभाव हैं जिनका उपयोग आज मानव कर रहा है और जिसके फलस्वरूप दूरियां खत्म हो गई हैं। आज हम घर बैठे हर चीज की जानकारी हासिल कर सकते हैं। यह सब शुक्र के प्रभाव का ही नतीजा है। आधुनिक तकनीकी और कला से संबंधित व्यवसाय - इंजीनियरिंग, भवन निर्माण, डिजाइनिंग, पेंटिंग, विज्ञापन, कंप्यूटर निर्माण व शिक्षा, लेखन, फिल्म, संगीत, नृत्य, आदि - शुक्र से ही प्रभावित होते हैं। मेडिकल क्षेत्र में शल्य चिकित्सा और औषधि विज्ञाान पर भी शुक्र का प्रभाव होता है। शुक्र विपरीत लिंग को भी आकर्षित करता है। दाम्पत्य, प्रेम संबंध, शारीरिक आनंद, पारिवारिक आनंद और जीवन शक्ति सबको शुक्र प्रभावित करता है। शुक्र ही शुक्राणुओं का कारक है जो उत्पŸिा के कारक हैं। कुंडली में शुक्र की स्थिति शुभ होने पर जातक को नाना प्रकार के सुख प्राप्त होते हैं किंतु अशुभ या कमजोर होने पर सुखों में कमी आती है। शुक्र सप्तम् भाव का कारक ग्रह है। सप्तम् भाव में शुक्र की स्थिति स्त्री सुख को बढ़ाती है। शुभ शुक्र जिस भाव में बैठता है उस भाव से संबंधित सुखों को बढ़ाता है। शुक्र वृष और तुला राशियों का स्वामी है। मीन राशि में यह उच्च का और कन्या में नीच का माना जाता है। भरणी, पूर्वा फाल्गुनी और पूर्वा आषाढ़ नक्षत्रों का भी यह स्वामी है। यह पूर्व दक्षिण दिशा का स्वामी है। इसका वर्ण ब्राह्मण है। शुक्र जननांगों, शुक्राणु, मासपेशियों, मूत्राशय, जंघाओं, केश आदि शरीर के विभिन्न अंगों का प्रतीक है। यौन रोग, कामशक्ति में कमी, गठिया, नेत्र रोग, सूंघने की शक्ति की क्षीणता, श्वेत प्रदर आदि विभिन्न रोग शुक्र के अशुभ प्रभाव के कारण होते हैं। शुक्र ग्रह की अशुभता के शमन के लिए गो-पूजा करनी चाहिए तथा हीरा धारण करना चाहिए। चांदी, सोना, चावल, घी, सफेद वस्त्र, सफेद चंदन, हीरा, दही, चीनी, आदि का ब्राह्मणों को दान देना चाहिए। साथ ही शुक्र के बीज मंत्र ¬ द्रां द्रीं द्रौं सः शुक्राय नमः का जप करना चाहिए।



श्री विद्या विशेषांक   मई 2008

श्री यंत्र की उत्पति एवं माहात्म्य, श्री यंत्र के लाभ, श्री यंत्र को सिद्ध करने की विधि, श्री यंत्र की उपासना तथा इसमें ली जाने वाली सावधानियां, पदार्थों एवं स्वरूप के आधार पर विभिन्न प्रकार के श्री यंत्र एवं उनका उपयोग पर यह विशेषांक आधारित है.

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