शुक्रास्त में अक्षय तृतीया को गूँज सकती है शहनाइयां

शुक्रास्त में अक्षय तृतीया को गूँज सकती है शहनाइयां  

शुक्रास्त में अक्षय तृतीया को गूंज सकती हैं शहनाइयां पं. सुनील जोशी जुन्नरकर, ग्वालियर शुक्रास्त 5 मई को या 9 मई को? शुक्र तारे का अस्त कब से हो रहा है? पंचांगकर्ताओं के बीच अब यह विवाद का विषय बन गया है। कालांतर पंचांग 1 मई को, निर्णय सागर 5 मई को तथा दांते पंचांग 9 मई को, पूर्व दिशा में शुक्रास्त बता रहे हैं। निर्णय सागरीय चंडमार्Ÿांड पंचांग के अनुसार वैशाख अमावस्या, दिनांक 05-05-2008 कीे सुबह सूर्य के स्पष्ट अंश 20ः55ः19 तथा मेष राशि में शुक्र के स्पष्ट अंश 11ः30ः41 अंकित हैं। इस प्रकार मेष राशि में सूर्य-शुक्र दोनों के बीच 9 अंश 24 कला 38 विकला का अंतर है। खगोलशास्त्र के सिद्धांतानुसार 9 या 9 से कम अंशांतर की दूरी पर सूर्य के समीप जाकर शुक्र अस्त हो जाता है। किंतु 5 मई को शुक्रास्त होने में 24 कला और 38 विकला की दूरी शेष है इसलिए उस दिन शुक्रास्त नहीं होगा। 24ः38 कला/विकला की अंशात्मक दूरी तय करके शुक्र 9 मई की शाम तक सूर्य के 9 अंश समीप पहंुच जाएगा। और तब वह अस्त होगा। अतः दांते पंचांग में लिखित 9 मई को शुक्रास्त (शुक्रलोप) सही है। इसलिए 6 व 7 मई को सर्वार्थसिद्धि योग में विवाह आदि शुभ कार्य किए जा सकते हैं। दिनांक 9 मई को पूर्व दिशा में शुक्र अस्त होगा और जून माह के अंत तक इसी अवस्था में रहेगा। तत्पश्चात् 10 जुलाई 2008 को शुक्र पश्चिम दिशा में उदित होगा। आषाढ़ शुक्ल नवमी (11 जुलाई 2008) से शहनाइयां पुनः गूंज उठेंगी। शुक्रास्त काल में भी संभव है अक्षय तृतीया को विवाह 7 मई को वैशाख शुक्ल द्वितीया प्रातः 10 बजे तक रहेगी, तत्पश्चात् तृतीया प्रारंभ होगी। वैशाख शुक्ल तृतीया, अक्षय तृतीया के नाम से जानी जाती है। रोहिणी नक्षत्र युक्त अक्षय तृतीया महाफलदायी होती है। यदि उस दिन बुधवार भी हो तो इस तिथि के शुभत्व में अनंतगुणा वृद्धि हो जाती है। रोहिणी नक्षत्र इस दिन रात्रि 8 बजे तक रहेगा। अतः 7 मई को अक्षय तृतीया, रोहिणी नक्षत्र और बुधवार का संयोग है। शास्त्रों की ऐसी मान्यता है कि ऐसे शुभ मुहूर्Ÿा में किए गए शुभ कर्यों का फल अनंतगुणा शुभ हो जाता है। स शुक्रास्त 9 मई को होगा। इसलिए 7 मई को विवाह आदि शुभ कार्य सर्वार्थ सिद्धि योग में किए जा सकते हैं। स यदि 5 मई को शुक्रास्त मान भी लें तो भी 7 मई को अक्षय तृतीया के दिन विवाह आदि शुभकार्य करने में कोई दोष नहीं है क्योंकि अक्षय तृतीया पूर्ण शुभ होने के कारण स्वयं सिद्ध मुहूर्Ÿा है। इस दिन ग्रह, नक्षत्र आदि के सभी दुर्योगों का परिहार स्वतः हो जाता है। मई-जून 2008 में केवल शुक्र अस्त है, गुरु नहीं। इसलिए विवाह आदि शुभ कार्य अक्षय तृतीया को किए जा सकते हैं। स देव ऋषि नारद के अनुसार यदि कन्या युवती/प्रौढ़ा हो गई हो तो उसके विवाह के लिये गुरु-शुक्र की अनुकूलता या गुरु या शुक्र के अस्त के दोष का विचार करने की स पं. सुनील जोशी जुन्नरकर, ग्वालियर आवश्यकता नहीं है। स यदि वर की जन्म राशि से सूर्य और शुक्र तथा कन्या की जन्मराशि से गुरु और चंद्र का गोचर शुभ हो और जब त्रिबल शुद्धि हो, तो विवाह करना शास्त्रसम्मत है। स रेवती से मृगशिरा नक्षत्र तक शुक्र अंधा रहता है। ऐसे समय में एक ही नगर या ग्राम के भीतर विवाह करने में शुक्रास्त का दोष नहीं लगता। स 7 मई 2008 को शुक्र 13 डिग्री से अधिक अंश का है। अतः उसमें बाल्य या वृद्धत्व का दोष नहीं है। इसलिये अक्षय तृतीया को विवाह आदि मांगलिक कार्य करना शुभ है। स विवाह लग्न में लŸाादि 10 दोष प्रमुख रूप से वर्जित हैं। इन दोषों में गुरु या शुक्र के अस्त होने का दोष शामिल नहीं है। अतः विवाह मुहूर्Ÿा में गुरु या शुक्र का अस्त होना कोई महादोष नहीं है। शुक्र तारा कैसे अस्त होता है? सौर मंडल में सूर्य के बाद पहली कक्षा बुध की और दूसरी शुक्र की है। सूर्य जिस राशि में रहता है, बुध और शुक्र भी उसी राशि में या फिर उसके आगे पीछे की राशि में रहते हंै। सूर्य की परिक्रमा करता हुआ (पृथ्वी के सापेक्ष) शुक्र जब सूर्य के पीछे चला जाता है तब सूर्य के एक ओर पृथ्वी और दूसरी ओर शुक्र स्थित होता है। ऐसे में पृथ्वी वासियों को शुक्र दिखाई नहीं देता है। शुक्र की इस अदृश्यता को ही शुक्रास्त या शुक्रलोप कहते हैं। अस्त के समय शुक्र पृथ्वी से 6 राशियों की दूरी पर स्थित रहता है। खगोलशास्त्र की भाषा में इस खगोलीय घटना को पृथ्वी व शुक्र का षट्भांतर योग कहते हैं। सूर्य के समीप सभी ग्रह एक निश्चित दूरी (अंश) पर जाकर अस्त हो जाते हैं। अर्थात् सूर्य के प्रचंड प्रकाश के आगे वे दिखाई नहीं देते हैं। फलित ज्योतिष में अस्त ग्रहों का फल शून्य होता है। जब सूर्य और शुक्र के बीच 9 डिग्री का अंशांतर रहता है, तब शुक्र अस्त हो जाता है। अर्थात् सूर्य के समीप पहुंचने से पूर्व 9 डिग्री अंशांतर पर ही शुक्र अस्त हो जाता है तथा सूर्य से 9 डिग्री दूर चले जाने तक अस्त रहता है। तात्पर्य यह है कि शुक्रास्त के समय सूर्य और शुक्र के बीच की अंशात्मक दूरी औसत रूप से 9 या 9 डिग्री से कम रहती है। इस खगोलीय घटना को शुक्र का अस्त कहा जाता है। जब शुक्र पूर्व दिशा में अस्त होता है तो लगभग 2 माह तक अस्त ही रहता है। इसके बाद वह 9 माह तक पश्चिम में उदित रहता है। यह ग्रह 10 जुलाई 2008 को कर्क राशि में, पश्चिम दिशा में उदित होगा। तब शुभ कार्य किए जा सकेंगे। विवाह के दिन विवाह शुद्धि चक्र में वर की (जन्म) चंद्र राशि से 4, 8, 12 स्थान में शुक्र का रहना अशुभ होता है। उसके अशुभ स्थान में रहते विवाह करने से पति का पौरुष क्षीण हो जाता है।



श्री विद्या विशेषांक   मई 2008

श्री यंत्र की उत्पति एवं माहात्म्य, श्री यंत्र के लाभ, श्री यंत्र को सिद्ध करने की विधि, श्री यंत्र की उपासना तथा इसमें ली जाने वाली सावधानियां, पदार्थों एवं स्वरूप के आधार पर विभिन्न प्रकार के श्री यंत्र एवं उनका उपयोग पर यह विशेषांक आधारित है.

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