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कौन बन सकता है अच्छा साधक

कौन बन सकता है अच्छा साधक  

कौन बन सकता है अच्छा साधक? पं. राधाकृष्ण त्रिपाठी मंत्र साधना से पूर्व साधक के जन्मकालीन ग्रहों के अध्ययन से यह ज्ञात कर लेना चाहिए कि वह किस प्रकार की उपासना में सफल होगा। जन्मकुंडली में नवम भाव से ही उपासना का ज्ञान होता है। कुछ अनुभव सिद्ध तथ्य यहां प्रस्तुत हैं। यदि जन्मकुंडली में बृहस्पति, मंगल एवं बुध साथ हों या उनकी एक दूसरे पर परस्पर दृष्टि हो तो व्यक्ति साधना क्षेत्र में सफलता प्राप्त करता है। गुरु व बुध दोनों ही नवम भाव में हांे तो व्यक्ति ब्रह्म से साक्षात्कार कर सकने में सफल होता है। सूर्य उच्च का होकर लग्नेश के साथ हो तो जातक श्रेष्ठ साधक होता है। यदि लग्नेश पर गुरु की दृष्टि हो तो जातक स्वयं मंत्रस्वरूप हो जाता है, मंत्र उसके हाथों में खेलते हैं। यदि दशमेश दशम स्थान में हो तो व्यक्ति साकार उपासक होता है। दशमेश शनि के साथ हो तो व्यक्ति तामसी उपासक होता है। अष्टम भाव में राहु हो तो जातक श्रेष्ठ मंत्र साधक और तांत्रिक होता है। पर ऐसे लोग अपने आपको गोपनीय बनाए रखते हैं। दशमेश का शुक्र या चंद्र से संबंध हो तो जातक दूसरों की सहायता से उपासना साधना में सफलता प्राप्त करता है। यदि पंचम स्थान में सूर्य हो या सूर्य की उस पर दृष्टि हो तो व्यक्ति शक्ति उपासना में पूर्ण सफलता प्राप्त करता है। यदि पंचम एवं नवम भाव में शुभ बली ग्रह हों तो व्यक्ति सगुणोपासक होता है। नवम भाव में मंगल हो या मंगल की उस पर दृष्टि हो तो जातक शिवाराधना में सफलता पा सकता है। यदि नवम स्थान में शनि हो तो जातक साधु होता है। यदि ऐसा शनि स्वराशि या उच्च राशि का हो तो व्यक्ति वृद्धावस्था में विश्व प्रसिद्ध संन्यासी होता है। जन्मकुंडली में सूर्य बली हो तो शक्ति की उपासना करनी चाहिए। चंद्र बली हो तो तामसी उपासना में सफलता मिलती है। मंगल बली हो तो शिव उपासना से मनोकामना की पूर्ति होती है। बुध प्रबल हो तो तंत्र साधना में सफलता प्राप्त होती है। गुरु श्रेष्ठ हो तो जातक को साकार ब्रह्म की उपासना से ख्याति मिलती है। शुक्र बलवान हो तो मंत्र साधना में सफलता प्राप्त होती है। शनि बलवान हो तो जातक सिद्ध उपासक होता है। उसे तंत्र एवं मंत्र दोनों की साधना में सफलता प्राप्त होती है। यदि लग्न या चंद्र पर शनि की दृष्टि हो तो जातक सफल साधक हो सकता है। दशम भाव का स्वामी सप्तम भाव में हो तो व्यक्ति तांत्रिक उपासना के क्षेत्र में सफल होता है। यदि वृष का चंद्र गुरु और शुक्र के साथ केंद्र में हो तो व्यक्ति उपासना के क्षेत्र में सफल होता है। यदि सभी ग्रह चंद्र और गुरु के बीच हों तो व्यक्ति तंत्र की अपेक्षा मंत्रानुष्ठान में विशेष सफलता प्राप्त कर सकता है। यदि केंद्र और त्रिकोण में सभी ग्रह हों तो जातक प्रयत्न कर साधना क्षेत्र में सफलता प्राप्त कर सकता है।


श्री विद्या विशेषांक   मई 2008

श्री यंत्र की उत्पति एवं माहात्म्य, श्री यंत्र के लाभ, श्री यंत्र को सिद्ध करने की विधि, श्री यंत्र की उपासना तथा इसमें ली जाने वाली सावधानियां, पदार्थों एवं स्वरूप के आधार पर विभिन्न प्रकार के श्री यंत्र एवं उनका उपयोग पर यह विशेषांक आधारित है.

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