यंत्र एक लाभ अनेक

यंत्र एक लाभ अनेक  

यंत्र एक लाभ अनेक प्रमिला गुप्ता भिन्न देवी देवता ईश्वर के ही प्रतिरूप हैं। यही कारण है कि तीनों लोकों का ईश्वर एक ही है। किसी भी देवता की साधना की जाए कामना एक रहती है - ईश्वर का आशीर्वाद प्राप्त करना। प्रत्येक प्राणी की कोई न कोई इष्ट देवी या देवता होता है- किसी का शिव, किसी का विष्णु, किसी का भैरव, किसी का नृसिंह, किसी की लक्ष्मी, किसी की देवी आदि। सभी देवी देवताओं की अपनी-अपनी अलौकिक शक्तियां हैं। जब कोई साधक उचित मार्ग से और शुभ मुहूर्Ÿा में आध्यात्मिक लाभ की कामना रखते हुए इष्ट साधना करता है तो वह अलौकिक शक्तियों से परिपूर्ण हो जाता है। तंत्र, मंत्र और यंत्र अभीष्ट सिद्धियों की प्राप्ति में उत्प्रेरक का कार्य करते हैं। देवी भागवत् में अर्चा प्रतिमा के अभाव में यंत्र को ही इष्ट देव का स्वरूप बतलाया गया है। इसी प्रकार नारदीय पुराण में भी ऐसा ही उल्लेख है- जल, अग्नि, हृदय, चक्र और विष्णु के क्षेत्र में उत्पन्न वस्तुएं और यंत्र सब भगवान विष्णु की प्रतिमा के समान पूजनीय हैं। यंत्र और मंत्र की अलौकिक शक्तियां साधक की कामना की पूर्ति करने में समर्थ हैं। यंत्र और मंत्र ऐसी अक्षय निधियां हैं, जिनसे हम सब कुछ पा सकते हैं। जिन जातकों की कंुडली में चंद्र और मंगल की युति हो या दोनों समसप्तक हों, या परस्पर केंद्र में हों, उन्हें बीसा यंत्र में मूंगा और मोती संयुक्त रूप से जड़वा कर धारण करना चाहिए। बीसा यंत्र में कोई भी रत्न प्रतिकूल प्रभाव नहीं डालता। जिनके हाथ में पैसा नहीं टिकता हो और जिनके धन स्थान में राहु बैठा हो उन्हें रत्न जड़ित लक्ष्मी बीसा यंत्र धारण करना चाहिए। कंुडली में केमद्रुम योग, शटक योग, धनहीन योग, दरिद्र योग आदि दुर्बल योग पर रत्न जड़ित लक्ष्मी बीसा यंत्र धारण करना चाहिए, इसका प्रभाव अमृत तुल्य होता है। जिन लोगों की कंुडली में चद्र और गुरु की युति हो या चंद्र और गुरु एक दूसरे से समसप्तक हों, उन्हें रत्न जड़ित गजकेसरी बीसा यंत्र धारण करना चाहिए, यह असीम वैभव, श्री, सुख और समृद्धि देता है। ऐसे लोग, जिन्हें परिश्रम करने पर भी अभीष्ट फल की प्राप्ति नहीं होती, जिनकी पदोन्नति तरक्की नहीं होती और जिनके राजनीतिक या सामाजिक प्रभुत्व के विकास में बाधाएं आती हों, कार्य कुशलता, पराक्रम एवं महत्वाकाक्षाओं की पूर्ति में अड़चनें आती हों उन्हें मोती और पुखराज जड़ित गजकेसरी बीसा यंत्र धारण करना चाहिए, इससे अभीष्ट फल की प्राप्ति होती है। ऐसे दम्पति, जिनके गणदोष या नाड़ी दोष बनता हो, सांसारिक जीवन में माधुर्य की कमी हो, पति-पत्नी के बीच आपस में सामंजस्य न हो, उन्हें मोती और पुखराज युक्त बीसा यंत्र धारण करना चाहिए। कहा भी गया है कि- ‘‘जिसके पास हो बीसा, उसका क्या करे जगदीशा’’ बीसा यंत्र कई प्रकार के होते हैं। संसार में ऐसे अनेक लोग हैं जो व्यापार या नौकरी के लिए अथक प्रयास करते हैं किंतु सफलता नहीं मिलती। उनकी कुंडली उन्हें असीम संपत्ति का स्वामी बनाती है किंतु प्रत्यक्ष में वे दरिद्रता में ही जीवन यापन कर रहे होते हैं। ऐसे जातकों को सौभाग्यदायक बीसा यंत्र धारण करना चाहिए, संपत्ति सुख की प्राप्ति होगी। यह यंत्र भोजपत्र पर बनाकर दाहिने हाथ में धारण करना चाहिए। लक्ष्मी की कृपा प्राप्ति हेतु लक्ष्मी बीसा यंत्र के सम्मुख ¬ श्रीं ह्रीं क्लीं लक्ष्मी देव्यै नमः और ¬ श्रीं ह्रीं श्रौं कमले कमलालये प्रसीद-प्रसीद श्रीं ह्रीं श्रीं महालक्ष्म्यै नमः। का पाठ करना चाहिए। स्थायी नौकरी, आजीविका आदि की प्राप्ति के लिए बीसा यंत्र को भोजपत्र पर अष्टगंध की स्याही से मंगलवार या बृहस्पतिवार से लिखना प्रारंभ करें और प्रतिदिन 201 यंत्र लिखंे। इस तरह 5,000 यंत्र पूरे जाने पर उन्हें नदी में प्रवाहित कर दें। सर्वकार्य सिद्धि हेतु सोलह कोष्ठक वाला यंत्र का विधि विधान से निर्माण करें। ऐसे 3,500 यंत्र लिखने चाहिए। इससे साधक को मनोवांछित फलों की प्राप्ति होती है। स्वास्तिक बीसा यंत्र को भोजपत्र या सफेद कागज पर लाल रंग की स्याही से लिखकर पूजन स्थल पर रखें और विधि-विधान से ¬ ह्रीं श्रीं क्लीं क्लूं अर्द्ध नमः मंत्र का एक माला जप नित्य करें, सभी मनोकामनाएं पूरी होंगी। श्री महालक्ष्मी जी की कृपा हेतु श्री बीसा यंत्र को ताम्रपत्र में उत्र्कीण करवा कर अर्द्ध रात्रि के समय केसर युक्त चंदन से उस पर ¬ के ऊपर श्री लिखकर पीले फूलों से पूजन करें और श्रीसूक्त की निम्न ऋचा के अंत में श्री ताम आ वह जातवेदो लक्ष्मीमनपगमिनीम। यस्यां हिरण्यं प्रभूतं गावों दास्योऽश्वान् विंदेयं पुरुषानहम।। संपुट लगाकर सात माला जप करके श्री सूक्त का संपूर्ण पाठ करें।



श्री विद्या विशेषांक   मई 2008

श्री यंत्र की उत्पति एवं माहात्म्य, श्री यंत्र के लाभ, श्री यंत्र को सिद्ध करने की विधि, श्री यंत्र की उपासना तथा इसमें ली जाने वाली सावधानियां, पदार्थों एवं स्वरूप के आधार पर विभिन्न प्रकार के श्री यंत्र एवं उनका उपयोग पर यह विशेषांक आधारित है.

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