लग्न का महत्व

लग्न का महत्व  

लग्न का महत्व सीता राम सिंह डली के द्वादश भावों को क्रमशः लग्न (देह), धन, पराक्रम, सुख, पुत्र, शत्रु, स्त्री, मृत्यु, भाग्य, राज्य, लाभ एवं व्यय नाम दिया गया है। भावों की ये संज्ञाएं उनके मूल कारकत्व को दर्शाती हैं। इन भावों के कारकत्व का विस्तृत उल्लेख आचार्य कालिदास ने अपने ग्रंथ उŸारकालामृत में किया है। लग्न भाव में द्वादश भावों के सुखों का आश्रय है। अतः विद्वान दैवज्ञों को लग्न के आधार पर मनुष्यों के शुभाशुभ का निर्णय करना चाहिए। लग्न व लग्नेश के बलवान होने पर कुंडली के कई दोष निष्प्रभावी हो जाते हैं तथा जातक को आयु, स्वास्थ्य, सुख, धन आदि शुभ फलों की प्राप्ति होती है। लग्न, लग्नेश व लग्न कारक सूर्य के बलवान होने पर जातक का जीवन सब प्रकार से सुखी होता है। इसके विपरीत जिस प्रकार शुद्ध दूध को टूटे-फूटे व गंदे बर्तन में रख देने पर उसकी शुद्धता कम हो जाती है, उसी प्रकार लग्न व लग्नेश के निर्बल होने पर कुंडली में स्थित भाग्य तथा धन योग भी अपना पूर्ण फल नहीं देते। सभी सफल व्यक्तियों की जन्म कुंडली में लग्न व लग्नेश बलवान होते हैं। लग्न संबंधी शुभ योग- यदि लग्नेश लग्न में हो या उसे देखता हो, लग्नेश उच्चस्थ होकर शुभ स्थान में हो, लग्न व लग्नेश बुध, बृहस्पति व शुक्र से युत या दृष्ट हो, लग्नेश शुभ दृष्ट होकर केंद्र में स्थित हो या अपनी मित्र अथवा शुभ राशि में शुभ ग्रहों से दृष्ट हो तथा अशुभ ग्रहों का लग्न व लग्नेश पर प्रभाव नहीं हो तो व्यक्ति स्वस्थ, सुखी, धनी और यशस्वी होता है। इसका श्रेष्ठ उदाहरण भूतपूर्व प्रधानमंत्री स्वराजीव गांधी की कुंडली है। उनकी सिंह लग्न में सूर्य स्वक्षेत्री तथा अपनी मूलत्रिकोण राशि में होकर बुध, बृहस्पति और शुक्र से युत है। चंद्र के भी सिंह राशि में होने के फलस्वरूप चंद्र राशि भी शुभ प्रभाव में है। इस ग्रह स्थिति ने उन्हें सुंदर, स्वस्थ तथा आकर्षक व्यक्तित्व का स्वामी बनाया और लोकप्रियता, संपन्नता, शीर्षस्थ पद आदि दिए। लग्न संबंधी अशुभ योग लग्नेश कोई पाप ग्रह हो और लग्न के अतिरिक्त किसी अन्य क्रूर राशि में स्थित हो, लग्नेश पाप ग्रह से युत होकर त्रिक भाव (6/18/12) में कहीं हो, षष्ठेश, अष्टमेश तथा द्वादशेश लग्न में स्थित हों या लग्न में क्रूर ग्रह हो तथा लग्नेश भी बलहीन हो तो व्यक्ति को शारीरिक कष्ट, रोगादि होते हैं और वह मानसिक चिंताओं से घिरा रहता है। लग्न (देह), लग्नेश, चंद्र (मन) और सूर्य (लग्न का कारक) पर जितना पाप प्रभाव होता है, उसी अनुपात में व्यक्ति निर्धन, असहाय और पीड़ित होता है। लग्नेश का विशेष प्रभाव लग्न भाव केंद्र तथा त्रिकोण दोनों होने पर लग्नेश नैसर्गिक शुभ अथवा पापी ग्रह होने पर भी योगकारक की तरह शुभफलदायी होता है। फलदीपिका ग्रंथ के अनुसार बहुत बलवान लग्नेश यदि केंद्र में शुभ ग्रहों से दृष्ट युत हो और पापी ग्रहों से दृष्ट न हो, तो वह सभी अरिष्टों को दूर कर व्यक्ति को दीर्घायु और धन समृद्धि देता है। तथा गुणज्ञ बनाता है। लग्नेश जिस भाव के स्वामी के साथ तथा जिस भाव में स्थित होता है, उस भाव के शुभ प्रभाव की वृद्धि करता है। ‘फलदीपिका’ ग्रंथ के अनुसार लग्नेश जिस ग्रह के साथ हो, उस ग्रह के भावों के फल को बढ़ाता है। इसी तरह जिस भाव में लग्नेश हो उस भाव के फल को भी बढ़ाता है। यदि वह भाव व भावेश बली हों तो अधिक सुख मिलता है और निर्बल हांे तो भाव संबंधी कष्ट होता है। उदाहरणार्थ कर्क लग्न का स्वामी चंद्र योगकारक दशमेश मंगल के साथ दशम या किसी अन्य शुभ भाव (6,8,12 भाव के अतिरिक्त) में हो तो मंगल आधिपत्य भाव की वृद्धि होगी। मंगल के बलवान होने पर दशम भाव की विशेष वृद्धि होगी, परंतु उसके बलहीन होने पर उस भाव से संबंधित अशुभ फल मिलेगा। परंतु दुष्ट स्थानों (6,8,12 भाव) में लग्नेश व किसी भावेश का योग हानिप्रद होता है। यदि विचारणीय भावेश निर्बल होकर भाव 6,8 या 12 में स्थित हो तो हानि अधिक और बली हो तो कम होती है। यदि एक ही ग्रह लग्नेश तथा दुष्ट भावेश भी हो तो उसके दुष्ट भाव का फल निष्प्रभावी होता है। यदि लग्नेश दुःखस्थानाधिपति (6,8,12 भावपति) भी हो तो उसके लग्नेशत्व की प्रधानता रहेगी, तथा दूसरे भाव के आधिपत्य का फल प्रभावी नहीं होगा। उदाहरणार्थ मेष तथा वृश्चिक लग्नों में सिंह या मीन राशिस्थ पंचमस्थ मंगल लग्नेश होने के साथ-साथ अष्टमेश एवं षष्ठेश भी हो, तब भी शुभ फलदायी होगा। यदि यह मंगल शुभ दृष्ट या युत हो तो विवाहोपरांत शीघ्र नहीं भी हो फिर भी अपनी दशा मुक्ति में पुत्र लाभ अवश्य देगा। अतः लग्न तथा लग्नेश का बल भाव स्थिति कुंडली के विश्लेषण तथा भविष्य कथन में निर्णायक होते हंै। उदाहरण कुंडलियां- कुंडली 1 में लग्न वर्गोŸाम है। लग्न में वर्गोŸाम नवमेश सूर्य ने स्वामी विवेकानंद को तेजस्वी एवं प्रतापी बनाया। पंचम भाव में स्वक्षेत्री मंगल ने प्रबल तर्क शक्ति दी। द्वितीय भाव में दशमेश बुध और एकादशेश ने उन्हें सफल वक्ता बनाया। इन्हीं योगों के कारण उन्होंने देश विदेश में हिंदू धर्म और दर्शन का भरपूर प्रचार किया। कुंडली 2 में लग्न में लग्नेश शुक्र मालव्य नामक पंच महापुरुष योग का निर्माण कर रहा है। चंद्र भी लग्न में उच्चस्थ है। नवमेश व दशमेश योगकारक शनि भी लग्न में स्थित है तथा उसकी दशम भाव स्थित अपनी मूल त्रिकोण राशि पर दृष्टि है। मंगल केतु और पंचमेश बुध के साथ तृतीय भाव में है। राहु ने योगकारक शनि की राशि तथा नवम् भाव में स्थित होने से योगकारक शनि का फल अपनी दशा में दिया और वह भारतीय टीम के सफल कप्तान रहे। अष्टम भाव स्थित अष्टमेश बृहस्पति की दशा 2005 में आरंभ हुई। साढ़े साती के चलते उनसे टीम का नेतृत्व छीन लिया गया और वह टीम से भी बाहर हो गए। बृहस्पति-बृहस्पति शुक्र में उन्हें पुनः टीम में स्थान मिला।



श्री विद्या विशेषांक   मई 2008

श्री यंत्र की उत्पति एवं माहात्म्य, श्री यंत्र के लाभ, श्री यंत्र को सिद्ध करने की विधि, श्री यंत्र की उपासना तथा इसमें ली जाने वाली सावधानियां, पदार्थों एवं स्वरूप के आधार पर विभिन्न प्रकार के श्री यंत्र एवं उनका उपयोग पर यह विशेषांक आधारित है.

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