मां त्रिपुर सुंदरी का चमत्कारी शक्तिपीठ

मां त्रिपुर सुंदरी का चमत्कारी शक्तिपीठ  

माँ त्रिपुर संदरी का चमत्कारी शक्तिपीठ राजस्थान के बांसवाड़ा जिले में आता है, बांसवाड़ा जिला मुख्यालय भी है। यहां से पश्चिम दिशा में एक सड़क जाती है। 17-18 कि.मी. जाने पर यह सड़क पौराणिक काल के ‘वाग्वर’ प्रदेश में जाती है। यहां अनेक प्राचीन मंदिर हैं, लेकिन इन सभी से अलग चुंबकीय आकर्षण-सा, हर दर्शक को खींचने वाला चमत्कारी शक्तिपीठ है- माँ त्रिपुर सुंदरी देवी का। माँ त्रिपुर संदरी के चमत्कार दूर-दूर तक लोक में प्रसिद्ध हैं। जो भी भक्त सच्चे मन से उनकी अराधना करता है, माँ उसकी सर्वकामना अवश्य पूरी करती हैं। माँ त्रिपुर सुंदरी का यह मंदिर उमरई गांव के तलवाड़ा क्षेत्र में हरी-भरी उपत्यकाओं के मध्य स्थित है। माँ त्रिपुरा माता की जय- मूलतः उमरई (तलवाड़ा) पांचाल ब्राह्मणों का एक छोटा किंतु चर्चित गांव है, जिसमें महामाया त्रिपुर सुंदरी के मंदिर का भव्य एवं विशाल द्वार सभी भक्तों का स्वागत करता है। वनवासी परिवार उसमें प्रवेश करते ही जमीन पर बैठकर ‘नवाजुगषे नंदन माता। त्रैताषजुग ने तरताई माता’ गीत पूरे मनोयोग से गाने लगते हैं। यहां के पांचाल छड़ीदर तीर्थ यात्रियों के पुरोहित का कार्य पूरी आस्था के साथ करते हैं। देवी-मंदिर परिसर में विशाल स्तूपाकार मंडप और यज्ञवेदियां हैं। यज्ञवेदी के उस पार भैरव-मंदिर है और उसके आगे कालिका और सरस्वती देवी की मनोहारी प्रतिमाएं हैं। आगे के दालानों को पार करने के पश्चात् महामाया चमत्कारी माँ त्रिपुर सुंदरी के दरबार की सीढ़ियां हैं। दोनों पाषाणी खंभों पर देवी-देवताओं की मूर्तियां उत्कीर्ण हैं। ठीक सामने 18 भुजाओं वाली चमत्कारी शक्तिपीठ की मूल अधिष्ठात्री महामाया त्रिपुर सुंदरी की अति सुंदर प्रतिमा प्रतिष्ठित है। यह प्रतिमा शास्त्रोक्त विधि से दमकते और जीवित वशीकरण करते काले रंग की है। प्रतिमा का अवलोकन करते ही माँ त्रिपुर सुंदरी का सौंदर्य मन को अभिभूत कर देता है। प्रतिमा के नख-शिख शिल्पकला जगत की अनुपम थाती है। यही कारण है कि शंकराचार्य ने आनंद लहरी और सौंदर्य लहरी जैसे काव्य की रचना में माँ त्रिपुर सुंदरी के मुख-मंडल, अधर, नयन, वक्ष, नाभि, हस्त, पाद आदि अंगों का सौंदर्य-वर्णन अति सुंदर और जीवित रूप में किया है जो पूर्ण रूपेण लालित्यमय है। माँ त्रिपुर सुंदरी की स्थापना और शक्तिपीठों में इसका स्थान होने के पीछे एक लंबा पौराणिक साहित्य और प्राच्यविद्या के प्रमाण का इससे जुड़ा होना है। इस पीठ का संबंध शिव और सती से जुड़ा है। सती द्वारा अग्नि कुंड में दाह और शिव द्वारा उनका शव लेकर आकाश में विचरण एवं विष्णु के चक्र से सती के अंग-प्रत्यंग विभिन्न स्थानों पर गिरने से है। जहां-जहां सती के शव के अंग प्रत्यंग गिरे, वहीं शक्तिपीठों की स्थापना हुई। माँ त्रिपुर सर्वमंगला हैं। वे मंगलमयी एवं समस्त मंगलों की अधीश्वरी हैं और करुणा का अवतार हैं। भगवान शिव की आद्याशक्ति शिवा हैं और दुर्गतिनाशिनी मां दुर्गा। वे सर्वत्रमयी सŸाा हैं। जगदंबा माता त्रिपुर के दर्शन से भक्त चारों पुरुषार्थ को प्राप्त करता है जो सत्यानंद स्वरुपिणी है। धन-धान्य से उसका गृह परिपूर्ण रहता है और ‘विद्यावतं, यशवतं, लक्ष्मीवतं’ पुत्र की प्राप्ति होती है। जो मनुष्य जिस भाव और कामना से श्रद्धा सहित मां त्रिपुर सुंदरी के दर्शन और पूजन करता है, उसे उसकी भावना के अनुकूल सिद्धि अवश्य प्राप्त होती है। परमार शासकों के समय इस देवी की पूजा-अर्चना की विशेष व्यवस्था थी। यहां पर भगवान विष्णु की क्रिया-पद्धति के यज्ञ संपन्न होने के भी प्रमाण प्राप्त होते हैं। मंदिर के ‘कुंड-मंडप’ से प्राप्त 14वीं शती के शिलालेख से यह विदित होता है कि दूर-दूर के शासकों द्वारा त्रिपुर सुंदरी के चमत्कार से प्रभावित होकर उनकी उपासना की जाती थी। मालवा के यशस्वी सम्राट विक्रमादित्य और गुजरात के सम्राट सिद्धराज जयसिंह भी मां त्रिपुर सुंदरी की उपासना करने वाले शासकों में से थे। अन्य शिलालेखों के अनुसार त्रिपुर सुंदरी मंदिर का जीर्णोद्धार लगभग 1157 विक्रम संवत् में पांचाल जाति के पाताभाई-चांदाभाई लुहार ने करवाया था। उक्त मंदिर के निकट ‘फटी खान’ नामक एक स्थल है जहां पूर्व में एक लोहे की विशाल खदान थी और पांचाल जाति के व्यक्ति उसमें से लोहा निकालते थे। यह बात विक्रम संवत् 1102 की है। एक चमत्कारी घटना को लोग आज भी पीढ़ी-दर-पीढ़ी याद करते आ रहे हैं। ऐसी किंवदन्ती है कि एक दिन मां त्रिपुर सुंदरी भिखारिन का रूप धारण कर भिक्षा मांगने खदान के द्वार पर गयीं, लेकिन पांचालों ने उनकी ओर कोई ध्यान नहीं दिया, जिससे वे नाराज होकर चली गयीं और उनके जाने के कुछ ही समय बाद वह खदान बैठ गया और अनगिनत लोग उसमें दबकर अपनी जान दे बैठे। वह खदान आज भी है। अंततः मां त्रिपुर सुंदरी को प्रसन्न करने के लिए पाताभाई- चांदाभाई ने मंदिर का जीर्णोद्धार करवाया तथा उसमें तालाब का निर्माण करवाया। पुनः उक्त मंदिर का जीर्णोद्धार 16वीं शताब्दी में करवाया गया। गुजरात के अलावा मेवाड़, मालवा और मालवा जैसे- राज्यों के सिरमौर अधिपति भी इसी चमत्कारी मां त्रिपुर सुंदरी के परम भक्त थे। सोलंकी सम्राट सिद्धराज जयसिंह की तो मां त्रिपुर सुंदरी इष्टदेवी ही थीं। सिद्ध- राज अनेकों बार उपासना के लिए इस मंदिर में आया करते थे। माँ त्रिपुर सुंदरी का यह चमत्कारी शक्तिपीठ ‘वाग्वर’ अर्थात् राजस्थान के दक्षिण भाग में स्थित बांसवाड़ा जिले में है। सभी आदिवासी मां त्रिपुर सुंदरी के भक्त हैं और प्रत्येक रविवार को मंदिर में भारी संख्या में आते हैं। आस-पास रहने वाले हजारों आदिवासी अपने गीतों के माध्यम से मां त्रिपुर सुंदरी का स्तवन करते हैं- ‘नव जुग ने नंदन माता। नेत्रण जुग ने तरताई माता।।’ बांसवाड़ा, डूंगरपुर, उदयपुर, चिड़गढ़ आदिवासी पट्टी में भील राजाओं के राज में होने के कारण मां त्रिपुर सुंदरी भीलों, सहरियों आदि की लोक देवी रही हैं। महामांत्रिकों, तांत्रिकों तथा कापालिकों ने मां त्रिपुर सुंदरी के आसन के चार स्तंभों पर संकल्पना चित्र के रूप में ब्रह्मा, विष्णु, महेश एवं रुद्र बनाया है। स्तंभ पर शिव लेटे हैं। शिव की नाभि से प्रस्फुटित कमल पुष्प पर 18 भुजाओं वाली, पूरे सौंदर्य और यौवन में मां त्रिपुर सुंदरी मंत्रमुग्धा लालित्य लिए आसीन हैं। इस भव्य मंदिर में सिंहपीठ के ऊपर खिले कमल पुष्प पर देवी को आरुढ़ दिखाया गया है। वैसे तो यहां प्रतिदिन हजारों की संख्या में श्रद्धालु आते हैं, लेकिन नवरात्र के समय यह संख्या कई गुना बढ़ जाती है। तब यहां नियमित रूप से गरबे होते हैं। प्रतिवर्ष चैत्र की नवमी को मां त्रिपुर सुंदरी के मंदिर-परिसर में विशाल मेला लगता है जिसमें भारत के अनेक राज्यों के श्रद्धालु तथा स्थानीय आदिवासी भील-भीलनियां अपनी परंपरागत रंग-बिरंगी पोशाकों में गरबा नृत्य करते हैं। इस देवी मंदिर की व्यवस्था का भार पांचाल समाज के जिम्मे है। नवरात्र के समय दूर-दूर से शक्ति-उपासक एवं मांत्रिक आदि साधना के लिए मां के समक्ष यज्ञ करते हैं। मंदिर तक पहुंचने के अनेकों मार्ग हैं। उदयपुर के डबोक हवाई अड्डे से यह स्थल 200 कि.मी. है। अहमदाबाद, डूंगरपुर, इंदौर आदि स्थानों से यह बस सेवा द्वारा जुड़ा हुआ है। रतलाम रेलवे स्टेशन दिल्ली-मुंबई रेल लाईन पर स्थित है। मां त्रिपुर सुंदरी का मंदिर यहां से करीब 100 किलोमीटर है। यहां से बांसवाड़ा पहुंचने के लिए बस एवं टैक्सी उपलब्ध रहती है



वास्तु विशेषांक  दिसम्बर 2012

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