वास्तु के अनुसार शैक्षणिक संस्थान

वास्तु के अनुसार शैक्षणिक संस्थान  

शैक्षणिक संस्थान व्यक्ति के व्यक्तित्व निर्माण का एक ऐसा मंदिर है जहां से व्यक्ति ज्ञान एवं शिक्षा अर्जन करते हुए अपने चारित्रिक मूल्यों का विकास करता है। अतः इसका निर्माण उचित एवं तरीके से होना आवश्यक है। इसके निर्माण में वास्तु के सिद्धांतां को अपनाने से छात्र एवं शिक्षक सभी लाभान्वित होकर विद्यारूपी मंदिर का समुचित लाभ प्राप्त कर सकते हैं। प्र.-किस तरह का भूखंड शैक्षणिक संस्थान के लिये शुभ फलदायक होते हैं। उ.-शिक्षण संस्थान के लिए भूखंड का चयन प्रथम आवश्यकता है। भूखंड आयताकार अथवा वर्गाकार होनी चाहिए। भूखंड के सभी कोण 900 का होना चाहिए। ईशान्य वृद्वि भूखंड भी शिक्षण संस्थान के लिए लाभप्रद होता है। प्र.-भूखण्ड के किस तरफ शैक्षणिक संस्थान का होना ज्यादा लाभदायक होता है ? उ.-भवन का निर्माण एक खण्ड में होने पर पूर्व-पश्चिम या उत्तर-दक्षिण में करना चाहिए। यदि भवन का निर्माण दो या तीन खण्डों में करना हो तो पूर्व और उत्तर को खुला छोड़ते हुए भवन का निर्माण करना चाहिए। दक्षिण और पश्चिम को खुला नहीं रखना चाहिए। शिक्षण संस्थान में भूखंड के चारों ओर निर्माण कार्य किया जा सकता है। लेकिन ऐसी स्थिति में ब्रह्म स्थान खुला रखना चाहिए। ब्रह्म स्थान में कोई भी पार्टीशन, कील और भारी वस्तु न रखें। ब्रह्म स्थान को हमेशा खाली और साफ-सुथरा रखें। भूखंड के उत्तर-पूर्व में नदी, तालाब या झरना नैसर्गिक रूप से विद्यमान रहने पर इसकी ख्याति शीघ्रातिशीघ्र होती है। भूखंड के दक्षिण-पश्चिम में घनी आबादी, पेड़-पौधा या ऊँची-ऊँची इमारतों का होना तथा उत्तर-पूर्व में अधिक से अध्क खुला स्थान होना शैक्षणिक संस्थान के विकास में मददगार होता है। प्र.: शैक्षणिक संस्थान की आंतरिक व्यवस्था कैसी होनी चाहिए ? उ.: भवन में अध्ययन कक्ष पूर्व, उत्तर, उत्तर-पूर्व और पश्चिम में बनानी चाहिए। उत्तर दिशा पर मनस चेतना का कारक ग्रह बुध, ईशान्य क्षेत्र पर ज्ञान के ग्रह गुरू, पूर्व पर आत्म कारक सूर्य एवं पश्चिम दिशा पर मां सरस्वती का अधिकार होता है। अतः इन क्षेत्रों में अध्ययन कक्ष रखने से बच्चों के अध्ययन में काफी लाभ मिलता है। क्लास रूम में ब्लैकबोर्ड को उत्तर या पूर्व की दीवार पर रखें। बच्चों को पढ़ाई करते वक्त मुंह उत्तर या पूर्व की तरफ होना चाहिए। इससे बच्चे विलक्षण प्रतिभा के धनी एवं ज्ञानवान होते हैं। बच्चों के लिए क्लास रूम आयताकार एवं वर्गाकार बनानी चाहिए। उत्तर एवं पूर्व की तरफ अधिक से अधिक खिड़की एवं द्वार रखें। क्लास रूम में प्रवेश पूर्व या ईशान्य क्षेत्र से रखें। क्लास रूम में प्रकाश की समुचित व्यवस्था रखनी चाहिए। शिक्षण संस्थान में प्रधानाचार्य, कुलपति या मुख्य व्यक्ति का कार्यालय दक्षिण-पश्चिम के क्षेत्र में बनाना चाहिए। उपप्रधानाचार्य या उपकुलपति का कार्यालय दक्षिण क्षेत्र में बनाना श्रेष्ठ होता है। प्रशासनिक कार्यालय, जिस स्थान से पूरे शिक्षण संस्थान की प्रशासकीय गतिविधियां संचालित होती हैं, उसे पूर्व दिशा की ओर रखना चाहिए। लेखा विभाग उत्तर दिशा में होना चाहिए। वित्तीय कार्यों के लिए खासतौर पर उत्तर की दिशा लाभप्रद होती है। इससे शिक्षण संस्थान की संपन्नता बनी रहती है। मुख्य खजांची या अंकेक्षक को उत्तर दिशा की ओर मुंह करके बैठना चाहिए। यदि खजांची का मुंह पूर्व की तरफ हो तो कैश काउंटर उसके दाहिनी ओर रखनी चाहिए तथा खजांची का मुंह उत्तर की तरफ हो तो कैश काउंटर उसके बाईं तरफ रखनी चाहिए। परीक्षा विभाग पश्चिम में बनाना सर्वश्रेष्ठ होता है। शिक्षण संस्थान मं पुस्तकालय भूखंड के उत्तर या पूर्व क्षेत्र में बनाना लाभप्रद होता है। प्रयोगशाला भवन के पश्चिम में बनाना चाहिए। स्टाफ रूम की व्यवस्था वायव्य क्षेत्र में करना चाहिए। मनोरंजन कक्ष तथा कैंटीन की व्यवस्था आग्नेय क्षेत्र में करनी चाहिए। शिक्षण संस्थान में खेल का मैदान उत्तर या ईशान्य क्षेत्र में करना शुभ फलप्रद होता है। छात्रावास उत्तर और ईशान्य के क्षेत्र में बनानी चाहिए। आवश्यकता पड़ने पर छात्रावास पूर्व और दक्षिण दिशा में भी बनाया जा सकता है। वेधशाला उत्तर दिशा में बनाना चाहिए। सामूहिक प्रार्थना स्थल ब्रह्य स्थान में बनाना चाहिए। शिक्षण संस्थान के ईशान्य कोण को हमेशा स्वच्छ तथा साफ-सुथरा रखें। इस स्थान को गंदगी एवं कचड़े से मुक्त रखें। इस कोण में चूँकि परम पिता परमेश्वर एवं ग्रहों में गुरु जो आध्यात्मिक चेतना का कारक ग्रह है, का वास होता है। अतः कोण को जागृत रखने के लिए अपने ईष्ट देव की मूर्ति या तस्वीर लगायें और प्रतिदिन वहां धूप, दीप दिखायें। शिक्षण संस्थान के उत्तर-पूर्व में जलचर प्राणी संग्रह या छोटा सा पानी का फव्वारा लगायें। शिक्षण संस्थान के बाहर देखते समय मुख्य द्वार के बायीं ओर रखा पानी का फव्वारा शिक्षण संस्थान की लोकप्रियता को बढ़ाता है। साथ ही उल्लासपूर्ण वातावरण बनाने में मदद करता है।



वास्तु विशेषांक  दिसम्बर 2012

फ्यूचर समाचार पत्रिका के वास्तु विशेषांक में वास्तुशास्त्र के सिद्धांत - वर्तमान समय में उपयोगिता, ज्योतिष, वास्तु एवं अंकशास्त्र के संयुक्त क्रियान्वयन की रूपरेखा, वास्तुशास्त्र एवं फेंगशुई- समरूपता एवं विभिन्नता, वास्तु पुरूष का प्रार्दुभाव एवं पूजन विधि, वास्तु शास्त्र का वैज्ञानिक दृष्टिकोण, भूखंड चयन की गणीतीय विधि, गृह निर्माण एवं सुख समृद्धि का वास्तु, वास्तु एवं फेंगशुई, वास्तु दोष कारण व निवारण, वास्तु एवं बागवाणी, वृक्षों व पौधों से वास्तु लाभ कैसे लें, वास्तु मंत्र, वास्तु शास्त्र एवं धर्म, वास्तुशास्त्र में शकुन एवं अपशकुन, लाभदायक वास्तु सामग्री, क्रिस्टल की उपयोगिता, फलादेश में अंकशास्त्र की भूमिका, पाइथागोरियन अंक ज्योतिष, वास्तु के अनुसार शेक्षणिक संस्थान, हवन प्रदूषण में कमी लाता है, मां त्रिपुर सुंदरी का चमत्कारी शक्तिपीठ, वास्तु परामर्श, वास्तु प्रश्नोतरी, विवादित वास्तु, यंत्र समीक्षा/मंत्र ज्ञान, हेल्थ कैप्सुल, अंक ज्योतिष के रहस्य, आदि विषयों पर गहन चर्चा की गई है।

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