बवासीर आयुर्वेद में अर्श तथा आधुनिक चिकित्सा विज्ञान में ‘पाइल्स’ या हैमोराइड्स नाम से जानी जाती है। यह एक आम रोग है। इस रोग के लक्षण 75 प्रतिशत से भी अधिक लोगों में किसी न किसी रूप में पाये जाते हैं। इस रोग के प्रमुख लक्षण हैं: मल त्यागने के समय गुदा द्वार से रक्त आना, शौच क्रिया में पीड़ा होना, मस्से बनना, मस्सों में पीड़ा, जलन एवं खुजली होना इत्यादि। गुदा द्वार के अंदर और बाहर जो नस है, उसके फूलने और सूजने का नाम बवासीर है। गुदा द्वार के कुछ अंदर शंख की तरह आवर्त होते हैं, जिन्हंे बलि कहा जाता है। भीतर की तरफ डेढ़ अंगुल तक बलि को प्रवाहिनी एवं प्रथम बलि के नीचे रहने वाली दूसरी बलि को विसर्जन कहते हैं। उसके नीचे वाली संवरनी कहलाती है। ये तीनों बलियां शंख की बलियों के समान बल खाये हुए होती हैं। उन्हीं के संयुक्त स्वरूप को गुदा कहते हैं। अधिक समय तक कब्ज रहने के कारण मल के भार से जब तीनों बलियां रोगक्रांत होती हैं, तब उनमें विविध प्रकार की आकृति के मांस के अंकुर उत्पन्न हो जाते हैं, जिन्हें हम बवासीर के मस्से कहते हैं। रोग पुराना होने पर शिराओं में अधिक रक्त इकट्ठा हो जाता है तब मस्से फूलकर बाहर निकल आते हैं, रोगी को मल त्याग के समय काफी कष्ट होता है। कब्ज की स्थिति में शौच के समय आंतों पर जोर डालने से रक्तस्राव होने लगता है जिससे रोगी के शरीर में खून की कमी होकर उसे थकान, सुस्ती और कमजोरी घेर लेती है। बवासीर के कारण: पहले कभी यह रोग वृद्धावस्था के व्यक्तियों में पाया जाता था। लेकिन आजकल युवाओं में भी गलत आहार-विहार के कारण पाया जाने लगा है। इसके मुख्य कारण हैं- - लगातार बैठकर काम करना, जिससे गुदा स्थान की शिराओं में दबाव पड़ता है। - पुराना कब्ज - शौच रोकना। - अधिक समय तक घुड़सवारी, साइकिल चलाना, वाहन चलाना आदि। - पर्याप्त मात्रा में पानी न पीना, गर्म, गरिष्ठ, बासी भोजन करना, मांस, मदिरा आदि का अधिक सेवन करना, वात व्याधि बढ़ाने वाले पदार्थों से जैसे बैंगन, अचार, चटनी, मछली अण्डे, मिठाई आदि से यह रोग भयंकर रूप धारण कर लेता है। शाकाहारियों की अपेक्षा मांसाहारी व्यक्तियों में बवासीर की बीमारी अधिक पायी जाती है। बवासीर के प्रकार: बवासीर दो प्रकार की होती है- बादी और खूनी। बादी बवासीर में मस्से केवल फूलकर बड़े हो जाते हैं जबकि खूनी बवासीर में इन मस्सों से रक्त रिसने लगता है। कभी-कभी कब्ज के कारण भी आंतों के भीतरी सिरे से रक्त आने लगता है और शौच के समय मल के साथ काफी मात्रा मं रक्त निकल जाता है। बवासीर के लक्षण: बवासीर के लक्षणों को तीन अवस्थाओं में विभाजित किया जा सकता है। - प्रथम अवस्था में गुदा के भीतर तथा बाहर मस्से बन जाते हैं, जिसमें शौच के समय पीड़ा और जलन एवं रक्तसा्र व की शिकायत हाते ह। - दूसरी अवस्था में मस्सों का आकार और बड़ा हो जाता है तथा शौच के समय मल के साथ मस्से गुदा मार्ग से बाहर आ जाते हैं और शौच के बाद पुनः अपने स्थान पर बैठ जाते हैं। - तीसरी अवस्था में मस्से सूजकर इतने बड़े हो जाते हैं, कि गुदा मार्ग के अंदर नहीं समा पाते और गुदा द्वार के बाहर ही लटके रहते हैं तथा अत्यधिक रक्तस्राव, वेदना, जलन के साथ उठने-बैठने में भी तकलीफ होने लगती है। ऐसे समय रोगी की हालत नाजुक हो जाती है। आयुर्वेदिक उपचार: आयुर्वेद सबसे पहले खान-पान पर नियंत्रण रखने का निर्देश देता है। आहार सादा, सुपाच्य एवं संतुलित होना चाहिए। मूंग की दाल छिलके सहित, मोटे आटे की रोटी, हरी पदार साग सब्जियां, निशोध की पलाश बांस रोहिणी के इमली ,गाजर, धनिया आदि के मूली, बथुआ, पालक, चिजक के जिमीकंद, फलों का रस, नींबू, सलाद, दही की लस्सी आदि का उपयोग अधिक मात्रा में करें, जिससे कब्ज न होने पाए और पाचन क्रिया भी ठीक रहे, इन सबसे बवासीर की चिकित्सा में सहयोग मिलता है। यदि कब्ज की समस्या हो तो हरड़ का मुरब्बा, ईसबगोल का छिलका, एरंडी का तेल, बादाम का तेल, गुलकंद, रसांत, त्रिफला आदि का सेवन करते रहना चाहिए और पानी भी पर्याप्त मात्रा में पीते रहना चाहिए। हरी और ताजा सब्जियों, सलाद आदि की मात्रा बढ़ा देनी चाहिए। आयुर्वेदिक घरेलु नुस्खे: - नीम की गुठली का गूदा, काले तिल, नाग केसर, चीता झाऊवेर के साथ कूटकर अदरक के रस में मिलाकर, गोलियां बना लें। एक गोली रोज छाछ के साथ सेवन करने से बवासीर ठीक होता है। - नीम के तथा पीपल के को कूट-पीसकर लेप करने से बवासीर के मस्से नष्ट हो जाते हैं। - प्रातःकाल खाली पेट दो माह तक एक-एक प्याज खाने से बवासीर ठीक हो जाता है। - बबूल की बिना बीज की कच्ची फलियां को छाया में सूखाकर और कूटकर छान लें। सुबह-शाम पांच ग्राम चूर्ण खाकर ताजा पानी पिएं। इससे हर तरह का बवासीर नष्ट हो जाता है। - मूली के बीज, चाकसू, रसौंत, सफेद कत्था, कमल-केशर, नागकेशर, बराबर भाग में लेकर चूर्ण कर, दो माशे शहद के साथ लेने से बवासीर नष्ट हो जाते हैं। - जिमीकंद के टुकड़े करके छाया में सुखा लें। निंबोली का गूदा समान भाग में लेकर कूटकर-छान लें। दोनों के चूर्ण को बराबर मात्रा में मिलाकर गाय के दूध की छाछ या शीतल जल के साथ लें। - नींबू काटकर, उसमें खाने वाला कत्था मिलाकर ओस में रखें, फिर सुबह नींबू चूस लें। इससे पहली ही खुराक के बाद खून आना बंद हो जायेगा। - गूलर के दूध की बीस बूंदें आधे प्याले पानी में मिलाकर, दस दिन तक प्रातः पीने से बवासीर ठीक हो जाता है। - पांच तोला दूध में एक नींबू का रस मिलाकर एक सप्ताह तक पीने से बवासीर नष्ट हो जाता है। - इमली के छिलका रहित बीज तवे पर भून लें, फिर कूट पीसकर चूर्ण बनाकर, पांच ग्राम चूर्ण दही में मिलाकर रोज सुबह खाएं। यह बवासीर को नष्ट कर रोग से राहत देगा।



वास्तु विशेषांक  दिसम्बर 2012

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