आरोग्य व्रत

आरोग्य व्रत  

व्यूस : 4741 | जनवरी 2008
आरोग्य व्रत (10 जनवरी 2008) पं. ब्रज किशोर ब्रजवासी आरोग्य व्रत को पौष शुक्ल द्वितीया से प्रारंभ कर प्रत्येक माह के शुक्ल पक्ष की द्वितीया को करते हुए मार्गशीर्ष की शुक्ल पक्ष की द्वितीया को पूर्ण किया जाता है। पौष शुक्ल द्वितीया को गोशृंगोदक (गायों के सींगों को धोकर लिए हुए जल) से स्नान करके सफेद वस्त्र धारण कर सूर्यास्त के बाद बालेंदु (द्वितीया का चंद्रमा) का गंधादि से षोडशोपचार पूजन करें। जब तक चंद्रमा अस्त न हो तब तक गुड़, दही, परमान्न (खीर) और लवण से ब्राह्मणों को तृप्त करके वस्त्राभूषणादि व द्रव्य दक्षिणा देकर उनका आशीर्वाद प्राप्त कर केवल गोरस (छाछ) पीकर जमीन पर शयन करें। प्रातः कालीन नित्य नैमित्तिक कर्मों को नियमानुसार ही संपन्न करें और स्नानोपरांत आरोग्य व्रत की पूर्णता का संकल्प लेकर संपूर्ण दिन निराहार रहते हुए व्रत का पालन करें। इस प्रकार प्रत्येक मास की शुक्ल पक्ष द्वितीया को एक वर्ष तक चंद्र पूजन और भोजनादि करके बारहवें महीने मार्गशीर्ष की शुक्ल पक्ष द्वितीया को बालेंदु का यथापूर्वक पूजन करें और इक्षुरस (ईख के रस) का घड़ा, सोना, वस्त्र व अन्य उपयोगी सामग्री भोजनादि, पदार्थ तथा द्रव्य दक्षिणादि ब्राह्मणों को सम्मान पूर्वक देकर भोजन करें। इससे रोगों की निवृत्ति और आरोग्य की प्रवृत्ति होती है और सब प्रकार के सुख मिलते हैं। रोग ग्रस्त लोगों के लिए तो यह अति उत्तम व्रत है। स्वस्थ व सुखी जीवन के लिए यह व्रत सभी को करना चाहिए। चंद्र स्तुति, चंद्र कवच, चंद्र स्तोत्र का पाठ तथा चंद्र मंत्रों का जप भी अवश्य करें। चंद्र उत्पत्ति की कथा पढ़ें। चंद्र मंत्र स ¬ श्रां श्रीं श्रीं सः चंद्रमसे नमः। स ¬ सोमाय नमः। स क्षीरपुत्राय विद्महे अमृतत्वाय धीमहि। तन्न श्रन्द्रः प्रचोदयात्। स क्षीरपुत्राय विद्महे अमृतत्वाय धीमहि। तन्नश्चन्द्रः प्रचोदयात्। स अमृतांगाय विद्महे कलारूपाय धीमहि। तन्नः सोमः प्रचोदयात्। स अत्रिपुत्राय विद्महे सागरोद्भवाय धीमहि। तन्नश्चन्द्रः प्रचोदयात्। चंदंद्र उत्पत्ति कथा सहस्रशिरसः पुंसो नाभिहृदसरोरूहात्। जातस्यासीत सुतो धातुरात्रि पितृसमो गुणैः।। तस्यहृग्भ्योऽभवत् पुत्रः सोमोऽमृतमयः किल। विप्रौषध्युडुगणानां ब्रह्मणा कल्पितः पति 3 ।। श्रीमद्भागवत महापुराण 9/14/2-3 सहस्रों सिर वाले विराट् पुरुष नारायण के नाभि सरोवर के कमल से ब्रह्माजी की उत्पत्ति हुई। ब्रह्माजी के पुत्र हुए अत्रि। वे अपने गुणों के कारण ब्रह्मा जी के समान ही थे। उन्हीं अत्रि के नेत्रों से अमृतमय चंद्रमा का जन्म हुआ। ब्रह्माजी ने चंद्रमा को ब्राह्मण, औषधि और नक्षत्रों का अधिपति बना दिया। उन्होंने तीनों लोकों पर विजय प्राप्त की और राजसूय यज्ञ किया। इनका विवाह संस्कार दक्षप्रजापति एवं असिक्नी के संयोग से उत्पन्न साठ कन्याओं में से कृत्तिकादि सत्ताईस नक्षत्राभिमानिनी देवियों के साथ संपन्न हुआ। रोहिणी से विशेष प्रेम करने के कारण चंद्रमा को दक्ष ने शाप दे दिया, जिससे उन्हें क्षय रोग हो गया था। उन्हें कोई संतान नहीं हुई। चंद्रमा ने दक्ष को फिर से प्रसन्न करके कृष्ण पक्ष की क्षीण कलाओं के शुक्लपक्ष में पूर्ण होने का वर तो प्राप्त कर लिया, परंतु नक्षत्राभिमानियों देवियों से उन्हें कोई संतान न हुई। जो लोग श्रद्धा व विश्वासपूर्वक यह आरोग्य व्रत करते हैं उन्हें निश्चय ही स्वास्थ्य लाभ तो होता ही है, सुख, शांति व लक्ष्मी की प्राप्ति भी होती है।

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हस्तरेखा एवं मुखाकृति विशेषांक   जनवरी 2008

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