प्रश्न शास्त्र

प्रश्न शास्त्र  

प्रश्न शास्त्र विवाह में गोधूलि मुहूर्त का अपना महत्व है। धार्मिक मान्यताओं में यह पूजनीय है। ज्योतिष के अनुसार इसे शुक्र का प्रतीक भी माना गया है। जो दाम्पत्य सुख का कारक ग्रह है। संध्यासमय चारा चरकर लौटती गायों के खुरों से उड़ती धूल प्रदूषित वायु मंडल को स्वच्छ करती है इसे गोधूल कहते हैं। इस समय की सायंकाल वेला को गोधूलिकाल कहते हैं। एवं इसे गोरज भी कहते हैं। ज्योतिषशास्त्र में गोरज या गोधूलिक लग्न को परिभाषित करते हुए कहा है। ‘अर्धास्तात्यपरपूर्षतोऽर्धघरितं गोधूलिकम्’ सूर्यास्त के पूर्व 15 पल (6 मिनट) से सूर्यास्त होने के बाद 30 पल (12 मिनट) कुल 24 मिनट का गोधूलिक काल है। ‘मुहूर्तघंटिकादयम्’ दो घंटों अर्थात 48 मिनट का मुहूर्त होता है। गोधूलिक मुहूर्त भी 48 मिनट का ही होता है अर्थात 24 मिनट सूर्यास्त के पूर्व तथा 24 मिनट सूर्यास्त के बाद कुल 48 मिनट का गोधूलिक मुहूर्त माना जाता है। गोधूलिक समय के विषय में मत-मतांतर प्रचलित है। इसके अतिरिक्त कुछ वार विशेष में भी गोधूलिक समय के संबंध में विशेष नियम है। अस्तं याते गुरु दिवसे सौर सार्के, लग्नान्मृतौ रिपुयवने लग्ने चेन्दौ। कन्या नाशस्तनुमद मृत्युस्थे भौमे, के दुर्लाभे धन सहजे चन्द्रे सौख्यम।। गुरुवार में सूर्यास्त होने पर और शनिवार में सूर्य रहते गोधूलि शुभ है। लग्न से अष्टम, षष्ठम या लग्न में ही चंद्रमा हो तो कन्या का नाश होता है। लग्न अथक सप्तम या अष्टम में मंगल हो तो वर का नाश होता है। 2रे, 3रे अथवा 11वें चंद्रमा हो तो सुखदायक होता है। शुद्ध लग्न और गोधूलिक लग्न: गोधूलिक लग्न किस स्थिति में ग्रहण करनी चाहिए तथा किस स्थिति में अस्वीकार्य होता है इसका विवेचन करते हुए ज्योतिषशास्त्र में कहा गया है कि यदि दूसरा लग्न मिल रहा है तो गोधूलिक लग्न को छोड़कर अन्य लग्न में विवाह किया जाना उचित है। ‘लग्ने विशुद्धे सति वीर्यमुक्ते गोधूलिकं नैव फलं विधते’ - जब कोई भी लग्न शुद्ध लग्न नहीं मिल रहा हो तो उस स्थिति में ही गोधूलिक लग्न को स्वीकार्य माना है। ‘लग्न यदा नास्ति विशुद्धमन्यत् गोधूलिकं साधु तदा वदन्ति’ -मुहूर्तप्रकाश के अनुसार रात्रि में यदि शुद्ध लग्न नहीं हो तो ही गोधूलिक समय में विवाह किया जाए। रात्रौ लग्न यदा नास्ति तदा गोधूलिक शुभम् - मुहूर्तमार्तण्ड ने तो स्पष्ट शब्दों में कहा है कि लड़की यौवन अवस्था में हो और शुद्ध लग्न नहीं मिल रहा हो तो गोधूलिक लग्न ग्रहण है। इसी प्रकार की बात मुहूर्त प्रकाश में भी कही गई है। लग्न शुद्धिर्यदा नास्ति कन्या यौवन शालिनी। तदा नै सर्ववर्णानां लग्ने गोधूलिक शुभम्।। ज्योतिष निबंध के अनुसार यथा संभव शुद्ध लग्न पर विचार करके शुद्ध लग्न में ही विवाह करना उत्तम है। किंतु शुद्ध लग्न नहीं मिलने पर गोधूलिक लग्न विवाह संस्कार के लिए ग्रहण करें। उपर्युक्त विवरण से ऐसा लगता है कि गोधूलिक लग्न भी अबूझ साया (सार्वभौमिक विवाह लग्न) के समान है। जैसे अक्षय तृतीया, देवोत्थापिनी एकादशी, बसन्त पंचमी, फूलेरा दोज पर बिना त्रिबल शुद्धि (सूर्य बृहस्पति एवं चंद्र की राशि स्थिति) का विचार किए विवाह किया जाता है। उसी प्रकार गोधूलिक लग्न भी सामान्यतः स्वीकार किया जाता है। गोधूलि लग्न को दूसरेी तरह से इस रूप में भी परिभाषित किया जा सकता है कि सूर्य की राशि से सप्तम राशि को गोधूलि लग्न या गोधूलि बेला कहा जायेगा। ऐसी सप्तम लग्न से दूसरे, तीसरे अथवा ग्यारहवें स्थान पर चंद्रमा होने से गोधूलि लग्न कहेंगे। इसके पश्चात् गोधूलिमुख लग्न कही जावेगी। साथ ही यह बात भी ध्यान में रखना होगी कि गोधूलि अथवा गोधूलि मुख लग्न से छठें और आठवें स्थान पर चंद्रमा न हो तभी गोधूलि लग्न को विवाह संस्कार हेतु प्रशस्त माना जावेगा अन्यथा नहीं। गोधूलि लग्न से आठवें अथवा दसवें स्थान पर मंगल हो तो ऐसी स्थिति में गोधूलि भंग होने का दोष लगता है और विवाह करने पर वर को नुकसान पहुंचता है यानि वर की हानि होती है। लग्न से केंद्र में गुरु होने पर अशुभ ग्रह कुछ भी बिगाड़ नहीं सकते। परंतु गुरुवार को सूर्यास्त होने के बाद और शनिवार को सूर्यास्त के पहले कुलिक दोष होने से गोधूलि लग्न त्याजनीय मानी जाती है। ऐसा शास्त्रों का मत है। ऋतुओं के अनुसार गोधूलि लग्न का समय निम्नानुसार होता है ऐसा ज्योतिष के मनीषियों का मत हैः- हेमन्त ऋतु में जब सांझ के वक्त सूर्य लालिमा लिये हुए पश्चिम में डूबने वाला होता है तब गोधूलि लग्न मानी जाती है। ग्रीष्म ऋतु में जब सांझ के वक्त सूर्य का आधा बिम्ब अस्त हो जाता है तब गोधूलि लग्न होती है। वर्षा ऋतु के दिनों में जब सांझ के वक्त पूरे का पूरा अर्थात् संपूर्ण रूप में सूर्य बिम्ब अस्त हो जाता है तब गोधूलि बेला कही जाती है। जब विभिन्न कारणों से जैसे सिंहस्थ वृहस्पति, गुरु और शुक्र तारों के उदयास्त के फलस्वरूप मुहूत्र्त न निकल पाना, लग्न शुद्धि न बन पाना और कन्या का पूर्ण यौवन को प्राप्त हो जाना, वाली स्थिति में यदि सही वर्ण के लोग गोधूलि लग्न में वर-कन्या की शादी करते हैं तो कोई दोष नहीं रहता। सूर्य के उदित होने से पूर्व के 2 घंटे 24 मिनट अर्था 6 घटी पूर्व के समय को प्रभात काल कहते हैं। सूर्य के अस्त होने के बाद के 1 घंटे 12 मिनट तक का समय अर्थात् 3 घटी का ऐसा समय प्रदोष काल कहलाता है। सूर्य के अस्त होने के बाद का 1 घंटे 36 मिनट का समय अर्थात 4 घटी का समय भगवान शंकर के विचरण का काल अर्थात् रौद्रकाल कहलाता है जिसमें किसी भी शुभ कार्य को करना वर्जित रहता है। शुभ मानी जाने वाली गोधूलि बेला रौद्रकाल में निहित होती है। चंद्र बल से हीन गोधूलि बेला में विवाह करने वालों को प्रतिकूल फल की प्राप्ति होती है और वे संकटों से घिर जाते हैं। कहते है। कि रौद्रकाल में महर्षि कश्यप की पत्नी दिति ने गर्भाधान किया था जिसकी परिणति दैत्योत्पत्ति में हुई। अतएव गोधूलि बेला चंद्र बल प्राप्त होने पर ही शुभ मानी जाती है। यैत्र चैकादशश्चन्द्रो द्वितीयो वा तृतीयकः। गोधूलिकः सः विज्ञेय शेषाः धूलिमुखाः स्मृता।। यदि ग्यारहवें स्थान में चंद्रमा हो अथवा दूसरे तीसरे हो तो उत्तम गोधूलि है बाकी स्थान में चंद्रमा होने से धूलिमुख कहते हैं। यदा नास्तगतो भानुर्गोधूल्यां पूरितं नमः। सर्व मंगल कायेषु गोधुलिंच नुश्स्यते।। जब सूर्य अस्त न हुआ हो और गायों के खुरों की धूलि आकाश में छाई हो तब यह गोधूलि मुहूत्र्त सब कार्यों में मंगलकारी होता है। नास्यामृज्ञं न तिथिकरणं नैव लगनस्य चिन्ता। ना वा वारो न च लव विधिर्नो मुहूत्र्तस्य चर्चा।। नो वा योगो न मृतिभवनं नैव जामित्र दोषो। गोधूलिः सा मुनिथीरूदिता सर्वकार्येषु शस्ता।। ऋषि मुनियों के अनुसार नक्षत्र, तिथि, करण, लग्न, दिन, नवांश, मुहूर्त, योग, अष्टम स्थान, जामित्र दोष इन सबों का विचार गोधूलि लग्न में नहीं किया जाता है। गोधूलि सभी कार्य में प्रशस्त है। गोधूलि दोष कुलिक: क्रांतिसाम्यं च लग्ने षष्ठाष्ठमे शशी। तदा गोधूलिकास्त्याज्यः पंचदोषश्च दूषितः।। कुलिक योग और क्रांतिसाम्य और लग्न में 6 और 8 चंद्रमा हो तो गोधूलि लग्न में विवाह नहीं करना चाहिए, लग्न 5 के दोष से दूषित हो और यदि लग्न में 7वें, 8वें, मंगल हो तो गोधूलि भंग हो जाता है इसमें वर को हानि होती है। अंशस्य पतिरंशे च तन्मित्रं वा शुभोऽपि वा। पश्यतोवा शुभो ज्ञेयः सर्वे दोषाश्च निष्फलाः।। अंश का पति अर्थात नवांश का स्वामी अपने नवांश में हो अथवा स्वामी का मित्र और शुभ ग्रह हो अथवा इनकी दृष्टि लग्न पर हो तो और दोषों से निष्फल करता है। किं कुर्वान्ति ग्रहः सर्वे यस्य केन्द्र बृहस्पतिः। मत्तमातंगयूथानां शतं हन्ति च केसरी।। यदि केंद्र स्थान (1/4/7/10 इन स्थानों) में वृहस्पति अकेले हों और सब ग्रह अनिष्टकारक हो तो क्या कर सकते हैं जैसे अकेला सिंह सैकड़ों हाथियों के समूह को डरा देता है ऐसे ही वृहस्पति सब दोषों को हनन कर देते हैं। वैसे तो गोधूलिक शुद्ध लग्न नहीं मिलने की स्थिति में सर्वत्र स्वीकार्य है। किंतु कुछ स्थितियां ऐसी भी है जिनमें यह लग्न भी ग्राह्य नहीं है। पांच प्रकार के दोष ऐसे हैं जिनके रहते हुए गोधूलिक लग्न भी ज्योतिष शास्त्र की दृष्टि से विवाह संस्कार के लिए ग्रहण करने योग्य नहीं है। अष्टमे जीव भौमौ च बुधौवाभार्गवोष्टमें। लग्नों ठण्ठाष्टमें चन्द्रस्तवा गोधूलिनाशकः।। जो लग्न से आठवे गुरु मंगल, बुध और शुक्र हो तो यह गोधूलिनाशक दोष है। अतः इस मुहूर्त में सब कार्य वर्जित है। विवाह लग्न निर्धारण में दस दोषों पर विचार किया जाता है। इन दस दोषों में से जितने दोष होते हैं उनको दस में से कम करके शेष को विवाह लग्न की रेखा बताया जाता है। जैसे किसी विवाह लग्न विशेष में दो दोष है तो दस में से दो घटाने पर आठ शेष रहे अर्थात वह विवाह लग्न आठ रेखा वाला है। इन दस दोषों में एक क्रांति साम्य दोष होता है तथा एक कुलिक दोष विवाह लग्न में अथवा छठे भाव में अथवा अष्टम भाव में चंद्रमा हो तो गोधूलिक लग्न भी ग्रहण नहीं करना चाहिए। गोधूलि के प्रकार हेमंत ऋतु में संध्या समय सूर्य जब गोलाकार हो जाते हैं। गर्मी में जब आधे अस्त हो जाते हैं तथा वर्षा बहुत में संपूर्ण अस्त होने पर गोधूलि होती है। ये तीनों प्रकार के गोधूलि समय सब शुभ कार्य में देखे जाते हैं। लग्न के अनुसार फल धस्त्रे तुलाली बधिरौ मृगाश्वौ रात्रौ च सिंहाजवृषा दिवान्धाः । कन्या नृयुक्कर्कटका निशांन्धा दिने घटोऽन्त्यो निशि पऽगुसंज्ञः। तुला, वृश्चिक लग्न दिन में बहरे होते हैं। मकर और धनु रात्रि में बहरे होते हैं। मेष, वृष और सिंह लग्न दिन में अंधे और कन्या, मिथुन और कर्क रात्रि में अंधे होते हैं। रात्रि में मीन और दिन में कुंभ लग्न पंगु होते हैं। लग्न बधिर, अंध और पंगु का समय बधिरा धान्वि तुलालयोऽपराहणे मिथुनं कर्कटकोऽट्गना निशान्धाः।। दिवसान्धा हरिगोक्रियास्तु कुब्जा मृगकुम्भान्तिम यानि सन्ध्ययोर्हि।। धनु, तुला, वृश्चिक दोपहर के बाद बधिर होते हैं। मिथुन, कर्क, कन्या रात्रि में अंधे होते हैं। दिन में सिंह, वृष, मेष अंधे होते हैं। मकर, कुंभ, मीन दोनों संधाओं में पंगु होते हैं। लग्नों का फल दारिदयं बधिरतनौ दिवान्ध लग्ने, वैधव्यं शिशुभरण निशान्ध लग्ने। पंग्वड्गे निखिलधनानि नाशमीयः सर्वत्राधिप गुरु दृष्टि र्भिर्न दोषः ।। विवाह समय में बधिर लग्न हो तो दारिद्रय, दिवान्ध लग्न (दिन के अंधे लग्न) हो तो वैधव्य, निशान्ध (रात्रि के अंधे) लग्न हो तो संतान मरण, पंगु लग्न हो तो संपूर्ण धन का नाश होता है। परंतु ये लग्न अपने-अपने स्वामी और गुरु से दृष्ट हो तो उक्त दोष नहीं होता है। दिन तथा रात्रि में अंधे, बहरे तथा पंगु लग्न का इकजाई विवरण तथा फल इस प्रकार हैः लग्न से 11वें स्थान में सब ग्रह शुभ हो, सूर्य तृतीय, शनि अष्टम, चंद्रमा द्वितीय। तृतीय, मंगल-तृतीय, छठे, बुध व गुरु द्वितीय, चतुर्थ, पंचम, षष्ठम, नवम, दशम स्थानों में शुक्र 2/3/4/5/9/10/11 स्थानों में शुभ फलदायक है। और राहु 3/5/6/8/9/10/12 स्थानों में शुभ फलदायक होता है। शुक्रो दशसहस्त्राणि बुधो दशशतानि च। लणभेकं तु दोषाणां गुरु लग्ने व्यपोहन्ति।। लग्न में शुक्र हो तो दस हजार दोषों का, बुध हो तो हजार दोषों का और गुरु हो तो लाख दोषों का नाश करता है। विवाह में विहित नवांश धनु, तुला, मिथुन, कन्या, मीन इन राशियों के किसी भी राशि के नवांश में विवाह हो तो कन्या सती (पतिव्रता) होती है। लग्न के अंतिम नवांश में किसी का विवाह करना वर्जित है। किंतु नवांश यदि वर्गोत्तम हो तो श्रेष्ठ है। तुला, मकर में चंद्रमा के होने पर लग्न में, चर नवांश का योग नहीं किया जाता है। विवाह लग्न से 12वें शनि, 10वें मंगल, 3रे शुक्र और लग्न में चंद्रमा तथा पाप ग्रह हो तो विवाह शुभ नहीं होता। लग्नेश, शुक्र और चंद्रमा छठे भाव में अशुभ होता है। सप्तम में सभी ग्रह त्याज्य है। उपरोक्त विवेचन को मध्य नजर रखते हुए विवाह दिन में अथवा गोधूलि में करना असंभव होने के कारण रात्रि में ही करना उचित समझा गया। विवाह कार्य स्थायी। स्थिर लग्न में करना दाम्पत्य जीवन को चिरस्थायी बनाये रखने के लिए विहित समय होता है। निशाकाल में विवाह करना एक वैज्ञानिक दृष्टिकोण से भी उचित माना गया है। इसका कारण रात्रिकाल का शांत वातावरण, ग्रहों की शांति पूजा के लिए, अग्नि होत्र के के लिए शुभ समय होता है। वर-वधु को अग्नि फेरे के साथ रात्रि में अग्नि, एवं ध्रुव तारे को साक्षी मानकर सप्तपड़ी (शपथ) कार्य शुभ होता है। विवाहादि शुभ कार्यों में सर्वश्रेष्ठ है लग्न शुद्धि विचार एवं मुहूर्त में श्रद्धाभाव आवश्यक आज कल सर्वत्र देखने में आता है लोग विवाह मुहूर्त में विवाह नहीं करते। फलस्वरूप दुर्भाग्यवश कई बार जन्म पत्री मिलान के बाद विवाह संबंध असफल होते देखे गये हैं। यहां तक कि तलाक की नौबत भी आ जाती है। फैशन के इस युग में विवाह में दिखावा मेहनबाजी गाना नाचना में बहुत पैसा खर्च (बर्बाद) हो रहा है। विवाह में पंडित जी की भूमिका एक अपचैरिकता है। वहां मंत्रोचारण मुहूर्त का कोई महत्व नहीं केवल दो घंटों में विवाह हो जाता है। न पंडित जी का सम्मान न उचित दक्षिणा, विवाह में शुभ मुहूर्त तभी सार्थक और फलीभूत होते हैं। जबकि मुहूर्त ग्रहण करने वाले व्यक्ति को उनके प्रति पूरी श्रद्धा एवं विश्वास हो बिना श्रद्धा के बिना किया हुआ हवन कन्या दान और तप बेकार है। ऐसा कर्म न तो इस लोक में और परलोक में भी लाभप्रद एवं कल्याणकारी नहीं होता इसलिए शुभ लग्न को सभी मुहूर्तों को आत्मा कहा गया है। विवाहादि शुभ कार्यों में शुद्ध बलवान विवाह लग्न सभी शुभ कार्यों में लग्न शुद्धि का विशेष महत्व है। इनमें मास तिथि नक्षत्र का भी विशेष महत्व है। तिथि को शरीर चंद्रमा को मन योग नक्षत्रों को शरीर के अंग तथा लग्न को आत्मा माना गया है। विवाह के लिये इसी शुद्धकाल में विवाह लग्न देखा जाता है। इसके लिए विवाह कालिक कुंडली बनाई जाती है। और उसके भिन्न-भिन्न भावों में स्थित ग्रहों के आधार पर लग्नशुद्धि का विचार किया जाता है। त्रिबल शुद्धि होने के पश्चात जो शुभ लग्न बनता हो उसमें सूर्य, चंद्रमा बलवान (स्वराशि मित्र राशि उच्च राशि) में हो तो लता पात एकार्गल उपग्रह और या मित्र दोष समाप्त हो जाते हैं। ऐसा मुहूर्त शास्त्रियों का मत है। अष्टम लग्न दोष जन्म लग्न व जन्म राशि से अष्टम लग्न में विवाह अशुभ होता है। अगर दोनों का स्वामी एक ही ग्रह या दोनों में मित्रता हो तो शुभ होता है। अष्टम गृह दोष परिहार मीन, वृष, कर्क, वृश्चिक मकर कन्या इन छः राशियों का जन्म लग्न से या जन्म राशि से अष्टम लग्न दोषकारी नहीं होता क्योंकि लग्नेश एवं अष्टमेश का मित्रता होने से वैसा नहीं होता ऐसे लग्नों में विवाह होने से धनसुख संतान सुख एवं सौभाग्य प्राप्त होता है। जैसे सिंह से मीन अष्टम है। सूर्य और गुरु मित्र है। तुला से वृष अष्टम दोनों का स्वामी शुक्र है। धनु से कर्क अष्टम (गुरु और चंद्रमा मित्र) मेष से वृश्चिक अष्टम दोनों का स्वामी मंगल है। मिथुन से मकर अष्टम बुध और शनि मित्र है। कुंभ से अष्टम कन्या अष्टम शनि और बुध मित्र है। जन्म लग्न राशि से अष्टम भाव में जो नवांश हो उस नवांश का स्वामी या अष्टमेश यदि लग्न में स्थित हो तो विवाह लग्न में वह अष्टम राशि शुभ नहीं होती। लग्न या चंद्र लग्न से 12वें या द्वादश भाव का नवांश विवाह लग्न में हो तो पति-पत्नी में कलह रहती है। विवाह लग्न से द्वितीय भाव में कोई क्रूर वक्री ग्रह या द्वादश भाव में कोई क्रूर मार्गी ग्रह हो तो उसे क्रूर कर्तरी दोष कहा जाता है। इस दोष के होने के कारण विवाह लग्न दूषित हो जाता है। यह योग चंद्र कुंडली से भी देखना चाहिये। विवाह लग्न में चंद्र और सभी पाप ग्रह वर्जित हैं। दूसरे भाव में कोई भी ग्रह वर्जित नहीं है। तीसरे भाव में शुक्र सामान्य दोषकारक होता है। पर इस ग्रह को पूजा और दान से इसका दोष खत्म हो जाता है। चैथे भाव में राहु दोषकारक होता है। इस ग्रह का भी दोष भी दान एवं पूजा से शांत हो जाता है। छठे भाव में चंद्रमा शुक्र एवं लग्नेश वर्जित हैं। चंद्रमा शुक्र यदि नीच राशि या नवांश में नीव हो तो इसका यहां दोष नहीं माना जाता है। सप्तम भाव में गुरु और चंद्रमा को छोड़कर सभी ग्रह वर्जित हैं। फिर भी इन ग्रहों को शांत करने के लिए इन ग्रहों को दान और पूजा अनिवार्य है। अष्टम में लग्नेश चंद्र, मंगल और अन्य शुभ ग्रह वर्जित है। नवम एवं ग्यारहवें भाव में कोई भी ग्रह वर्जित नहीं है। दशम में मंगल और बारहवें में शनि ग्रह वर्जित है। गुरु केंद्र त्रिकोण में सूर्य ग्यारहवें लग्न एवं चंद्रमा वर्गोत्तम हो तो सब दोष नाश हो जाते हैं। और चंद्रमा 11 वे हो तो दुष्ट मुहूर्त अन्य दोष नाश हो जाता है। सर्व सामान्य दोषों का परिहार विवाह लग्न में त्रिकोण (5, 9) केंद्र (1, 4, 10) में यदि बलवान बुध हो तो 100 दोषों का नाश करता है। इन्ही स्थानों में बलवान शुक्र हो तो 200 दोषों को शांत कर सकता है। और गुरु हो तो एक लाख दोषों का दमन कर देता है। और इसी तरह 1, 4, 10 और ग्यारहवें में लग्नेश या लगन नवांशेश हो तो वह भी दोष समूह को शांत करता है। जैसे अग्नि रूई को जला देती है। ध्यान रहे विवाह लग्न में केंद्र हमेशा सप्तम हीन लिया जाता है। अतः गोधूलि लग्न में दो लग्न हों तो लग्न शुद्धि पर विशेष ध्यान देना चाहिए। लग्न फल दिन में अंध लग्न मेष, वृष, सिंह वैधव्य रात्रि में अंध लग्न कन्या, मिथुन, कर्क संतान भरण दिन में बहरे लग्न तुला, वृश्चिक दरिद्र, दुःख रात्रि में बहरे लग्न मकर, धनु दरिद्र दुःख दिन में पंगु लग्न मकर, कुंभ (दोनो संध्या मंे) धन का नाश रात्रि में पंगु लग्न मीन धन का नाश



शंख विशेषांक  आगस्त 2009

ज्योतिष में शंख का क्या महत्व है, विभिन्न शंखों की उपयोगिता, शंख कहां-कहां पाए जाते है, शंख कितने प्रकार के होते है तथा घर में या पूजास्थल पर कौन सा शंख रखा जाना चाहिए और क्यों? यह विशेषांक शंखों से आपका पूर्ण परिचय कराने में मदद करेगा.

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