सदाबहार भारतीय तीर्थ है चित्रकूट

सदाबहार भारतीय तीर्थ है चित्रकूट  

सदाबहार भारतीय तीर्थ है चित्रकूट भारत के तीर्थ स्थलों में कोई सदाद्गिाव भोले का धाम है तो कोई जगत् नियंता श्री विष्णु का प्रतिनिधित्व करता है। कोई श्री राम के चरण रज से परम पवित्र है तो कोई श्री कृष्ण की जीवन, कर्म व लीला भूमि है। कोई देवी मां के पूजनादि की आदि भूमि है तो कोई संत महात्माओं की कृपा दृष्टि से धर्म नगरी के रूप में स्थापित हुआ। इन्हीं में एक युगयुगीन तीर्थ है चित्रकूट, जिसे रामायण कालीन भारत के तीर्थों में उत्तमोत्तम स्थान प्राप्त है। वाल्मीकि रामायण, महाभारत, पुराण, स्मृति, उपनिषद् व साहित्यिक-पौराणिक साक्ष्यों में खासकर कालिदास कृत मेघदूतम् में चित्रकूट का विशद् विवरण प्राप्त होता है। त्रेतायुग का यह तीर्थ अपने गर्भ में संजोए स्वर्णिम प्राकृतिक दृश्यावलियों के कारण ही चित्रकूट के नाम से प्रसिद्ध है जो लगभग 12 वर्ष तक श्री राम, माता सीता व भ्राता लक्ष्मण की आश्रय स्थली बना रहा। यहीं मंदाकिनी, पयस्विनी और सावित्री के संगम पर श्री राम ने पितृ-तर्पण किया था। श्री राम व भ्राता भरत के मिलन का साक्षी यह स्थल श्री राम के वनवास के दिनों का साक्षात् गवाह है, जहां के असंखय प्राच्य स्मारकों के दर्शन से रामायण युग की परिस्थितियों का ज्ञान हो आता है। जनश्रुति है कि ब्रह्मा, विष्णु और महेश का इहलोकागमन चित्रकूट तीर्थ में ही हुआ था। यहां के सती अनुसूया के आश्रम को इस कथा के प्रमाण के रूप में प्रस्तुत किया जाता है। गुप्तकालीन भारत के तीर्थों में चित्रकूट की गणना भी की गई है। बाद में इस क्षेत्र का विकास राजा हर्षवर्द्धन के जमाने में हुआ। बुंदेल राजाओं के राज में भी चित्रकूट का विकास रथ चलता रहा। पन्ना राज्य के राजाओं ने भी यहां के विकासार्थ कुछ कार्य किए। मुगलकाल में खासकर स्वामी तुलसीदास के समय में यहां की प्रतिष्ठा-प्रभा पुनः मुखरित हो उठी। भारत के तीर्थों में चित्रकूट को इसलिए भी गौरव प्राप्त है कि इसी तीर्थ में भक्तराज हनुमान की सहायता से भक्त शिरोमणि तुलसीदास को प्रभु श्री राम के दर्शन हुए। इस संदर्भ में एक कथा है कि तुलसीदास नित्य जंगल में शौच से लौटते हुए लोटे के शेष जल को रास्ते के एक बबूल के पेड़ में ऐसे ही डाल आते। एक दिन उसी पेड़ पर एक बेताल जल की अभिलाषा से पड़ा था। इस तरह तुलसीदास के फेंके जल से उसे तृप्ति मिल गई। फिर उसने बाहर आकर तुलसीदास से कुछ वरदान मांगने को कहा। तुलसीदास तो ठहरे रामभक्त। उन्होंने तुरत मांग की कि हमें श्रीराम से मिला दो। तुलसीदास की इस वाणी को सुन बेताल पहले तो ठिठका, फिर कहा कि तुम मंदिर में एक वृद्ध (हनुमान) से मिलो। वह भगवान राम से मिलने में तुम्हारी सहायता करेंगे। तुलसीदास ने बेताल के निर्देश पर हनुमान के दर्शन तो कर लिए पर उनके बताए अनुसार घोड़े पर बैठे राम-लक्ष्मण को पहचान नहीं पाए। उनके अटल भक्ति भाव और अटल विश्वास को देखते हनुमान जी ने उन्हें श्री राम से मिलाने के लिए तोते का रूप धारण किया और उनके पास आकर बोले- चित्रकूट के घाट पर भई संतन की भीर। तुलसीदास चंदन घिसे, तिलक लेत रघुवीर॥ इस प्रकार, दर्शन के बाद तुलसीदास ने अति प्रसन्न हो मानस लिखने का कार्य आरंभ किया। इस कथानक का एक सुंदर दृश्य यहां मंदाकिनी तट पर देखा जा सकता है, जहां चंदन घिसते तुलसीदास को श्री राम के प्रत्यक्ष दर्शन हुए। जंगल-झाड़, नदी-नालों और कुंड-तालाबों से अटा पटा चित्रकूट एक पर्वतीय साधना तीर्थ है, जहां भ्रमण स्थलों की कोई कमी नहीं है। भारत वर्ष के मध्य भाग में सुशोभित यह स्थल युगों-युगों से साधु-संतों, ऋषि-मुनियों और साधक-तपस्वियों के यज्ञ, तप, साधना व विहार की स्थली के रूप में खयात रहा है। चित्रकूट के प्रसिद्ध दर्शनीय स्थलों में श्री कामतानाथ (कामदगिरि), रामघाट, जानकी कुंड, स्फटिक शिला, गुप्त गोदावरी, अनुसूया आश्रम, भरतकूप, राम शय्या, हनुमान धारा आदि प्रमुख हैं। कामतानाथ जी को चित्रकूट तीर्थ का प्रधान देवता माना गया है। वैसे तो मंदाकिनी नदी के तट पर चित्रकूट के दर्शन के लिए भक्तों का आना-जाना तो सदा लगा रहता है, पर अमावस्या के दिन यहां श्रद्धालुओं के आगमन से विशाल मेला लग जाता है। मनोकामना पूरण मंदिर कामदगिरि चित्रकूट का मुखय आकर्षण है। मंदाकिनी नदी के किनारे यह मंदिर विंध्य की सुरम्य पहाड़ियों के बीच स्थित है। मंदिर के मुखय द्वार पर धन की देवी लक्ष्मी के दोनों ओर सिंहों तथा हाथियों की मूर्तियां स्थापित हैं। मंदिर में विग्रहों की पूजा फूलों, अगर, नारियलों तथा लाल वस्त्रों से की जाती है, जो मंदिर के परिसर में ही उपलब्ध हो जाते हैं। श्री कामदगिरि की परिक्रमा की महिमा अपार है। श्रद्धालुजन कामदगिरि को साक्षात् भगवद् विग्रह मानकर उनका दर्शन-पूजन और परिक्रमा अवश्य करते हैं। चित्रकूट के केंद्र स्थल का नाम रामघाट है जो मंदाकिनी के किनारे शोभायमान है। इस घाट के ऊपर अनेक नए-पुराने मठ-मंदिर, अखाड़े व धर्मशालाएं हैं। इसके दक्षिण में राघव प्रयाग घाट है। यहां पयस्विनी, मंदाकिनी और गायत्री (अथवा अंतःसलिला सरस्वती) नदियां आकर मिलती हैं। मंदाकिनी के तट पर अवस्थित है जानकी कुंड, जहां का प्राचीन मंदिर दर्शनीय है। नदी के किनारे श्वेत पत्थरों पर यहां चरण चिह्न है। लोक मान्यता है कि इसी स्थान पर माता सीता स्नान करती थीं। जानकी कुंड से कुछ दूर स्फटिक शिला है, जहां स्फटिकयुक्त एक विशाल शिला है। मान्यता है कि अत्रि आश्रम आते जाते समय सीता और राम इस शिला पर विश्राम किया करते थे। यह वही स्थल है जहां श्री राम की शक्ति की परीक्षा लेने के लिए इन्द्र पुत्र जयंत ने सीता जी को चोंच मारी थी। यहां श्री राम के चरण चिह्न दर्शनीय हैं। इस स्थान का प्राकृतिक दृश्य बड़ा चित्रकटू का रामघाट मनारे म है। चित्रकूट से 12 कि.मी. दूर दक्षिण-पश्चिम में एक पहाड़ी की तराई में गुप्त गोदावरी है। वस्तुतः यह दो चट्टानों के बीच सदा प्रवहमान एक जलधारा है। इससे जुड़ी कई दंतकथाएं हैं। मान्यता है कि यह नासिक से अतःसलिला होकर यहां गुप्त रूप से प्रकट हुई है। रामघाट से 12 कि.मीदक्ष्ि ाण अजि मुनि का आश्रम है जिसे आजकल परमहंस जी के आश्रम के नाम से जाना जाता है। ये परमहंस ही परमानंद जी महाराज थे जिन्होंने इस स्थल का उद्धार किया। यहीं पर बना सती अनुसूया मंदिर भक्तों के नस-नस में भक्ति का संचार करता है। रामघाट से लगभग 20 कि.मी. की दूरी पर भरत कूप है। मान्यता है कि श्री राम को वापस अयोध्या लौटाने आए भरत ने राज्याभिषेक हेतु लाए गए समस्त तीर्थों के जल को इसी कूप में डाल दिया। इसकी महिमा अपार है। यहां हरेक मकर संक्रांति को विशाल मेला लगता है। हनुमान धारा चित्रकूट का एक और पवित्र स्थल है जहां के बारे में मान्यता है कि लंका दहन के उपरांत भक्तराज हनुमान ने अपने शरीर के ताप को इसी धारा की जलराशि से बुझाया था। यह धारा रामघाट से लगभग 4 कि. मी. दूर है। इसका जल शीतल और स्वच्छ है। हाल के दिनों में चित्रकूट के तीर्थों में एक नया नाम आरोग्य धाम का जुड़ा है, जो प्राकृतिक विधि से मानव चिकित्सा के भारत स्तर के एक खयातनाम केंद्र के रूप में स्थापित हो चुका है। इसके अलावा वन देवी स्थान, राम दरबार, चरण पादुका मंदिर, यज्ञवेदी मंदिर, तुलसी स्थान, सीता रसोई, मत्तगयेन्द्रनाथ जी श्री, कैकेयी मंदिर, रामदर्शन मंदिर आदि यहां की भूमि को सुशोभित कर रहे हैं। चित्रकूट में छोटे वाहन द्वारा रामघाट से ही इन स्थलों की यात्रा की जा सकती है, पर इसके लिए पहले से ही भाड़े आदि तय कर लेना अच्छा होता है। इलाहबाद से लगभग 131 कि.मी. दूरी पर अवस्थित चित्रकूट का रेल मार्ग से सीधा संपर्क नहीं है। यहां जाने के लिए इलाहबाद-जबलपुर रेल खंड पर अवस्थित कर्वी नामक स्थल पर उतरना श्रेयष्कर है। यहां से लगभग 8 कि.मीकी दूरी पर चित्रकूट धाम के मुखय बाजार सीतापुर से लगभग किलोमीटर के फासले पर मंदाकिनी है जिसके दोनों किनारों पर चित्रकूट अवस्थित है। कर्वी से बस, मोटर, ऑटो या रिक्शे से चित्रकूट जाया जा सकता है। वैसे यहां सतना से भी बस द्वारा भक्तगण आते हैं। यहां से चित्रकूट की दूरी लगभग 80 कि.मी. है। चित्रकूट के आस-पास के दर्शनीय स्थलों में मैहर, वाल्मीकि आश्रम, रामवन, र ा ज ा प ु र , वीरसिंगपुर, विराध कुंड, सुतीक्ष्ण आश्रम आदि प्रमुख हैं, जहां तीर्थयात्री अपने समय व सुविधा के अनुसार जाते हैं। चित्रकूट श्रीराम और रामायणकालीन कथानक का साक्ष्य है। प्रसिद्ध समाजवादी नेता डॉ. राम मनोहर लोहिया ने भी कहा था कि जब कभी चित्रकूट आता हूं ,उस धरती, उस मिट्टी को नमन करता हूं जिसने राम के संकल्प को बल दिया था। चित्रकूट में मंदाकिनी के किनारे नौका पर सवार होकर इस सच को महसूस किया जा सकता है। मध्य प्रदेश और उत्तर प्रदेश दोनों राज्यों में अवस्थित चित्रकूट में हाल के वर्षों से चित्रकूट महोत्सव का आयोजन किया जाना बड़ी ही सुखद बात है। प्रभु श्री राम से जुड़े पर्व-त्योहारों के अवसर पर चित्रकूट में मेला लगता है। हर रामनवमी और दीपावली के दिन यहां का नजारा देखने लायक होता है। यहां सभी स्तर के लोगों के लिए खाने और ठहरने की सुविधा है। सचमुच चित्रकूट पावन है, मन भावन है, रमणीक है। तभी तो यहां की यात्रा की स्मृति आजीवन बनी रहती है। चित्रकूटे शुभे क्षेत्रे श्रीरामपद्भूषिते।



बगलमुखी विशेषांक  मार्च 2009

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