आरोग्यदायिनी विपतिनाशिनी शंख ध्वनि

आरोग्यदायिनी विपतिनाशिनी शंख ध्वनि  

व्यूस : 5135 | आगस्त 2009
आरोग्यदायिनी विपत्तिनाशिनी शंख ध्वनि गोपाल कृष्णकृ शंख नाद का अपना एक विशेष महत्व है। इसके गुणों पर आधुनिक वैज्ञानिकों को भी संदेह नहीं है। इस शंख ध्वनि को सुनकर विश्वविख्यात भारतीय वैज्ञानिक डाॅ. जगदीश चंद्र बोस अचानक अचंभित रह गए थे। हर दिन सुनाई वाले शंखनाद में उन्हें ऐसा कुछ दिखाई देने लगा, जो कत्तों के करुण चीत्कार तथा रुदन का कारण बनता है, मानो उन पर किसी भारी चीज आघात किया गया हो। यह तथ्य मंदिरों में भगवान की आरती के बाद बजाए जाने वाले शंख की आवाज से उनके सामने स्पष्ट हो कर उभरा। शंख को लेकर शोध करते करते डाॅ. बोस इस नतीजे पर पहुंचे कि शंख फूंके जाने पर, उसके विशिष्ट आकार के कारण, उससे एक सर्पिल ध्वनि निकलती है, जिसमें कीटाणुनाशक क्षमता होती है। वैज्ञानिक बोस ने अपने शोधकार्य द्वारा जो कुछ प्रमाणित किया वह प्राचीन काल के ऋषि-मुनियों और विद्वानों को पहले से ही मालूम था। पुराणों में उद्ध् ाृत है कि शंख बजाकर प्राकृतिक प्रकोपों तथा दुरात्माओं से बचाव हो सकता है। शायद यही कारण है कि वैदिक काल से ही हर धार्मिक अनुष्ठान के प्रारंभ में शंख बजाने का प्रचलन है। महाभारत से पता चलता है कि कुरुक्षेत्र युद्ध की शुरुआत भी शंख नाद से हुई थी और प्रत्येक सैनिक के पास उसका निजी शंख था। कृष्ण जी के शंख का नाम पांचजन्य तथा अर्जुन के शंख का नाम देवदत्त था। योगियों एवं साधकों का मानना है कि शंख बजाने से न केवल फेफडे़ पुष्ट होते हैं, बल्कि आंतें भी सुव्यवस्थित रहती हैं। शंख बजाने वाले तथा उसकी आवाज सुनने वाले, दोनों के लिए लाभदायक है। इसकी आवाज से मस्तिष्क का स्नायुतंत्र सक्रिय रहता है, जिससे स्मरण शक्ति बढ़ती है और सिर दर्द से आराम मिलता है। कहा जाता है कि शंखनाद से शिला वृष्टि भी रोकी जा सकती है। शंख नाद के इस चमत्कारी प्रभाव के बारे में तर्क दिया जाता है कि ऐसा करने के लिए कुछ मंत्रोच्चारण की आवश्यकता होती है और दो महीने तक विशेष धार्मिक अनुष्ठान के बाद ही इस प्रकार के परिणाम सभ्ं ाव हाते े हं।ै कहा यह भी जाता है कि एक महान साधक शंख ध्वनि से वर्षा भी रोक देते थे। लेकिन उन्होंने, मानव हित हेतु , कभी किसी के सामने ऐसा करने के लिए आवश्यक मंत्र का भेद नहीं खोला; शायद इसलिए कि वह इसके दुरुपयोग किए जाने के दुष्परिणामों से अवगत थे। शंखनाद क्यों ? समुद्र मंथन के समय प्राप्त चैदह रत्नों में से एक शंख की उत्पत्ति छठे स्थान पर हुई। शंख में भी वही अद्भुत गुण मौजूद है, जो अन्य तेरह रत्नों में हैं। इसके नाद से अ, ओम अर्थात ¬ शब्द निकलता है। शंख बजाते समय इस ¬ का नाद जहां तक जाता है, वहां तक की नकारात्मक ऊर्जा नष्ट हो जाती है। वैज्ञानिक भी इस बात पर एक राय रखते हैं कि शंख नाद से वायुमंडल के वे अति सूक्ष्म विषाणु नष्ट हो जाते हैं, जो मानव जीवन के लिए घातक होते हैं। वैदिक मान्यता में शंख को विजय घोष का प्रतीक माना जाता है। शुभ कार्य करते समय शंख नाद से शुभता का अत्यधिक संचार होता है। शंख का नाद सुनते ही ईश्वर का स्मरण हो आता है। इसके वादन से आसुरी शक्तियां घर में प्रवेश नहीं कर सकतीं। यही नहीं, घर में शंख रखने और बजाने से वास्तु दोष से भी रक्षा होती है। स्वास्थ्य की दृष्टि से शंख बजाना विशेष लाभदायक है। इससे योग की तीन महत्वपूर्ण क्रियाएं एक साथ हो जाती हैं - पूरक, कुंभक और प्राणायाम। साथ ही हृदयाघात, रक्तचाप की अनियमितता, श्वास रोग, मंदाग्नि आदि से भी बचाव होता है।

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शंख विशेषांक  आगस्त 2009

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