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देवी मंदिर क्यों जाएं

देवी मंदिर क्यों जाएं  

देवी मंदिर क्यों जाएं रतीय संस्कृति में जितने सदाचार वर्णित हैं, धार्मिक होने से उनका परलोक से संबंध तो है ही, लौकिक लाभों से भी अधिकाधिक संबंध होता है। इनमें देवमंदिर में जाना भी प्राचीन अर्वाचीन विद्वानों का बताया गया एक सदाचार है। जहां इसमें देवपूजा लक्ष्य होती है वहीं इससे शारीरिक तथा मानसिक लाभ भी प्राप्त होते हैं। देवालय जाने के लिए हम सूर्योदय से पूर्व ही जागते हैं और सूर्योदय से पूर्व ही स्नानादि कृ त्य भी करते हैं। इससे रूप, तेज, बल, आरोग्य, मेधा, आयु आदि की वृद्धि होती है। कहा गया है ‘‘रवि के उदय और अस्त में नित खाट पर सोता रहे। भलि चक्र होवे हाथ में पर वह सदा निर्धन रहे।।’’ कहने का भाव यह है कि सूर्य के उदय और अस्त के समय जो मानव शय्या पर शयन करता रहता है, उसके जीवन में धन, बंधु-बांधव, विद्या, आयुष्य आदि की कमी रहती है, उसे समाज में मान-प्रतिष्ठा नहीं मिलती और लोगों का उसके प्रति व्यवहार अच्छा नहीं रहता। इसके विपरीत जो सूर्याेदय और सूर्यास्त के समय शयन नहीं करता, उसके जीवन में उक्त सभी सुख विद्यमान रहते हैं। देवमंदिर पूर्व में प्रायः गांव व शहर से बाहर होते थे। आज भी बहुत से देव स्थान शहरों और गांवों से बाहर हैं। देवस्थान की अपनी एक बगीची होती हंै। देवपूजा के लिए वहां पर हम पुष्प चयन करते हैं। वहां हमें शुद्ध वायु प्राप्त होती है, जिससे शारीरिक तथा मानसिक स्वास्थ्य में वृद्धि होती है और शक्ति का लाभ मिलता है। चंदन लगाने से मस्तिष्क तथा नेत्रों की शक्ति में वृद्धि होती है। चंदन के विषय में कहा भी गया है चन्दनस्य महत्पुण्यं पवित्रं पापनाशनम्। आपदं हरते नित्यं लक्ष्मीः तिष्ठति सर्वदा।। धूप, दीपादि सुगंधित पदार्थों के कारण मंदिर के अंदर व चहुं ओर दिव्यातिदिव्य शक्तियों का संचार होता रहता है, जिससे भूत-प्रेत बाधा का शमन तथा विषयुक्त कीटाणु शक्ति का नाश होता है। स्वास्थ्य उŸाम होता है और शुद्ध वायुमंडल के प्रभाव से हीन भावना एवं कुविचार अंतःकरण में प्रवेश नहीं कर पाते। मंदिर में होने वाले शंखनाद से फेफड़े शुद्ध होते हैं तथा छाती की विशालता बनती है। शरीर के अंदर व्याप्त दूषित कीटाणुओं का नाश होता है। मंदिर में प्राप्त होने वाले प्रसाद, पंचामृत, तुलसी पत्र, चरणामृतादि सभी पदार्थ स्वास्थ्य के लिए लाभकारी होते हैं। चरणामृत के बारे में कहा भी है: अकालमृत्यु हरणं सर्वव्याधि विनाशनम्। विष्णु पादोदकं पीत्वा पुनर्जन्म न विद्यते।। यह चरणामृत अकालमृत्यु को दूर करता है। इसके कारण कभी भी आत्महत्या का विचार मन में पैदा नहीं होता। यह संपूर्ण व्याधियों का विनाशक है। दैहिक, दैविक और भौतिक ताप नष्ट करने की शक्ति प्रदान करता है। भगवान विष्णु का निराकार विग्रह शालिग्राम शिला के स्नान किए हुए जल का पान करने से तो पुनर्जन्म ही नहीं होता। भक्त ‘पुनरपि जन्मम् पुनरपि मरणम्’ रूपी दोष से मुक्त हो जाता है। इस प्रकार देव मंदिर में जाना ‘जीवेम् शरदः शवम्’ इस वैदिक शक्ति का अनुमोदन भी है। मानव शरीर पंचतत्व (पृथ्वी, जल, अग्नि, आकाश, वायु) निर्मित है। कहा भी गया है क्षिति जल पावक गगन समीरा। पंच रचित यह अधम शरीरा।। ऊपर वर्णित तत्वों में संतुलन बनाए रखने के लिए भी देव मंदिर जाना उचित है। भिन्न-भिन्न शरीरों में भिन्न-भिन तत्वों की प्रधानता रहा करती है, इसीलिए विशेष रूप से हिन्दू संस्कृ ति में पांच देवों को अपनी-अपनी रुचि के अनुसार पूजा जाता है। ये देव भी एक-एक तत्व प्रधानता से धारण करते हैं। इन पंचदेवों को पंचायतन के नाम से भी जाना जाता है।


बगलामुखी विशेषांक   मार्च 2008

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