सम्मोहन उपचार

सम्मोहन उपचार  

व्यूस : 10097 | सितम्बर 2013
त्राटक में पाठकों की रूचि देखते हुये इस अंक में त्राटक की कुछ प्रमुख व बहुचर्चित विधियों के बारे में कुछ विस्तार से जानकारी दी जा रही है। त्राटक से संभावित लाभ व हानियां तथा सावधानियांे के बारे में भी कुछ चर्चा की गई है ताकि इस विषय पर व्यापक भ्रामक ज्ञान या अज्ञान को ठीक किया जा सके। यह जानकारी मात्र समझने हेतु है; प्रारंभ करने से पूर्व किसी जानकार से मदद अवश्य लें। त्राटक पूर्व तैयारी त्राटक एक ध्यान लगाने की क्रिया है। अतः त्राटक शुरू करने से पूर्व वो सभी कार्य या बातें जो ध्यान लगाने में बाधक हो सकती हैं उनसे छुटकारा पा लीजिए जैसे भूख, प्यास इत्यादि। अत्यंत जरूरी कार्य अवश्य पहले पूरा कर लें ताकि बीच-बीच में उधर ध्यान न भागे। अति आवश्यक कार्य व्यक्ति दर व्यक्ति भिन्न-भिन्न हो सकते हैं अतः कार्यों की सूची बनाना संभव नहीं है। अगर शरीर में पसीने से या गर्मी से बेचैनी हो रही हो तो स्नान कर लेना ठीक रहेगा या हाथ, पांव, मुंह ठीक से धोकर शांत हो जाना चाहिये। हर बार त्राटक से पूर्व स्नान करना आवश्यक नहीं है। यह तो मात्र सफाई और स्वयं को अच्छा महसूस होने के लिये मददगार होता है। त्राटक करने का समय त्राटक स्वयं ध्यान में जाने का रास्ता है अतः समय की बंदिश बहुत महत्वपूर्ण नहीं है। हां कुछ कार्यकाल ध्यान के लिये सहायक होते हैं जैसे रात को सोने से पूर्व या सुबह उठने के बाद। ये दोनों काल अवचेतन मन की अवस्था से जुडे़ होते हैं तथा त्राटक जैसी क्रियाओं का प्रभाव बहुत शीघ्र होता है। कुछ लोगों का मानना है कि आधी रात के बाद का समय उत्तम है, कोई कहता है सुबह ब्रह्ममुहूर्त का कार्यकाल उत्तम है। लेकिन इस विषय पर बंदिश नहीं होनी चाहिए। आधी रात या उसके बाद का समय इसलिये महत्वपूर्ण कहा गया है क्योंकि उस वक्त वातावरण में विघ्न कम से कम होता है। लेकिन अगर आप नींद से परेशान हैं तो उस वक्त त्राटक करने का कोई भी फायदा नहीं होगा। इसी प्रकार ब्रह्ममुहूर्त का समय भी विघ्न कम होने तथा प्राकृतिक रूप से अवचेतन मन के करीब होने के कारण अच्छा मानते हैं। यह अच्छा समय जरूर है लेकिन सायंकाल नींद पूर्व का समय भी इतना ही या इससे कहीं ज्यादा महत्वपूर्ण है। उस काल में अगर नींद परेशान करे तो महत्व घट जाता है। त्राटक के समय को त्राटक की विधि से जोड़कर देखना चाहिए। अगर कोई व्यक्ति घने अंधेरे को ध्यान का केंद्र बनाता है तो वह अंधेरी रात या अंधेरे कमरे में ही कर सकता है। तारों पर भी त्राटक रात के समय ही हो सकता है। सूरज पर त्राटक सुबह दिन निकलने के वक्त हो सकता है। गहरे पानी या नीले आकाश पर त्राटक दिन में ही हो सकता है। अतः त्राटक का समय क्या हो मूलतः इस बात पर निर्भर करता है कि त्राटक की विधि कौन सी है। कृपा कर समय की सीमा से अपनी मनोदशा न जोड़ें। त्राटक कैसे करें किस शारीरिक अवस्था में त्राटक किया जाये यह सवाल भी बहुत महत्वपूर्ण है। कुछ व्यक्ति कहते हैं बैठकर चैकड़ी मारकर त्राटक करना चाहिये तथा कुछ कहते हैं खड़े हो कर तथा कुछ का मत है कि अर्ध लेट कर त्राटक करना चाहिये। इस प्रश्न का जवाब भी विधि से ज्यादा जुड़ा है। कुछ विधियां हंै जो मात्र खड़े होकर या मात्र बैठकर या मात्र लेटकर ही की जा सकती हैं जबकि कुछ विधियां कई प्रकार के आसनों में की जा सकती है। जैसे चांद या तारों या गहरे आकाश में ध्यान लेटकर अच्छी तरह से लगाया जा सकता है। बिंदु, शक्ति चक्र, दीपक, अगरबत्ती इत्यादि पर त्राटक बैठकर या खड़े हो कर किसी भी रूप में किया जा सकता है। छाया पर त्राटक खड़े होकर ही किया जा सकता है। इसी प्रकार अपने प्रतिबिंब पर भी त्राटक मूलतः खड़े होकर ही करना ज्यादा आसान होता है। होलोग्राफिक चित्र पर त्राटक बैठकर अधिक सुचारू रूप से किया जा सकता है। इसी प्रकार त्रिकालदर्शी शीशे पर तथा क्रिस्टल बाॅल पर भी त्राटक बैठकर ज्यादा आराम से किया जा सकता है। इन सभी बातों से ऐसा प्रतीत होता है कि त्राटक करने का आसन से कोई विशेष संबंध नहीं है। इसका विशेष संबंध आरामपूर्वक करने से ज्यादा जुड़ा है। जिस आसन में जो विधि ज्यादा आराम दे वही अपनायें। साथ-साथ इस बात का भी ध्यान रखें कि आपका स्वास्थ्य क्या कहता है। कई लोग ज्यादा समय तक बैठ नहीं पाते हैं तथा कई लोग अधिक समय तक खड़े नहीं रह पाते। अतः अपने शरीर को आराम, शरीर की क्षमता और त्राटक की विधि को ध्यान में रखकर ही त्राटक को करने का आसन आप चुनें। किसी भी मिथ्या भ्रम में पड़ कर अपने आप को कष्ट न पहुंचायें। त्राटक की विधियों का प्रयोग त्राटक की अनेक विधियां काफी लंबे काल से विश्व भर में प्रचलित हैं। इनकी संख्या अत्यधिक है। किसी भी विधि को अच्छा या बुरा कहना सही बात नहीं है। पिछले अंक में हमने कुछ विधियों की चर्चा की थी जो कि मात्र उनकी जानकारी तक ही सीमित थी। कुछ विधियों को करने के ढंग पर कुछ आवश्यक जानकारी हर विधि के आगे दी गई है। होलोग्राफिक चित्र आपने ऐसे चित्र अक्सर देखे होंगे जो एक धरातल में छुपे रहते हैं तथा कुछ समय धरातल पर ध्यान देने के पश्चात वह तीन आयामों वाले चित्र दिखाई देना प्रारंभ कर देते हैं इन्हें होलोग्राफिक चित्र कहते हैं। इस प्रकार के चित्रों का प्रयोग पुरातन काल में महत्वपूर्ण सूचना रखने के लिये किया जाता था, जैसे खजाने का पता इत्यादि ऐसी ही एक मान्यता है। इन चित्रों को मूलतः बैठकर देखना चाहिये। आराम से एक कुर्सी या जमीन पर बैठ जाइये। चित्र को अपने एक हाथ या दोनों हाथों में पकड़िये। दोनों हाथों से पकड़ना ज्यादा लाभकारी होता है। चित्र पर इस प्रकार देखिये जैसे आप एक आयना देखते हैं। अर्थात् धरातल के परे देखिये। ऐसा करने के लिये आप किसी एक बिंदु या उसमें आपके चेहरे के अक्स पर गौर से देखते रहिये। देखते-देखते खो जाइये। आप को तभी एक तीन आयामों का चित्र दिखाई देना आरंभ कर देगा। चित्र के फ्रेम को धीरे-धीरे दायें, बायें, ऊपर और नीचे तक घुमायें तथा आराम से देखते रहें तथा चित्र को अदर्शित न होने दें। इस विधि से हमारी दिव्य दृष्टि बढ़ती है तथा एकाग्रता तो बढ़ती ही है। अगर आप उस चित्र पर गौर से एकटक देखते रहेंगे तो कुछ ही देर में वह चित्र भी गायब सा हो जाएगा तथा हमारे अवचेतन मन की कल्पना शक्ति उस स्थान पर आ जाएगी तथा विचित्र अनुभव होने प्रारंभ हो जायेंगे। यही उत्तम वक्त है अपने मन की शक्ति बढ़ाने का। आप अपने लिये पूर्व नियोजित सुझाव का कल्पनात्मक प्रयोग करके मन को लाभान्वित कर सकते हैं। चित्र को अपनी आंखों के बहुत करीब न ले जायें तथा बहुत दूर भी न ले जायें। आयना देखते वक्त जितनी दूरी रखी जाती है वह पर्याप्त है। देखने के लिये बहुत जोर न लगायें बस ध्यान दें। शक्ति चक्र शक्ति चक्र से सम्मोहन और त्राटक का बहुत पुराना संबंध है। शक्ति चक्र कई आकार का हो सकता है। अगर यह छत के नीचे या फिर दीवार पर लगाना हो तो आकार बड़ा होना चाहिये। अगर आंखों के सामने हाथ में या दीवार या मेज पर रखना हो तो आकार छोटा होना चाहिये। ध्यान रहे शक्ति चक्र के मध्य बिंदु की दूरी इतनी हो कि आपको बिंदु ठीक से दिखाई दे सके। अर्थात आंखों पर अधिक दबाव न पड़े। मध्य बिंदु आंख के समानांतर या थोड़ा ऊपर होना चाहिए। शक्ति चक्र को कुर्सी पर बैठकर, आराम कुर्सी पर लेट कर या खड़े हो कर किया जाता है। ध्यान मध्य बिंदु पर लगाएं और लगातार देखते रहें। कम से कम पलक बंद करें। कुछ लोगों की मान्यता है कि पलकें बंद नहीं करनी चाहिये लेकिन यह सही नहीं है। अपनी आंखों पर अधिक दबाव डालना गैर जरूरी है। देखने का समय अर्थात कितनी देर देखना है, अपने आस-पास के अनुसार रखें। प्रारंभ में यह चंद मिनट ही होगा जो धीरे-धीरे बढ़ता जाएगा। कुछ ही देर बाद शक्ति चक्र में आपको गतिशीलता अनुभव होगी जैसे कि यह घूम रहा हो और आप उस चक्र के अंदर जा रहे हों। यह मात्र एक मनोवैज्ञानिक अनुभव है। कुछ और समय होने पर शक्ति चक्र दिखाई देना बंद हो सकता है और उसकी जगह आपके मन की कल्पना शक्ति ले सकती है। ऐसी अवस्था आने पर आप अपने मन को और अपने जीवन को और बेहेतर बनाने के लिये अपने सुझाव व कल्पनाशक्ति का प्रयोग कर सकते हैं। शक्ति चक्र देखते समय हमेशा अपनी आंखों की रोशनी को मजबूत होता हुआ अनुभव करें। जैसा आप सोचेंगे वैसा ही प्रभाव आप की आंखों पर पड़ेगा। बीच-बीच मंे पलक बंद करने से आपके ध्यान पर बहुत अधिक फर्क नहीं पड़ेगा। आप अपनी आंखों को आधा बंद करके भी अपनी पलकों और आंखों को आराम दे सकते हैं। शक्ति चक्र के चक्रों का रंग कैसा हो। आमतौर पर शक्तिचक्र काले रंग के बने होते हैं जिनका धरातल सफेद होता है। लेकिन हर शक्तिचक्र का रंग यही हो यह आवश्यक नहीं है। यह मात्र स्पष्ट रूप से दिखाई देने के लिये ही ऐसा किया जाता है। किसी भी साफरूप से दिखाई देने वाले रंगों में यह चक्र बनाया जा सकता है। अगर आपको बना-बनाया शक्ति चक्र नहीं मिल पाता है तो इसकी रचना आप खुद भी कर सकते हैं। शक्ति चक्र की रचना करते समय यह ध्यान रखें कि ऊपर की ओर से आने वाली रेखायें मोटी और नीचे जाती हुई रेखायें बारिक होनी चाहिये। रेखाओं की मोटाई में घटती हुई मोटाई घुमने का और इसके अंदर जाने का भ्रम उत्पन्न करती है तथा हमारे मस्तिष्क की तरंगों को प्रभावित करने में मददगार रहती है। बिंदु त्राटक यह भी एक अत्यंत प्रचलित विधि है। यह विधि विद्यार्थी अधिक प्रयोग करते पाये जाते हैं। यह विधि आम तौर पर बैठकर या खड़े होकर की जाती है। इस विधि के लिये बहुत ही आसान और हर जगह मिलने वाली सामग्री प्रयोग की जाती है। अर्थात एक गत्ता, एक सफेद कागज़, एक काला कागज या काली स्याही तथा गोंद या अन्य चिपकाने का पदार्थ। एक वर्ग फुट के लगभग वर्गाकार या वृत्ताकार गत्ता लें। उस पर एक ओर सफेद कागज चिपका दें। उस कागज के बीच में एक गोला या वृत्त बनाएं जिसका रंग काला या आसानी से दिखाई देने वाला हो। बस आपका बिंदु त्राटक का सामान तैयार हो गया। इस गत्ते को दीवार पर लटका दें या चिपका दें। ध्यान रखें कि वह हिलता न हो। गत्ते की ऊंचाई इस प्रकार रखें कि बीच के वृत्त की ऊँचाई कम से कम आप की आंख की ऊंचाई के बराबर हो या थोड़ा अधिक भी हो सकती है। वृत्त का आकार लगभग एक इंच होना चाहिये। आंखों से बिंदु की दूरी अपनी सुविधा के अनुसार रखें अर्थात आप आराम से देख पायें। कुर्सी या आराम कुर्सी पर बैठकर या खड़े होकर मध्य में बने वृत्त पर ध्यान लगाएं। ध्यान लगाने का समय अपनी सुविधानुसार रखें। यह समय धीरे-धीेरे बढ़ता जायेगा। कुछ अंतराल के बाद बीच का वृत्त कभी-कभी दिखाई देना बंद हो सकता है तथा उसकी जगह मन की कल्पना का चित्रण होना प्रारंभ हो सकता है। यह एक प्राकृतिक प्रक्रिया है। इसमें अपने आप को चमत्कारी न मानें। बीच में बनाये गये वृत्त को कुछ दिन बाद, जैसे 15 दिन बाद और छोटा कर दें अर्थात आधा इंच के लगभग कर देना चाहिये। कुछ और दिन के अभ्यास के बाद आकार घटाते जाइये जब तक आकार एक बिंदु के समान न हो जाये। प्रारंभ में आकार बड़ा इसलिये रखा जाता है ताकि वह साफ रूप से दिखाई दे तथा धीरे-धीरे उसके आकार को घटाया जाना चाहिये। जब भी एकाग्रता इतनी बढ़ जाये कि बीच का वृत्त या बिंदु लुप्त होना शुरू हो जाता है तो आप अपने मन की शक्ति या जीवन कार्यों में जो सुधार करना चाहते हैं उससे संबंधित सुझाव व कल्पना का प्रयोग कर सकते हैं। त्राटक की इस प्रकार अनेक विधियां हैं इन सभी विधियों के बारे में चर्चा करना ना तो संभव है और ना ही मुनासिब है। अगले अंक में मुख्य रूप से त्राटक करते समय सावधानियां पर चर्चा की जायेगी।

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विघ्नहर्ता गणेश विशेषांक  सितम्बर 2013

फ्यूचर समाचार पत्रिका के विघ्नहर्ता गणेश विशेषांक में गणपति के प्राकट्य की कथा, गणपति पूजन विधि, उच्छिष्ट गणपति पूजन, गणपति के विभिन्न स्वरूप, गणपति के विभिन्न रूपों की पूजा से दुःख निवारण, गणपति के प्रमुख तीर्थ स्थलों का परिचय, सर्वप्रथम गणपति पूजन क्यों? आदि ज्ञानवर्धक आलेख सम्मिलित किए गए हैं। इसके अतिरिक्त एक जांबाज के दुःखद अंत की सत्यकथा, तारकासुर का वध, अंक ज्योतिष के रहस्य एवं दुःख निवारक शनि की भूमिका जैसे रोचक आलेख विशेष जानकारी से युक्त तो हैं ही साथ ही इनको पढ़ने से आप आनंदित भी महसूस करेंगे।

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