मांगलिक दोष परिहार

मांगलिक दोष परिहार  

मांगलिक दोष परिहार विक्रम मावी यह सत्य है कि ग्रहों-नक्षत्रों की विशेष स्थितियों के कारण कुछ दुर्योग निर्मित होते हैं जो जातक की कंुडली में दृष्टि गोचर होते हैं, परंतु ऐसा होने पर भी आवश्यक नहीं कि ये दुर्योग जातक को प्रभावित करें। अन्य ग्रहों की स्थिति, दृष्टि-युति अथवा कारक ग्रह की स्थिति के प्रभाववश ऐसे योग निष्प्रभावी व क्षीण भी हो सकते हैं। अतः कुंडली का सूक्ष्मता से विश्लेषण करना चाहिए। यहां मंगल दोष से युक्त एक कुंडली का विश्लेषण प्रस्तुत है जिससे स्पष्ट होता है कि कुंडली में विद्यमान अन्य योगों के फलस्वरूप यह दोष निष्प्रभावी है। प्रस्तुत कुंडली एक महिला की है। लग्न वृष है, अतः शुक्र, बुध व शनि कारक ग्रह हैं। शनि स्वयं योगकारक होकर सप्तम भावस्थ है। अंशों के आधार पर 090ः37’ः03’’ पर शनि अपने नक्षत्र अनुराधा में स्थित है। इसकी तृतीय दृष्टि नवम् स्वराशि पर शुभ है और सप्तम व दशम दृष्टि लग्न व लग्नेश पर है। स्वयं शनि पर किसी ग्रह की दृष्टि नहीं है। अष्टमस्थ मंगल व द्वादश भाव मेष राशि पर दृष्टि अनुकूल है। शोध से पता चला है कि चंद्र के अंश के आधार पर साढ़े साती काल में शनि का प्रभाव आगे व पीछे की राशियों पर रहता है। इसी आधार पर जन्म कुंडली पर शनि के प्रभाव का आकलन करना उŸाम रहेगा। मंगल 200ः07’ः27’’, लग्नेश शुक्र के नक्षत्र पूर्वाषाढ़ा में है। ज्योतिष के सिद्धांत के अनुसार द्वादशेश होने से अष्टम में स्थित होकर ग्रह विपरीत राजयोग कारक हो जाता है। शुक्र लग्नेश शत्रु सूर्य की राशि में है, परंतु अंशों के आधार पर शुभ है, स्वनक्षत्री है लग्नेश चतुर्थ में स्थित है। मित्र शनि कुंडली में द्वितीय, पंचम, सप्तम, नवम व एकादश का स्थिर कारक बृहस्पति 290ः04’ः51’’ स्वनक्षत्री है (पूर्वा भाद्रपद), अतः शुभ है। सौम्य ग्रह केंद्र में है। वैसे, शुक्र-गुरु की परस्पर दृष्टि-संबंध ठीक नहीं, परंतु यहां यह तथ्य मान्य नहीं क्योंकि स्वनक्षत्री होने के कारण दोनों ही ग्रह शुभ फलदायक हैं। वक्री होने के कारण गुरु शुभता में वृद्धिकारक होगा। गुरु एकादशेश भी है। इसकी पंचम दृष्टि धन भाव पर व नवम् दृष्टि षष्ठ भाव शुक्र की राशि पर है। छठे में केतु व द्वादश में राहु स्थित होकर विपरीत राजयोग कारक मंगल की परिधि में 010ः18’ः18’’ चित्रा नक्षत्र दोष निवारक हो सकते हैं। पापी ग्रह दुःस्थानों में स्थित होकर अशुभ फल प्रदान नहीं करते। केन्द्रे च सौम्या यदि पृष्ठभाजः पापः कलत्रे च मनुष्य राशौ। राज्ञी भवेत् स्त्री बहुकोशयुक्ता नित्यं प्रशान्ता च सुपुत्रिणी च।। उपर्युक्त श्लोक के अनुसार, केंद्र में सौम्य ग्रह गुरु और शुक्र स्थित हैं। तीसरे में सूर्य व द्वादश तथा षष्ठ में राहु-केतु की स्थिति है। यदि 1-4-7-8-12 भाव में मंगल, चंद्र या गुरु से युक्त हो अथवा शनि की दृष्टि मंगल पर पड़ रही हो तो कंुडली में मंगल दोष का परिहार हो जाता है। सही विश्लेषण हेतु निरयण भाव चलित के विशिष्ट तथ्यों को ध्यान में रखना आवश्यक है। मंगल दोष होने पर भी त्रिकोण (1-5-9) अथवा केंद्र (1-4-7-10) में गुरु अथवा केंद्र (1-4-7-10) में चंद्र हो अथवा छठे या ग्यारहवें भाव में राहु हो तो मंगल दोष विचारणीय नहीं होता। प्रस्तुत कंुडली में निरयण भाव चलित में राहु एकादश स्थान में स्थित है। अतः वर्णित तथ्यानुसार मंगल दोष विचारणीय नहीं है। मंगल की स्थिति गुरु से एकादश है, इसलिए गणना गुरु से की जाएगी। चंद्र से मंगल द्वादश भाव में है। ज्योतिषाचार्यों का मत है कि मंगल वक्री हो तो मंगल दोष नहीं लगता। इस तरह स्पष्ट है कि कुयोग के दृष्टिगोचर होने के बावजूद विशेष गणनाओं व ग्रहों की स्थिति और युति-दृष्टि संबंध तथा लग्न व निरयण भाव चलित आदि के कुछ विशिष्ट तथ्यों के आधार पर कंुडली को मंगलीक दोष मुक्त घोषित किया जा सकता है।



शनि विशेषांक  जुलाई 2008

शनि का खगोलीय, ज्योतिषीय एवं पौराणिक स्वरूप, शनि की साढ़ेसाती, ढैय्या एवं दशा के प्रभाव, शनि के दुष्प्रभावों से बचने एवं उनकी कृपा प्राप्ति हेतु उपाय, शनि प्रधान जातकों के गुण एवं दोष, शनि शत्रु नहीं मित्र भी, एक संदर्भ में विवेचना

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