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वक्री शनि, अशुभ ही नहीं

वक्री शनि, अशुभ ही नहीं  

वक्री शनि, अशुभ ही नहीं सुधांशु निर्भय शन का नाम आने का मतलब है एक विस्तृत भय- असुरक्षा-कुफल का वातावरण। समझ से परे है कि बिना किसी गहन ज्ञान के इतनी नकारात्मक सोच रखना। उत्तरदायी निश्चित ही संपूर्ण ज्योतिष जगत ही है। प्रायः शनि के वक्रत्व काल को अत्यधिक अशुभ परिणामदायक बताया जाता है, जबकि पाया गया है कि वक्री होने पर शनि के प्रभावों का शुभत्व और अधिक बढ़ जाता है। इस अवधि में जातक को वही फल प्राप्त होते हैं जिनका वह अधिकारी होता है। फलदीपिका के अनुसार वक्री ग्रह नीच या शत्रु राशिस्थ हो तो भी उच्च ग्रह के अनुसार ही फल करता है। इसी तरह शनि वर्गोत्तम या नवमांश में हो तो स्वक्षेत्री स्थिति के अनुसार ही फल करता है। फलदीपिका के 20वें अध्याय मंे रचनाकार स्पष्ट करता है कि विंशोत्तरी दशा- अंतर्दशा के शुभ फल तभी प्राप्त होते हैं जब दशा या अंतर्दशा का स्वामी ग्रह शुभ भावेश होकर स्व या उच्च राशि में विद्यमान हो अथवा वक्री हो। ज्योतिष विद्वान श्री सत्याचार्य ने भी उच्च स्वराशिस्थ या वक्री ग्रह को ही श्रेष्ठ माना है। दक्षिण भारत के विद्वान श्री मंत्रेश्वर भी वक्री ग्रहों को परम शुभ फल प्रदाता कहते हैं। उक्त मतों के अनुसार शनि के वक्र काल को अशुभ मान लेना उचित नहीं है। पाश्चात्य विद्वान भी वक्री शनि को शनि पीड़ित लोगों के लिए शुभ मानते हैं। अपनी इस अवस्था में शनि व्यक्ति के जीवन को सुखमय भविष्य की ओर ले जाता है। शनि के वक्रत्व काल में ही व्यक्ति आत्म विश्लेषण के दौर से गुजरता है और अपने भविष्य को सुखमय बनाने का प्रयास करता है। निरुत्साहित लोगों में उत्साह का संचार वक्री शनि ही करता है। शनि के वक्री होने पर संबद्ध लोगों को अपनी अपेक्षाओं पर नियंत्रण रखना चाहिए, अन्यथा वह आईना भी दिखा सकता है। इस अवधि में संतोष, विवेक व धैर्य का सहारा लेना चाहिए, ताकि किसी विपरीत परिस्थिति का सामना न करना पड़ जाए। वक्री शनि के कालांश में पैदा होने वाले जातक पूर्णतः आध्यात्मिक होते हैं। ऐसे अधिकांश जातक ईश्वरीय सत्ता को मानने वाले होते हैं। वे स्थिर प्रकृति वाले होते हैं और छोटे-बड़े परिवर्तनों से प्रभावित होते है। बाहर से मजबूत दिखने वाले ऐसे जातक अंदर से बहुत कमजोर होते हैं। उन्हें एकांत प्रिय होता है और वे दिमाग से बेहतर कार्य करते हैं। चूंकि उनका अध्यात्म पक्ष दृढ़ होता हैं, इसलिए वे अच्छे उपदेशक अथवा सलाहकार सिद्ध होते हैं। यह तय है कि वक्री शनि जातक की प्रगति को सुनिश्चित करता है, किंतु पूर्ण संघर्ष के उपरांत। यदि शुभ ग्रहों का प्रभाव कुंडली के प्रमुख भावों, भावेशों एवं शनि व शनि अधिष्ठित राशि पर हो तो संघर्ष कुछ कम हो सकता है। शनि का वक्र गति का प्रभाव व्यापक होता है। यदि जन्म लग्न में शनि वक्री होकर स्थित हो और गोचर में वक्री हो तो यह समय किसी विशेष फल का सूचक होता है। किंतु यह फल कैसा होगा इसका पता व्यक्ति विशेष की कुंडली देखकर ही किया जा सकता है। राष्ट्रीय- अंतर्राष्ट्रीय स्तर के सफलतम व्यक्तियों की कुंडली में कोई न कोई ग्रह वक्री जरूर होता है। इस तरह, मेष में शनि नीचस्थ एवं सिंह में शत्रु राशिस्थ कहा गया है, लेकिन मेष, मिथुन, कर्क, सिंह, वृश्चिक, धनु या मीन राशि का वक्री शनि अशुभ स्थिति में होकर भी अशुभ फल नहीं देता। अगर व्यक्ति अपने आचरण को पवित्र रखे तो उसे शनि के शुभ प्रभाव अतिशीघ्र प्राप्त हो सकते हैं।


शनि विशेषांक  जुलाई 2008

शनि का खगोलीय, ज्योतिषीय एवं पौराणिक स्वरूप, शनि की साढ़ेसाती, ढैय्या एवं दशा के प्रभाव, शनि के दुष्प्रभावों से बचने एवं उनकी कृपा प्राप्ति हेतु उपाय, शनि प्रधान जातकों के गुण एवं दोष, शनि शत्रु नहीं मित्र भी, एक संदर्भ में विवेचना

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