अनेक रोगों में गुणकारी हैं, रुद्राक्ष चूर्ण, तेल व् भस्म प्रयोग

अनेक रोगों में गुणकारी हैं, रुद्राक्ष चूर्ण, तेल व् भस्म प्रयोग  

अनेक र¨ग¨ं में गुणकारी है रुद्राक्ष चूर्ण, तेल व भस्म प्रय¨ग नवीन चितलांगिया स्नायु तंतुअ¨ में क्षीणता आने पर रुद्राक्ष क¢ चूर्ण, म¨ती तथा मूंगे (प्रवाल) की भस्म का समान रूप से मिश्रण तैयार कर प्रतिदिन नियमित रूप से २ ग्राम की मात्रा का सेवन करने से बहुत ही लाभ ह¨ता है । रुद्राक्ष क¢ चूर्ण क¨ तुलसी की डंडी क¢ चूर्ण क¢ साथ मिश्रण कर शहद क¢ साथ नियमित रूप में सुबह खाली पेट सेवन करने से कफजन्य खाँसी ठीक ह¨ जाती है। २ ग्राम रुद्राक्ष क¢ चूर्ण क¨ शहद क¢ साथ मिलाकर भ¨जन क¢ बाद चाटने से शरीर की उर्जा शक्ति बनी रहती है। यह प्रय¨ग कम से कम द¨ महीने तक करें। मिर्गी (अपस्मार्) की प्रारंभिक स्थिति में १ ग्राम रुद्राक्ष क¢ चूर्ण क¨ २ ग्राम सरस्वती क¢ साथ मिलाकर दिन में २ बार १व्म्-१५ दिन¨ं तक सेवन करने से लाभ ह¨ता है । इस चिकित्सा-प्रय¨ग में तामसिक भ¨जन यथा - मछली, मांस, अंडा तथा तेल-मसाले युक्त खट्टी चीजें जैसे-अचार, अमचूरादि लेना निषेध है। मुख पर पाये जाने वाले काले धब्बे, रुद्राक्ष चूर्ण की पिट्ठी में नींबू का रस अ©र चंदन का चूर्ण मिलाकर कुछ दिन¨ं तक नियमित लेप करने से दूर ह¨ जाते है। रुदाक्ष चूर्ण तथा अक्कल ख¨रा क¢ चूर्ण क¨ समान भाग में लेकर मिश्रण तैयार करक¢ शहद क¢ साथ जुबा़न पर रगड़ने से उसकी शुद्धता तथा वाणी मे मिठास आ जाती है । २ ग्राम शुद्ध रुद्राक्ष-चूर्ण में १/ २ ग्राम प्रवाल (मूंगा) भस्म क¨ शहद क¢ साथ मिलाकर कम से कम २१ दिन¨ं तक जिह्वा पर नियमित लेपन करने से जिह्वा क¢ विविध र¨ग¨ं का उपचार ह¨ता है। अर्थात् जिह््वा का ठंड से तथा भय से निस्पंद ह¨ना, लड़खडा़ना, हकलाना, तुतलाना, जलन की अनुभूति ह¨ना, वाणी रूंध जाना तथा निस्वादपन आदि स्वतः ठीक हो जाते हैं। इस अ©षधि का जिह्वा पर लेपन करने क¢ पश्चात् तीस मिनट तक कुछ भी ग्रहण नहीं करना चाहिए। १व्म्-१५ रुदाक्ष क¨ २व्म्व्म् मिली ग्राम तिल क¢ तेल क¢ साथ आधे घंटे तक उबालें । फिर नीचे उतारकर ठंडा कर लें अ©र छान कर शुद्ध कर लें । इस प्रकार से निर्मित रुद्राक्ष-तेल क¨ छाती पर मलने से निम¨निया जैसे र¨ग तथा छाती क¢ दर्द में आराम मिलता है । घुटन¨ं तथा शरीर में अन्य किसी ज¨ड़ पर सूजन आने पर रुद्राक्ष-चूर्ण क¨ सीताफल क¢ पत्त¨ं क¢ चूर्ण क¢ साथ समान रूप से मिलाकर सरस¨ं क¢ तेल क¢ साथ मालिश करने से अत्यन्त लाभकारी परिणाम मिलते है। २ मुखी रुद्राक्ष की भस्म क¨ स्वर्णमाक्षिक भस्म क¢ साथ बराबर की मात्रा में १ रत्ती सुबह-शाम उच्च रक्तचाप क¢ र¨गी क¨ दूध या दही अथवा मलाई क¢ साथ दिये जाने पर चमत्कारी लाभ ह¨ता है। अनिद्रा र¨ग ह¨ त¨ १ ग्राम रुद्राक्ष-भस्म तथा १ ग्राम स्वर्ण-भस्म क¨ मिलाकर २१ दिन¨ं तक नियमित दिन में द¨ बार मट्ठे या मक्खन क¢ साथ सेवन करने से यह र¨ग दूर ह¨ता है। अ©षधि-प्रय¨ग क¢ दिन¨ं में उष्ण आहार पदाथर्¨ का सेवन करना वर्जित है। सांयकालीन घूमना र¨ग में तीव्र सुधार में लाभदायक है । स©न्दर्यवर्धक है रुद्राक्ष कुछ स्त्री-पुरुष¨ं क¢ शरीर से दुर्गंंधयुक्त पसीना आता है। ऐसे ल¨ग रुद्राक्ष, दालचीनी, लाल चंदन, कुलथी अ©र कूठ समान भाग में लेकर पानी मिलाकर उबटन बनायें तथा उसका शरीर पर लेप करें। लेप सूखने क¢ पश्चात स्वच्छ जल से इसे ध¨ दें या स्नान करे । साबुन-शैम्पू आदि का प्रय¨ग ना करें। नियमित लेप लगाने से कुछ ही दिन¨ं में शरीर में पसीने से उठने वाली दुर्गंंध समाप्त ह¨ जायेग© अ©र स©न्दर्य में निखार आ जायेगा। रुदाक्ष से चार गुना बादाम की गिरी, मसूर की दाल, इतने ही गुलाब जल क¢ साथ पीसकर चेहरे पर लेप करें, सूख जाने पर इसे ध¨ डालें। नियमित प्रय¨ग से चेहरा कांतिमय अ©र आभायुक्त ह¨ जायेगा। कील-मुहाँसे स©न्दर्य क¨ बिगाड़ देते हैं। रुद्राक्ष, कालीमिर्च, वंष्आल¨चन क¨ समान मात्रा में लेकर लेप बनाकर चेहरे पर लगाने से कुछ ही समय में कील-मुहाँसे मिट जाते हैं। गुप्तर¨ग की दवा है रुद्राक्ष - गुप्तर¨ग¨ं में उपदंश सबसे घातक र¨ग है । रुद्राक्ष का अ©षधि रूप में प्रय¨ग कर इस घातक र¨ग से छुटकारा पाया जा सकता है। विधि इस प्रकार है - - रुद्राक्ष की मात्रा का दुगुना हरड़, रस©त अ©र सिरस की छाल चार गुना की मात्रा में लेकर कूट-पीसकर चूर्ण बनायें। कपडे़ से छान कर शहद मिलाकर घाव¨ं पर लगायें। शीघ्र लाभ ह¨गा अ©र उपदंश मिट जायेगा। - तीन मुखी रुद्राक्ष क¨ पत्थर पर घिसकर नाभि पर लगाने से धातु-र¨ग में आराम ह¨ता है। इस प्रकार रुद्राक्ष अनेकानेक गुण¨ं से युक्त है। इसमें अद्भुत जीवनी-शक्ति है। जहाँ धार्मिक एवं आध्यात्मिक दृष्टि से इसका विशेष महत्व है, वहीं चिकित्सा एवं आयुर्वेद क¢ क्षेत्र में भी इसका प्रभाव परिलक्षित है। दुर्लभ रुद्राक्ष तथा उनक¢ ज्य¨तिषीय एवं अ©षधीय प्रय¨ग अ©र उपय¨ग ज्य¨तिष एवं व्यापारिक जगत क¢ दृष्टिक¨ण से रुद्राक्ष का वर्गीकरण उसमें पाये जाने वाले मुख¨ं क¢ आध् ाार पर किया जाता है, ज¨ कि 1 मुखी से 27 मुखी तक क¢ ह¨ते हैं। मुख¨ं क¢ अलावा रुद्राक्ष क¢ कुछ अन्य प्रकार भी है, यथा ग©री-शंकर रुद्राक्ष, गणेश रुद्राक्ष, सर्पमुखी (नागफनी) रुद्राक्ष, एक मुखी सवार रुद्राक्ष अ©र ग©रीपाठ (त्रिजुगी/ त्रिजुटी) रुद्राक्ष, जिनका आध्यात्मिक दृष्टिक¨ण से विशेष महत्व है। एक मुखी ग¨लादाना रुद्राक्ष एवं 22 से 27 मुखी रुद्राक्ष अति दुर्लभ श्रेणी क¢ कहलाते है ज¨ कि वर्तमान में अप्राप्य है। 18 से 21 मुखी रुद्राक्ष एवं ग©रीपाठ त्रिजुगी रुद्राक्ष दुर्लभ ह¨तें हैं, ज¨ कि यदा-कदा प्राप्त ह¨तें है। 15 से 21 मुखी रुद्राक्ष एवं ग©री-शंकर रुद्राक्ष कम मात्रा में पाये जाते हैं तथा 2 से 14 मुखी रुद्राक्ष सर्वसाधारण रूप से उपलब्ध ह¨ते हंै। पंद्रह मुखी तथा अन्य रुद्राक्ष¨ं का संक्षिप्त विवरण इस प्रकार से है - पन्द्रहमुखी रुद्राक्ष पन्द्रमुखी रुद्राक्ष भगवान पशुपतिनाथ का स्वरूप माना गया है। इसे धारण करने से पूर्व जन्म में किए हुए पाप¨ं का शमन ह¨ता है तथा जाने-अनजाने में किये गए समस्त पाप स्वतः ही नष्ट ह¨ जाते है । यह धारक क¨ आर्थिक एवं आध्यात्मिक स्तर पर उठाकर उसे सुख, सम्पदा, मान-सम्मान-प्रतिष्ठा एवं शान्ति प्रदान करता है। स्त्री द्वारा यह रुद्राक्ष धारण करने पर उसक¢ गर्भपात ह¨ने का भय नहीं ह¨ता व प्रसव-पीडा़ में कमी ह¨ती है। स¨लहमुखी रुद्राक्ष स¨लहमुखी रुद्राक्ष क¨ हरि-शंकर अर्थात विष्णु अ©र शिव का रूप माना गया है । पक्षाघात (लकवा), सूजन, कंठादि र¨ग में इसे धारण करना लाभदायक ह¨ता है, अग्निभय, च¨री-डकैती का भय नहीं ह¨ता है। सत्रहमुखी रुद्राक्ष सत्रहमुखी रुद्राक्ष क¨ सीता-राम का स्वरूप कहा गया है। कई विद्वान विश्वकर्मा क¨ इसका प्रधान देवता मानते हैं। भूमि, मकान, वाहनादि का सुख, अनचाहा धन, समृद्धि अ©र सफलता का लाभ इसे धारण करने से प्राप्त ह¨ता है। मान्यता है कि इसक¢ धारण करने से शरीर में कुण्डलिनी-शक्ति का जागरण ह¨ता है । इसे धारण करने से याद्दाश्त कमज¨र ह¨ना, आलसीपन, कार्य करने क¢ प्रति अनिच्छा आदि से संबंधित र¨ग दूर ह¨ते है। अठारहमुखी रुद्राक्ष अट्ठारहमुखी रुद्राक्ष क¨ भैरव का रूप माना गया है। कुछ विद्वान¨ं क¢ अनुसार यह माता पृथ्वी का स्वरूप है। इसे धारण करने से शरीर पर आने वाली विभिन्न विपदाअ¨ं (यथा आकस्मिक दुर्घटना आदि) का नाश ह¨ता है, व्यक्ति क¨ अकाल मृत्यु का भय नहीं ह¨ता है। इसे धारण करने से व्यक्ति आध्यात्मिक जीवन में मान-सम्मान-प्रतिष्ठा एवं उन्नति क¨ प्राप्त ह¨ता है। यदि क¨ई गर्भवती स्त्री इसे धारण करे त¨ उसक¢ गर्भ में पल रहे बच्चे की रक्षा ह¨ती है। उन्नीसमुखी रुद्राक्ष उन्नीसमुखी रुद्राक्ष क¨ भगवान नारायण का स्वरूप कहा गया है। इसे बुराई पर अच्छाई की जीत का प्रतीक माना गया है क्य¨ंकि इसको धारण करने से मनुष्य में छिपी बुराई का नाश ह¨ता है, मनुष्य सत्य एवं न्याय क¢ पथ पर अग्रसर ह¨ता है। इसे धारण करने से मनुष्य क¨ आर्थिक सुख-सम्पदा का लाभ ह¨ता है, मनुष्य के रक्त व स्नायु तंत्र से संबंधित विकार दूर ह¨ते हैं। बीसमुखी रुद्राक्ष बीसमुखी रुद्राक्ष क¨ जनार्दन स्वरूपम् कहा गया है । इसे धारण करने से भूत, पिशाच, राक्षसादि का भय नहीं ह¨ता है, मनुष्य क¢ उपर क्रूर ग्रह¨ं का अशुभ प्रभाव नहीं ह¨ता है। मनुष्य अपनी अपूर्व श्रद्धा एवं तंत्र-विद्या क¢ जरिए विशेष सफलता प्राप्त करता है तथा उसे सर्पादि जैसे विषैले जीव जंतुओं का भय नहीं ह¨ता है। इक्कीसमुखी रुद्राक्ष इक्कीसमुखी रुद्राक्ष साक्षात शिव स्वरूप है। इसमें समस्त देवताअ¨ं का निवास माना गया है। इसे धारण करसे से व्यक्ति ब्रह्महत्या जैसे पाप¨ं से मुक्त ह¨ जाता है, व्यक्ति का कीर्ति-यश-पराक्रम अक्षुण्ण बना रहता है, स्वास्थ्य एवं धन क¢ मामले में व्यक्ति सम्पूर्ण सुखी रहता है। इसे धारण करने पर मनुष्य सनातन धर्म क¢ प्रति आस्थावान ह¨ता है। यह रुद्राक्ष मनुष्य क¢ भीतर आज्ञा-चक्र तथा कुण्डलिनी क¨ जाग्रत करता है । एक््मुखी सवार रुद्राक्ष जिस प्रकार मानव क¢ हाथ में पाँच उँगली क¢ अलावा भी एक अन्य उँगली पायी जाती है और जिस प्रकार जुड़वाँ फल में द¨ फल आपस में जुडे़ ह¨ते हैं, उसी प्रकार किसी-किसी रुद्राक्ष पर एक मुखी रुद्राक्ष इस तरह लगा ह¨ता है मान¨ रुद्राक्ष क¢ ऊपर अलग से कुछ हिस्सा निकला ह¨। इसे एकमुखी सवार रुद्राक्ष कहा जाता है। यह अत्यंत ही दुर्लभ रुद्राक्ष ह¨ता है । ग©री-शंकर रुद्राक्ष प्राकृतिक रूप से आपस में जुडे़ हुए द¨ रुद्राक्ष¨ं क¨ ग©री-शंकर रुद्राक्ष कहा जाता है। यह शिव-पार्वती क¢ तुल्य अपार शक्ति वाला शिव-शक्ति का स्वरूप माना गया है, जिसे धारण करने से शिव अ©र शक्ति अर्थात माता पार्वती की कृपा समान रूप से प्राप्त ह¨ती है। यह सात्विक प्रकृति का सर्वसिद्धिदायक एवं म¨क्षप्रदाक रुद्राक्ष कहा गया है। घर या दुकान में इसे पूजा या धन स्थान में स्थापित करने से देवी लक्ष्मी का स्थायी वास ह¨ जाता है। यह पारिवारिक शान्ति का प्रतीक ह¨ता है तथा इसे धारण करने से पति-पत्नी क¢ आपसी प्रेम में वृद्धि ह¨ती है एवं उनका वैवाहिक जीवन सुखमय ह¨ता है। स्वास्थ्य, आयु वृद्धि, कम्पीटीशन में सफलता प्राप्ति तथा सेक्स से संबंधित समस्याअ¨ं क¨ दूर करने में यह लाभदायक ह¨ता है। संक्षेप में यह रुद्राक्ष एक मुखी रुद्राक्ष की भांति धर्म, अर्थ, काम अ©र म¨क्ष प्रदान करने वाला चतुर्वग प्रदाता रुद्राक्ष है। गणेश रुद्राक्ष जिस रुद्राक्ष पर गणेश जी क¢ सूंड क¢ समान अलग से एक धारी उठी हुई दिखाई दे, उसे गणेश रुद्राक्ष कहा जाता है। इसे धारण करने से भगवान गणेश की कृपा प्राप्त ह¨ती है तथा व्यक्ति क¨ रिद्धि-सिद्धि, कार्यकुशलता, मान-सम्मान-प्रतिष्ठा, व्यापार-लाभ इत्यादि की प्राप्ति ह¨ती है। भगवान गणेश का स्वरूप ह¨ने क¢ कारण यह रुद्राक्ष विद्यार्थी-वर्ग क¢ लिए विशेष लाभदायक है, जिसे धारण करने पर विधार्थी की स्मरण शक्ति एवं ज्ञान में वृद्धि ह¨ती है, उसका ब©द्धिक विकास ह¨ता है तथा उसे परीक्षा में अच्छे अंक¨ से सफलता प्राप्त ह¨ती है। ग©रीपाठ (त्रिजुगी/त्रिजुटी)रुद्राक्ष जिस रुद्राक्ष में प्राकृतिक रूप से तीन दाने एक-दूसरे से आपस में जुडे़ ह¨ते है, उसे ग©रीपाठ या त्रिजुगी अथवा त्रिजुटी रुद्राक्ष कहा जाता है। यह रुद्राक्ष ब्रह्मा-विश्णु-महेश तीन का साक्षात एकल स्वरूप है। यह अत्यंत ही दुर्लभ रुद्राक्ष है अ©र इसे धारण करने से ब्रह्मा, विश्णु अ©र महेश तीन¨ं की कृपा समान रूप से प्राप्त ह¨ती है। गर्भग©री रुद्राक्ष इस रुद्राक्ष क¨ पार्वती अ©र गणेश का स्वरूप माना गया है। जिस स्त्री क¨ य¨ग्य संतान की कामना ह¨, उसे यह रुद्राक्ष अवश्य धारण करना चाहिए। इसे धारण करने से स्त्री में बच्च¨ं क¢ प्रति स्नेह एवं सहानुभूति उत्पन्न ह¨ती है अर्थात उसक¢ ममत्व में वृद्धि ह¨ती है। सर्पमुखी (नागफनी) रुद्राक्ष गणेश रुद्राक्ष की तरह इस रुद्राक्ष क¢ ऊपर सर्प क¢ फन क¢ समान धारी जुडी़ ह¨ती है । इस रुद्राक्ष क¨ समस्त प्रकार क¢ सर्पद¨ष¨ं क¢ निवारण् ाार्थ (विशेषकर कालसर्पद¨ष) हेतु धारण किया जाता है। इसको धारण करने से व्यक्ति क¨ सर्पादि जैसे विषैले जीव¨ं का भय नहीं ह¨ता है।



हृदय रोग एवं ज्योतिष विशेषांक  July 2017

हृदय रोग एवं ज्योतिष विशेषांक में हृदय रोग के ज्योतिषीय योगों व कारणों की चर्चा करने हेतु विभिन्न ज्ञानवर्धक लेख व विचार गोष्ठी को सम्मिलित किया गया है। इस अंक की सत्य कथा विशेष रोचक है। वास्तु परिचर्चा और पावन तीर्थ स्थल यात्रा वर्णन सभी को पसंद आएगा। देवशयनी एकादशी पर्व का वर्णन भी इस अंक में किया गया है। फलित विचार नामक स्थायी स्तम्भ में विभिन्न भावों के विशेष फल की चर्चा की गई है। तन्त्र शास्त्र नामक स्थायी स्तम्भ में तन्त्र और शक्ति पात् पर रोचक लेख लिखा गया है। टैरो स्तम्भ में माइनर अर्काना और टू आॅफ पेन्टाकल्स की चर्चा की गई है।

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