रुद्राक्ष एक-गुण अनेक

रुद्राक्ष एक-गुण अनेक  

रुद्राक्ष एक-गुण अनेक हरिश्चंद्र प्रसाद ‘‘आर्य’’ भारत वर्ष में तो रुद्राक्ष से सभी परिचित हंै। यह आस्था के केंद्र के साथ अनेकों प्रकार से उपयोगी है। आजकल तो यूरोप और अमेरिका के लोग भी रुद्राक्ष से परिचित हो चले हैं। उनमें भी भारतीय दर्शन और अध्यात्म के प्रति रुचि जागृत हुई है। परिणामस्वरूप वहां के निवासी भी बड़ी आस्था और उत्साह के साथ रुद्राक्ष धारण करते हैं वस्तुतः रुद्राक्ष सर्वाधिक पवित्र और प्रभावी पदार्थ है। शिव भक्तों को यह बहुत प्रिय है। अन्य देवी-देवताओं की पूजा स्तुति में भी रुद्राक्ष की माला धारण करने और रुद्राक्ष की माला से मंत्र जप का विधान है। यद्यपि विभिन्न मनो- कामनाओं की पूर्ति के लिए अलग -अलग पदार्थों की माला का विधान है परंतु पदार्थ विशेष की माला के अभाव में रुद्राक्ष की माला सहज एवं सर्व सिद्धि को देने वाला है। रुद्राक्ष को शोधित करने का विधान: रुद्राक्ष या उससे निर्मित माला को देख-परखकर लायें। उन्हें ‘‘गुरु पुष्य’’ या ‘‘रवि पुष्य’’ या अन्य शुभ मुहूर्त में धोकर एक थाली में रख दें। थाली में रखने से पहले गंगाजल या शुद्ध जल से धो लेना चाहिए। फिर रुद्राक्ष या इसकी माला को गंगाजल से स्नान कराएं, फिर दूध से और शुद्ध जल से स्नान कराना चाहिए। फिर श्वेत चंदन लगाकर, धतूरे के श्वेत फूल, अक्षत्, बेलपत्र चढ़ाएं। अंत में धूप अर्पित कर आरती करें। इस पूरी प्रक्रिया में ‘‘ऊँ नमः शिवाय’’ का जप करते रहें। शिवजी का ध्यान कर उनसे प्रार्थना करें- ‘‘हे शिवजी कृपा के दिव्य प्रभाव से इसे प्रभावशाली बनाइये। मैं इस रुद्राक्ष को धारण कर सदैव आपका कृपापात्र बना रहूं। मेरी रक्षा कीजिए।’’ इस प्रकार प्रार्थना करके रुद्राक्ष को धूप के धूएं में शोधित करके माथे से लगाएं। अगर रुद्राक्ष की माला है तो माला के सुमेरु को माथे से लगाएं। इसके पश्चात् ग्यारह माला जप ‘‘ऊँ नमः शिवाय’’ मंत्र का जपें। फिर इसी मंत्र से इक्कीस आहुति देकर हवन करें और ब्राह्मण को सदक्षिणा व भोजन कराकर विदा करें। फिर रुद्राक्ष या इसकी माला को शिवजी की प्रतिमा से स्पर्श कराकर मंत्रोच्चार के साथ धारण कर लें और भस्म का टीका मस्तक पर लगाकर भगवान शिव को प्रणाम करंे। विभिन्न रोगों में रुद्राक्ष का प्रयोग: आयुर्वेद और तंत्र में रुद्राक्ष की महिमा को अपार कहा गया है। विविध प्रकार की दैहिक, दैविक और भौतिक समस्याओं के निदान के लिए प्रकारांतर से रुद्राक्ष के अनेक प्रयोग बताए गये हैं। ऊपरी बाधाओं के निवारण के लिए: तंत्र-शास्त्र के अनुसार रुद्राक्ष के दाने या माला को शोधित करके धारण करने पर वायव्य दोष, भूत-प्रेत, अभिचार प्रयोग आदि से होने वाले कष्टों से छुटकारा मिलता है। रुद्राक्षधारी व्यक्ति जंगल, पहाड़, श्मशान या अन्य संकटपूर्ण स्थानों में भी चला जाए तो वह तन-मन से सुरक्षित रहता है। बन्ध्यत्व निवारण के लिए: मध्यम आकार का एक शुद्ध रुद्राक्ष लेकर एक तोला सुगंध रसना के साथ खरल में कूट-पीसकर चूर्ण कर लें। संतानहीन महिला ऋतुमति होने के प्रथम दिन से सात दिनों तक रोज सुबह शाम उपरोक्त चूर्ण को 2-3 माशे की मात्रा में गाय के दूध के साथ सेवन करें। इसके प्रभाव से उसे गर्भधारण होकर संतान की प्राप्ति होगी। बच्चों के रोगों में लाभकारी: बच्चा अगर रात में चिहंुकता है, डरता है, रोने लगता है या फिर अस्वाभाविक रूप से हाथ पैर पटकने लगता है तो ऐसे बच्चों के गले में एक या तीन मुखी रुद्राक्ष के दाने धागे में डालकर पहना दें। साथ ही एक रुद्राक्ष को पानी में घिसकर, पानी बच्चे को पिला दें और सोते समय उसकी छाती पर लेप कर दें। बच्चा इन परेशानियों से मुक्त हो जाएगा। उदर विकार नाशक प्रयोग: एक तांबे के लोटे में रुद्राक्ष के पांच दाने डालकर उसमें पानी डालकर रात्रि में छोड़ दें। सुबह उस पानी को पी जायें। इस प्रकार कुछ दिन तक करने से उदर विकार नष्ट होकर रक्त-संचार में सहायक होता है। आलस, अनिद्रा, पेट की गैस, कब्ज आदि में भी लाभ होता है। रक्त-चाप को नियंत्रित करता हैः रुद्राक्ष या इसकी माला को धारण करने से रक्तचाप नियंत्रित रहता है। रुद्राक्ष को हृदय के पास स्पर्श होना चाहिए। इनके अतिरिक्त रुद्राक्ष को चंदन की भांति घिसकर माथे पर तिलक लगाने से शिवकृपा प्राप्त होती है और व्यक्ति लोगों का प्रिय बनता है।



वास्तु विशेषांक  December 2017

फ्यूचर समाचार के वास्तु विशेषांक में इस बार वास्तु की बारीकियों का अच्छा विश्लेषण किया गया है इस अंक के मुख्य लेखों में वास्तु एवं व्यापर, वास्तु शास्त्र में ग्रहों की भूमिका का महत्व, वास्तु के अनुसार सीढ़ियां वास्तु दोष कारण एवं निवारण, भारत के प्रसिद्ध वास्तु सम्मत और वास्तु दोषयुक्त मंदिर, एक थी आरुषि भाग-४ सम्मिलित हैं

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