क्या आप रुद्राक्ष खरीदने जा रहे हैं.

क्या आप रुद्राक्ष खरीदने जा रहे हैं.  

क्या आप रुद्राक्ष खरीदने जा रहे हैं ? रविंद्र लाखोटिया रुद्राक्ष केवल नेपाल का ही शुभ होता है, यह बात मिथ्या है। हिंदुओं में यह मान्यता हिंदू देवता पशुपति के साथ जुड़ी हुई है। नेपाल, जिसकी भौगोलिक सीमा को इंसान ने बांटा है, भी हिमालय की तराई में बसा हुआ है, जबकि हिमालय की गोद में भूटान, सिक्किम, असम, हिमालय, उत्तराखंड आदि भी बसे हुए हैं। पशुपति नाथ का क्षेत्र होने से हिंदुओं में नेपाल के प्रति गहरी आस्था है। परंतु यथार्थ में किसी भी देश-प्रदेश के रुद्राक्ष का स्वभाव और तासीर एक ही है। रुद्राक्ष के दाने नेपाल में बड़े आकार के पैदा होते हैं, जबकि इंडोनेशिया में छोटे आकार के दाने सर्वाधिक मात्रा में होते हैं। रुद्राक्ष का मुख्य और सीधा सा कार्य मानसिक शांति प्रदान करना है। इसकी अपनी एक चुंबकीय शक्ति होती है, जो, रक्तचाप को संतुलित कर, हृदय को मजबूती प्रदान करती है। रुद्राक्ष एक्यूपे्रशर का कार्य भी करता है। इसकी उठी हुई नोक उंगलियों को उचित दबाव देती हैं, जिनमें हृदय से संबंधित अंगुली भी है, जिससे हृदय को बल मिलता है। इस फल के छिलके मजबूत होते हैं, जो एक विशेष प्रक्रिया के द्वारा उतारे जाते हैं। फिर भी यदा-कदा कुछ दानों में छिलके लगे रह जाते हैं, जो इस बात का प्रमाण हैं कि फल पकने से पूर्व तोड़ा गया है। तत्पश्चात् पाॅलिश आदि कर के (माला के लिए) उसे बाजार में बेचा जाता है। रुद्राक्ष की पहचान के 4 तरीके हैं: प्रयोगशाला में परीक्षण सामान्यतः इस तरह का परीक्षण नहीं किया जाता क्योंकि कभीकभार दाना सस्ता होता है, परंतु उसका परीक्षण मंहगा पड़ता है। व्यापारी, या किसी अन्य पर विश्वास: आज के व्यस्त और आधुनिक जीवन में हम किसी भी बात/वस्तु को मानते तो हैं, पर उसे जानते नहीं। इसलिए सामने वाले पर निर्भर करना पड़ता है और यही उचित भी प्रतीत होता है। रुद्राक्ष के दाने को सूंई से कुरेदें: कुरेदने पर रेशा निकले, तो ‘लकड़ी’, अन्यथा रसायन। तत्पश्चात उसको गौर से देखने पर रुद्राक्ष के दाने पर उभरे हुए पठारों से असली और नकली में अंतर पता चलेगा। नकली में आकृतियां, जैसे शिव लिंग, त्रिशूल, सांप योनि आदि स्पष्ट दिखाई देंगे, जबकि असली में ऐसा नहीं होता। हां, असली रुद्राक्ष को अत्यधिक गौर से देखने पर अपनी कल्पना शक्ति से कोई आकृति अवश्य महसूस कर सकते हैं। जिस प्रकार उंगलियों के छाप अलग- अलग होते हैं, उसी प्रकार रुद्राक्ष के उठे हुए पठारों की बनावट भी दो रुद्राक्षों में भिन्न होती है। 9 मुखी से 21 मुखी और 1 मुखी रुद्राक्ष मंहगे होते हैं। गौरी-शंकर रुद्राक्ष मंहगे होते हैं। यदि इनके मुखों, या जोड़ों को ले कर शक हो, तो इनके परीक्षण के लिए एक कटोरे में पानी को उबालें। जब पानी उबलने लगे, तब रुद्राक्ष को उबलते हुए पानी में एक मिनट तक रखें तथा एक मिनट पश्चात कटोरे को चूल्हे से उतार कर एक मिनट के लिए ढक्कन से ढक दें। तत्पश्चात रुद्राक्ष का दाना निकाल लें और गौर से दाने को देखें। यदि दाने के मुख को जोड़-तोड़ कर बनाया गया होगा, तो जितनी फांकें जोड़ी होंगी, वे फट जाएंगी तथा जोड़ को जोड़ने वाला सोल्युशन भी दिखेगा; अन्यथा थोड़े/ज्यादा फटे प्राकृतिक रुद्राक्ष को यदि गर्म पानी में डालेंगे, तो वे और भी फट जाएंगे। चतुर कारीगर अपना हस्त कौशल महंगे रुद्राक्ष में दिखाने से नहीं चूकते; अर्थात वे प्राकृतिक तौर पर बने रुद्राक्ष में मुख को कम, या ज्यादा इतनी चतुराई से करते हैं कि एक बार तो पारखी भी धोखा खा जाता है। लाल गोलियों, बेर की गुठली के ऊपर रंग आदि कर के रुद्राक्ष बना कर धूर्त लोगों द्वारा बेचे जाते हैं। रुद्राक्ष का दाना छोटे आकार में कम मिलता है। इसलिए दाना जितना छोटा होगा, उतना ही महंगा होता जाएगा। इसी प्रकार 5 मुखी रुद्राक्ष बहुतायात में प्राप्त होते हैं। अतः ये सस्ते होते हैं, जबकि बाकी मुखवाले इससे मंहगे होते हैं। इनके मूल्यों में घटत-बढ़त चलती रहती है। भारत में विशेषतः पशुपति नाथ की स्थली नेपाल के रुद्राक्ष का मूल्य सर्वाधिक होता है। 1 मुखी रुद्राक्ष कम मिलता है। विशेषतः नेपाल का 1 मुखी रुद्राक्ष गोल होता है, जो कि अप्राप्य है। यदि प्राप्त हो जाए, तो वह अमूल्य है। रुद्राक्ष की 2 किस्में होती हैं: एक तो खुरदुरा, जिसका आम जनता में चलन है। दूसरी किस्म का नाम ‘पथरी’ है। इनमें चिकनापन ज्यादा होता है तथा ये कठोर होते हैं। इनका मूल्य भी अधिक होता है। नेपाल को छोड़ कर शेष सभी जगह के 1 मुखी रुद्राक्ष प्रायः अर्द्ध चंद्राकार होते हंै। कभी-कभी 3 और 2 मुखी से भी, प्राकृतिक तौर पर, 1 मुखी बन जाते हैं। ऐसे 1 मुखी दाने को ऊपर से देखने पर 2 या 3 कटाव से दिखेंगे, परंतु यह 1 ही है। यदि इनकी प्राण प्रतिष्ठा कर के पहना जाए, तो इनका प्रभाव पूर्णतः 1 मुखी का ही होता है। ये काफी मंहगे दाने होते हैं। रुद्राक्ष गर्म और तर होता है। यदि दानों का किसी भी प्रकार से उपयोग (पूजा, उपचार, पहनना) नहीं करते, तो इन्हें तेल में डुबो कर रखना चाहिए। इससे रुद्राक्ष फटेगा नहीं; अन्यथा प्राकृतिक तौर पर भी फटने का डर रहता है। यह माना जाता है कि अंगूठे के नाखून के मध्य रुद्राक्ष को रखने से यह किसी भी दिशा में घूमे, तो असली, अन्यथा नकली। परंतु यह प्रामाणिक नहीं है। कारण किसी भी गोल/ नोकदार वस्तु को इस तरह रखेंगे, तो वह एक निश्चित दिशा में घूमेगी ही। दूसरा भ्रम तांबे की तार वाला है कि उस पर रुद्राक्ष घूमेगा, या नहीं। लेकिन सबसे बड़ा भ्रम जनता में यह है कि रुद्राक्ष को पानी में डालें; यदि डूब जाए, तो असली, अन्यथा नकली। यह भी सर्वथा गलत है। हकीकत यह है कि दाना पानी में डूब जाए, तो फल पका हुआ है और यदि तैर जाए, तो कच्चा है, या अंदर से कीड़ों का खाया हुआ है। जरूरी नहीं कि एक ही पेड़ के सारे के सारे दाने डूब जाए,ं या तैर जाएं। रुद्राक्ष पर, भगवान शिव की पूजा के अलावा, किसी भी भगवान की पूजा, या जाप आदि कर सकते हैं। हिंदू शास्त्रों के अनुसार रुद्राक्ष माला पर किये गये जप से सभी प्रकार की मालाओं से, सहस्रों गुणा फल प्राप्त होते हैं। रुद्राक्ष की माला को धारण करने के पश्चात कोई कठोर यम-नियम आदि नहीं है, क्योंकि शिव ही संहारक, औघड़नाथ, भूतनाथ आदि हैं। रुद्राक्ष का उपयोग 3 तरह से होता है: 1. औषधि के रूप में 2. धारण करना 3. विभिन्न मुखी दानों की पूजा करना। गोल दाना ज्यादातर नेपाल में ही होता हैं। गोल दाना व्यापार और धार्मिक दृष्टि से सर्वोत्तम होता है। शास्त्रों में रुद्राक्ष के 4 रंग बताये गये हैं तथा उनको चार वर्णाें में बांटा गया हैः 1. सफेद - ब्राह्मण 2. लाल - क्षत्रिय 3. पीला - वैश्य 4. काला - शूद्र। परंतु वर्तमान में अनुभव के आधार पर यह देखा गया है कि अधिकांशतः रुद्राक्ष लाल-पीला मिश्रित, अर्थात भूरे रंग के ही मिलते हैं तथा पहनने के कुछ समय पश्चात काले पड़ जाते हैं। जहां तक रुद्राक्ष के मुखों का प्रश्न है, तो यह जरूरी नहीं कि मुख केवल 14 तक ही होते हैं। अब तक 21 मुख के दाने भी प्राप्त हुए हैं। कारण मुख प्रकृति द्वारा बनते हैं और प्रकृति का कोई सख्त नियम 14 मुख तक के लिए नहीं है। हां, यह बात अवश्य है कि 14 मुखी से ऊपर के रुद्राक्ष दुर्लभ हैं। इसी प्रकार 2 मुखी गोल बड़ा दाना भी बहुत कम प्राप्त होता है। रुद्राक्ष के छोटे दानों की मालाएं 5 मुखी दाने की होती हैं। कभीकभार उसमें 4 मुखी, या 6 मुखी के दाने भी मिश्रित हो जाते हैं। अतः जबभी रुद्राक्ष खरीदें, तो सामने वाले के व्यवहार, साख और विश्वास को देख-समझ कर खरीदें। रुद्राक्ष माला से, भगवान शिव की पूजा के अलावा, किसी भी भगवान की पूजा, या जप आदि कर सकते हैं। हिंदू शास्त्रों के अनुसार रुद्राक्ष माला पर किये गये जप से सभी प्रकार की मालाओं से, सहस्रों गुणा फल प्राप्त होते हैं।



हस्तरेखा विशेषांक  April 2017

फ्यूचर समाचार के हस्त रेखा विशेषांक अप्रैल 2017 में हस्त रेखा विज्ञान सम्बन्धित विस्तृत जानकारी, विभिन्न शोधपरक लेख जिनमें अंगूठे का महत्व, हथेली में विभिन्न रोगों के लक्षण, जातक नौकरी करेगा अथवा व्यवसाय तथा हस्तरेखा से अनुमानित आयु आदि प्रमुख हैं। सत्य कथा में चैन्नई की राजनेता शशिकला के सितारे तथा विचार गोष्ठी में हस्तरेखा एवं कुण्डली मिलान के अतिरिक्त डाॅ. राकेश कुमार सिन्हा का पावन स्थल नामक स्थायी स्तम्भ में श्री हरिहर क्षेत्र का वर्णन अत्यन्त रोचक है। वास्तु परामर्श में फ्लैट का वास्तु विश्लेषण नामक विषय पर चर्चा की गई है। सम्पादकीय में यह दर्शाया गया है कि किस प्रकार हस्त रेखाओं का ज्ञान स्वास्थ्य सम्बन्धी जानकारी के लिए विशेष रूप से उपयोग में लाया जा सकता है। अन्य स्थायी स्तम्भों में दी गई जानकारी भी नियमित पाठकों के लिए उपायोगी सिद्ध होगी।

सब्सक्राइब

अपने विचार व्यक्त करें

blog comments powered by Disqus
.