अग्नि तत्व राशि दशम भाव में सूर्य

अग्नि तत्व राशि दशम भाव में सूर्य  

अग्नि तत्व राशि दशम भाव में सूर्य आचार्य किशोर अग्नि तत्व राशि मेष राशि में सूर्य उच्च का तो होता ही है। कर्क लग्न के लिए ही उच्च का सूर्य दशम भाव का होता है। वैशाख के महीने में मध्याह्न के समय जन्में व्यक्तियों का सूर्य मेष राशि दशम भाव में होता है। इसलिए राजकार्य में दक्षता, सेनापति, नेता, राजा शासक और धनवान होते हैं। जातक दूसरों को निर्देश देकर हिम्मत के साथ कार्य करता है। ताकत एवं साहस के साथ-साथ कर्म की दक्षता एवं आयु में वृद्धि करता है। परंतु सामान्य कार्य या छोटा कार्य, नीच, अल्प पदार्थ के प्रति उसकी रूची नहीं रहती। उसका लक्ष्य विराट, सौंदर्य उज्जवलता को इंगित करता है। उनका कर्म जीवन नगर राजधानी कई दिशाओं का निर्णय करता है। क्योंकि देश का शासन चलाने में ऐसे ही स्थानों का विचार किया जाता है। अपना बल प्रयोग करके, प्रभुत्व विस्तार आदि द्वारा दंडित करवाता है। उनके दिमाग में षडयंत्र, गुप्त राजनीति कूटनीति नहीं होता। दशम भावस्थ सूर्य के साथ मंगल हो और मंगल अस्त न हो तो सोने पर सुहागा। सूर्य के साथ चंद्रमा हो और चंद्रमा अस्त हो तो मानसिक रोग अवश्य होता है साथ-साथ अस्वभाविक चिंताधारा और नेता होते हुए भी जनता के सामने जातक नतमस्तक हो जाता है। अपने कर्म जीवन में अपने अधीनस्थ कर्मचारियों को संतुष्ट नहीं कर पाता। माता का सुख नहीं मिलता। अपनी संपत्ति में भी कई प्रकार के झंझट रहते हैं। यदि बुध साथ में हो जातक बहुत भ्रमण करता है और आय में वृद्धि करता है। साथ में काम करने वाले व्यक्ति षड्यंत्र करके यदि नुकसान पहुंचाना चाहते हैं तो नुकसान पहुंचा नहीं सकते उनका षडयंत्र असफल हो जाता है। यदि गुरु साथ में हो तो जातक, प्रबल सौभाग्यशाली, कर्म क्षेत्र में उन्नति और कभी-कभी असंभव को भी संभव करके दिखाता है। तात्पर्य यह है कि सूर्य के साथ जो भी ग्रह हो उसे अस्त नहीं होना चाहिए तभी यह फल मिल सकते हैं। गुरु धार्मिक, ज्ञानी, प्रतिष्ठित होने के साथ-साथ पिता की दीर्घ आयु भी करवाता है और स्वयं धार्मिक न्यायप्रिय और प्रभावशील व्यक्ति होकर शत्रुओं का दमन कर देते हैं। यदि दशम भाव में सूर्य के साथ शुक्र हो तो स्त्री रोगिणी होती है। शुक्र की युति होने पर जातक कामुक, धन संपत्ति होते हुए भी उसका भोग नहीं कर पाते। कर्म क्षेत्र में विघ्न, विश्वासघात आदि देता है। यदि शनि साथ में हो तो स्वास्थ्य में हानि, उन्नति में विघ्न, बीमार स्त्री होने के कारण सुख नहीं देता। नीच जाति के लोगों से नुकसान पाता है। कुंडली सं. 1 एक पुरुष जातक की कुंडली है। जातक के जन्म के समय सूर्य की दशा 1 साल-5 माह-18 दिन शेष थी। गुरु की दशा 29-10-2008 तक चली। इस कुंडली में उच्चस्थ सूर्य अग्नि तत्व राशि दशम भाव में अग्नि तत्व ग्रह मंगल की दृष्टि सूर्य को और मंगल को उच्च के गुरु की दृष्टि है। इसलिए गुरु की महादशा में कई थकान और कई गाड़ियां बनाई। नेता हाथ जोड़े आगे पीछे। इस कुंडली में सूर्य चंद्र को छोड़कर जो पंचमहापुरुष योग का लाभ मिलता है वह दिख रहा है। गुरु से हंस योग मंगल से रूचक योग का लाभ मिलता है। सूर्य चंद्र उच्च राशि में है जिस कारण कुंडली अत्यधिक बलवान है। अक्तूबर 1992 से 16 वर्ष जातक ने राजा जैसे सुख का भोग किया है। करोड़ों कमाया नेताओं को कई लाख बांटा। मंत्री इनके अधीन रहे, किसी भी मंत्री को यह कुछ नहीं समझते थे। कुंडली में शनि की महादशा में मीन राशि में शनि गुरु जैसा फल नहीं दे पाया इसलिए कुंडली में ग्रह जितने भी बलवान हो यदि शुभ ग्रह की दशा न चले फल एक जैसा नहीं मिलेगा क्योंकि हमेशा शुभ ग्रह अपनी दशा आने पर शुभ और अशुभ ग्रह अशुभ फल ही देंगे। सिंह राशि दशम भाव में सूर्य अपनी मूल त्रिकोण राशि में सूर्य जातक को पूर्ण सुख मिलना चाहिए। दशम भाव का फल सूर्य की महादशा में जातक को अवश्य शुभ फल देगा। मेष चर राशि, सिंह स्थिर राशि- चर राशि में सूर्य का प्रताप जितना अधिक रहेगा स्थिर राशि में उतना नहीं होगा क्योंकि स्थिर राशि में सूर्य पूर्ण शक्ति नहीं दे पाएगा क्योंकि स्थिर मन धैर्य, गंभीरता, सामथ्र्य, संगठन की क्षमता, निष्ठा, आडंबर, कर्म जीवन में शीर्ष स्थान, नेतृत्व यह सब दूर रहकर भी दूसरों की मदद द्वारा करवाता है। (मेष राशि होने पर जातक स्वयं करता है) ऐसे जातक धन से अधिक मान-सम्मान के प्रति ध्यान देते हैं। क्योंकि मर्यादा का ध्यान पहले और धन बाद में। सिंहस्थ सूर्य स्वतंत्र प्रवृत्ति, शासक, दायित्वपूर्ण कर्म करते हैं। जो व्यक्ति क्षमताशील होते हैं उनकी मदद से काम करवा लेते हैं। उनके कार्य करने का तरीका प्रदेश, शुष्क स्थान, जंगल इत्यादि और कर्म गोपनीय ढंग से बल प्रयोग द्वारा करवाते हैं। यदि मंगल के साथ हो तो जातक हिम्मत एवं शारीरिक कौशल से काम अवश्य लेता है। चंद्र से युति या दृष्टी जातक को भाग्यवान बनाती है क्योंकि इस लग्न के लिए चंद्रमा भाग्येश और सूर्य कर्मेश है। नवम दशम का कुंडली सं. 2 के जातक के जन्म के समय राहु की महादशा दिसंबर 1972 तक रही। गुरु की दशा दिसंबर 1988 तक रही। 2007 तक शनि की महादशा रही। इस कुंडली में अग्नि तत्व राशि मेष राशि में सूर्य, मंगल अग्नि तत्व ग्रह होते हुए भी गुरु की दृष्टि में होने के कारण जो फल गुरु की दशा में मिला वही फल शनि की दशा में नहीं मिला। लिखने का का तात्पर्य यह है कि जब महादशा अच्छी चलती है तब निश्चित रूप से अच्छा फल मिलता है। इस ाुबुसूमंसंबंध- आकस्मिक लाभ, यश, कीर्ति, ख्याति, जनता का प्रिय नेता बनाता है परंतु माता का सुख कम होता है। यदि बुध से युति हो तो सूर्य बुधादि योग से राजयोग मिलता है क्योंकि बुध बुद्धि का कारक है इसलिए कूटनीति के कौशल से धन भी कमाता है। परंतु अपयश दूसरों का नुकसान, कर्मक्षेत्र में आधीनस्थ लोगों से विवाद की संभावना रहती है। क्योंकि बुध अष्टमेश एवं लाभेश है। यदि गुरु से संबंध या युति हो तो संतान की उन्नति, धन आगमन, ज्ञानी लोगों द्वारा सम्मानित होता है। शुक्र का संबंध हो तो भोगी, विलासप्रिय, बहु स्त्री से विषय वासनाओं में आसक्त रहता है। शनि से संबंध विघ्न, विवाद, शत्रुता अवश्य करवाएगा फिर भी घर संपत्ति का लाभ तो मिलेगा परंतु स्वास्थ्य ठीक नहीं रहेगा। कुंडली सं. 3 के जातक के जन्म के समय केतु की महादशा 3 वर्ष 7 महीना 5 दिन शेष थी। वर्तमान समय में मंगल की महादशा चल रही है। इस कुंडली में लग्नेश षष्ठेश मंगल अग्नि तत्व राशि धनु राशि में द्वितीय भाव में गुरु से केंद्र में हैं और दशम भाव में नवमेश चंद्रमा दशमेष सूर्य केतु के साथ अग्नि तत्व अग्नि तत्व राशि में शुभ कर्तरी योग में बैठे हैं। इस जातक को बिना कर्म किए सुख मिले। षष्ठ भाव मामा का घर है उसका स्वामी मंगल धन स्थान में है। इसलिए यह जातक अपने मामा की फैक्ट्री में मैनेजर है। मातृ कारक ग्रह चंद्रमा भाग्येश होकर दशम स्थान में मंगल (षष्ठेश) भाग्य स्थान को दृष्टि दे रहे हैं। जिसका भाग्येश कर्मेश बलवान हो स्वभाविक है। भाग्य का रास्ता अपने आप खुल जाता है। अग्नि तत्व राशि सिंह राशि में सूर्य के साथ चंद्रमा (पक्षहीन दोनों पाप ग्रह तीसरे पाप ग्रह केतु के साथ कर्म क्षेत्र में बलवान हैं। जातक को राजयोग मिलना स्वभाविक है। कुंडली सं. 4 के जातक के जन्म के समय बुध की महादशा अक्तूबर 1994 तक रही। वर्तमान समय में शुक्र की महादशा राहु की अंतर्दशा चल रही है। जातक एक संभ्रात परिवार का लड़का है। क्योंकि लग्नेश मंगल लग्न में, चलित में गुरु लग्न में है। विद्या का स्वामी गुरु पंचमेश होकर अपनी मूल त्रिकोण राशि में उच्च शनि की दृष्टि में बैठे हैं। गुरु शनि शत्रु नहीं है। अग्नि तत्व राशि सिंह राशि में सूर्य अग्नि तत्व ग्रह होते हुए भी चलित में दशम भाव में नहीं है। जब हम दशम भाव का विचार करते हैं तो सूर्य को दशम भाव में ही होना चाहिए यहां अग्नि तत्व राशि में सूर्य सिंह राशि में होने के बावजूद दशम के बजाय चलित में नवम भाव में जा चुके हैं। 2021 के बाद सूर्य की दशा चलेगी। लग्न, नवांश, चलित का ध्यान रखते हुए ज्योतिष का विचार करना चाहिए। 16 अगस्त का जन्म होने कारण सूर्य 00 पर है परंतु नवांश कुंडली में उच्च का सूर्य है। वर्तमान समय में शुक्र का की महादशा में जितना दशम भाव से विचार करना चाहिए उतना लाभ नहीं मिलेगा क्योंकि चलित में गुरु लग्न में और शनि मंगल केतु द्वादश में, रवि, बुध शुक्र नवम भाव में इसलिए शुक्र की महादशा में जातक जितनी आशा रखते हैं उतना लाभ नहीं मिल पाएगा परंतु राशि चक्र में धन का स्वामी धन स्थान में अपनी मूल त्रिकोण राशि में वक्र हैं। शनि उच्च राशि में है। सूर्य बुध शुक्र को गुरु की दृष्टि के कारण भाग्येश चंद्रमा पंचम भाव में होने से जातक निश्चित रूप से भाग्यशाली है। विद्या, धन, भाग्य, अति उत्तम है। फिर भी 2021 के बाद सूर्य की दशा में जातक को अपने भाग्य का लाभ या राजयोग का लाभ मिलेगा उससे पहले नहीं। जातक एक इंजीनियर है। माता-पिता का एकलौता बेटा है। जातक का जब से जन्म हुआ तब से माता-पिता का भाग्य चमकने लगा। अग्नि तत्व राशि सूर्य दशम भाव में होने पर भी 00 में वाल्यावस्था में और बुध शुक्र साथ में जातक को राजयोग तो अवश्य मिल रहा है। क्योंकि धनेश की दृष्टि दशमेश को और उच्च शनि की दृष्टि धनेश को और भाग्येश चंद्रमा त्रिकोण स्थान में गुरु से केंद्र में है इसलिए कई राजयोग तो मिल ही रहे हैं इसलिए जातक सुखी तो अवश्य है परंतु कोई भी ग्रह 00 में हो बाल्यावस्था हो, चलित में भाव बदला हो, दशा भी सही न चलती हो तो अग्नि तत्व राशि में सूर्य रहते हुए भी फल नहीं मिल सकता परंतु शुक्र की महादशा के बाद सूर्य की महादशा चंद्रमा, मंगल, राहु, गुरु की महादशा तक जातक को शुभ फल अवश्य मिलेगा परंतु सूर्य का दशम भाव का फल नहीं मिलेगा। अग्नि तत्व राशि धनु द्विस्वभाव राशि है। मेष राशि चर राशि, सिंह राशि स्थिर राशि जैसा सूर्य धनु राशि में द्विस्वभाव राशि होने के कारण सूर्य का फल कुछ भिन्न अवश्य होगा। दशम भावस्थ सूर्य जातक को ज्ञानी, धनी, भाग्यवान, सुखी, कर्म कुशल होते हुए माता का विरोध शत्रु युक्त होते हैं। उस भाव में पाप ग्रह की दृष्टि जातक को स्वार्थी बनाएगी। कठोर शासन, अनुशासन प्रिय बनाता है फिर भी हमेशा विरोधियों का सामना करना पड़ता है। जितने भी शत्रु हों जातक घबराता नहीं। जरूरत पड़ने पर बल प्रयोग भी करता है। धनु राशि में यदि सूर्य के साथ मंगल हो या दृष्टि संबंध हो तो जातक को अति भाग्यवान बनाता है। जबकि वो कठोर शासक न्यायी, दंड प्रिय, अधिक शारीरिक परिश्रम करने वाले होते हैं। यदि चंद्र से युति या दृष्टि संबंध हो तो अच्छी संतान, ज्ञान, बुद्धि, यश, कीर्ति भी देते हैं क्योंकि चंद्रमा मीन लग्न के लिए सूर्य दशम भाव में धनु राशि में मंगल भाग्येश एवं धनेश और चंद्रमा पंचमेश संतान का स्वामी होता है। इसलिए राजयोग तो अवश्य देगा। यदि बुध से युति या दृष्टि संबंध हो तो जातक सुखी, धनी भू-संपत्तिवान उत्तम स्त्री युक्त इसलिए कराता है कि मीन लग्न के लिए बुध चतुर्थ एवं सप्तम का स्वामी है। यदि गुरु का संबंध या दृष्टि हो तो उच्च पद, राजकार्य, उपदेश देने वाला, अध्यापक, मंत्री और प्राक्रमी होता है। यदि शुक्र का संबंध हो तो भोगी, विलासी, बुद्धिहीन बनाएगा और साथ-साथ अपयश भी देगा। भाई से दुखी रहेगा। समाज में अपने आपको कमजोर दिखाएगा क्योंकि मीन लग्न के लिए शुक्र तृतीय और अष्टम भाव का स्वामी है। शनि का संबंध धनहानि, रोगी, कार्य में विघ्न, कार्य में विपत्ति अवश्य होगी। कुंडली सं. 5 क्रिकेट खिलाड़ी राहुल द्रविड़ की जन्मकुंडली है। भारत क्रिकेट टीम के कप्तान रहे। पंचमेश चंद्रमा लग्न में, भाग्येश मंगल भाग्य स्थान में लग्नेश दशमेश गुरु दशम भाव में अर्थात दशम भाव में गुरु के साथ और और चार ग्रह भी हैं परंतु बुध गुरु अस्त है इसलिए जातक को अधिक सफलता नहीं मिली क्योंकि शुक्र की महादशा जो कि तृतीयेश और अष्टमेश है। 2002-2019 तक है परंतु 2019-2025 के मध्य सूर्य की महादशा में उच्च पद अवश्य मिलेगा। भारत के क्रिकेट टीम में कप्तान रहकर सफलता भी मिली परंतु शुक्र की महादशा के कारण खेल को बहुत आगे नहीं बढ़ा पाए फिर भी सूर्य एवं गुरु वर्गोत्तम होकर नवांश में एकादश भाव में बैठे हैं। शुक्र-मंगल अपने-अपने घर में है परंतु चंद्रमा के नीच का हो जाने के कारण वाक चातुर्य में कमजोर रहें। शनि तृतीय भाव में वक्र होने के कारण पराक्रम भी दिया। इसलिए कप्तान के रूप में भारत को इज्जत सम्मान दिलाया। शनि का वृषभ राशि में होना किसी भी लग्न के लिए खराब नहीं होता। शनि अपने घर से केंद्र एवं त्रिकोण स्थान में बैठे हैं और वक्र होना बलवान माना जाता है । परंतु चंद्रमा पंचम त्रिकोण का स्वामी होकर लग्न में लग्नेश गुरु से केंद्र में होना परंतु नवांश में नीच राशि में होते हुए भी मंगल के साथ होने से नीच भंग भी हुआ है। दशमांश कुंडली में कर्क लग्न में चंद्रमा लग्न से दशम भाव मेष राशि में कर्म जीवन को भी बढ़ा दिया। कुल मिलाकर अग्नि तत्व राशि सूर्य धनु राशि में बुध गुरु, शुक्र राहु के साथ बलवान होकर बैठे हैं। दशम भाव का लाभ इसलिए मिला। कुंडली सं. 6 एक स्त्री जातक की कुंडली है। भाग्येश मंगल लग्न में गुरु की दृष्टि में नवांश कुंडली में उच्च राशि में मंगल ने जातक को पुरुष जैसी ताकत दी क्योंकि प्राकृतिक पाप ग्रह मंगल लग्न में बलवान है और अग्नि तत्व राशि धनु राशि में सूर्य गुरु से केंद्र में है। स्वभाविक है कि नवमेश मंगल और दशमेश गुरु एक दूसरे को देख रहे हैं। लग्नेश लग्न को देखते हैं, पंचमेश को देखते हैं, धनेश को देखते हैं इसलिए जातक अपने आप में बलवान है। इसलिए अति धनी और उद्योगपति घर में जन्म हुआ। धनु राशि में सूर्य होना और दशमेश गुरु केंद्र में होना जातक बलवान तो है परंतु नवांश में सूर्य नीच राशि में है। इसलिए अपने पिता का कारोबार सकुशल निभा रही हैं। राजकार्य में भारत सरकार में राज्य सभा की सदस्य भी है परंतु मंत्री नहीं बन पाई । इसका कारण 2016 तक शनि की महादशा चल रही है। इसलिए सत्ता की बागडोर संभाल नहीं पाई। परंतु दशमेश गुरु नवांश कुंडली मीन राशि में चतुर्थ भाव में होने के कारण ज्ञानी और बुद्धिमान है। जातक हिंदुस्तान टाइम्स की मालिक हैं। लिखने का तात्पर्य यह है कि किसी भी कुंडली में कोई ग्रह जब जवान अवस्था में हो और अंश बल में 120 से 180 में हो, उच्च नवांश में हो, मित्र राशि में हो, षडबल में बलवान हो, भाग्येश कर्मेश अस्त न हो और शुभ ग्रह (कारक ग्रह) की दशा चलती हो तभी शुभ फल मिल सकते हैं। अन्यथा नहीं यहां पर दशम भाव में षष्ठेश सूर्य बैठे हैं। फिर भी सूर्य को दशम भाव में दिग्बल मिलता है। जब कोई बलवान जातक गरीब घर में जन्म लेते हैं तो वह अपनी परिस्थिति के अनुसार बलवान होते हैं। उच्च परिवार में जन्म लेने से निश्चित रूप से बली तो होता ही है।



दीपावली विशेषांक  अकतूबर 2009

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