भगवान धन्वन्तिरी जयंती एवं व्रत

भगवान धन्वन्तिरी जयंती एवं व्रत  

भगवान धन्वन्तरि जयंती एवं व्रत पं. ब्रजकिशोर भारद्वाज ‘ब्रजवासी’ भगवान् धन्वन्तरि जयंती एवं व्रत कार्तिक कृष्ण पक्ष त्रयोदशी को संपन्न किया जाता है। यही तिथि धनतेरस के नाम से भी विख्यात है। इस पुण्य पावन तिथि में ही भगवान धन्वन्तरि का जन्म होने से इसे धन्वन्तरि जयंती के नाम से भी जाना जाता है। रोग शोकादि की मुक्ति के लिए इस दिन भगवान धन्वन्तरि का पूजा करते हुए व्रत करने का विधान है। जिन देवता के निमित्त उपवास या व्रत करना हो, उनके मंत्र का जप, उन्हकी कथा का श्रवण, उनका पूजन, तथा उनके नामों का श्रवण और कीर्तन करना चाहिए। काम्य व्रतों में व्रती व्रतारम्भ के पहले दिन मुंडन कराएं और शौच, स्नानादि नित्य कृत्य से निवृत्त होकर मध्याह्न में एकभुक्त व्रत करके रात्रि में सोत्साह ब्रह्मचर्य का पालन करते हुए शयन करें। व्रत के दिन सूर्योदय से दो मुहूर्त पहले शय्या से उठकर शौचादि से निवृत्ति हो, बिना कुछ खाए-पीए सूर्य एवं व्रत के देवता को प्रणाम कर अपनी अभिलाषा निवेदन करके संकल्प सहित व्रतारंभ करें। गणेशाम्बिका, वरुण, नवग्रहादि देवों और फिर प्रधान देवता भगवान धन्वन्तरि का स्वास्ति वाचन, संकल्प, पुण्याहवाचन के साथ षोडषोपचार पूजन करें। भगवान धन्वन्तरि प्राक्टय कथा देवान् कृशानसुरसंघनिपीडिताङ्गन् दृष्ट्वा दयालुरमृतं वितरीतुकामः। पाथोधिमन्थनविधौ प्रकटोऽभवद्यो धन्वन्तरिः स भगवानवतात् सदा नः ।। ‘असुरों द्वारा पीड़ित होने से जो दुर्बल हो रहे थे, उन देवताओं को अमृत पिलाने की इच्छा से ही भगवान धन्वन्तरि समुद्र-मंथन से प्रकट हुए थे। वे हमारी सदा रक्षा करें।’ सागर मंथन का महत्व बतलाकर देवताओं ने असुरों को अपना मित्र बना लिया। इसके पश्चात देव और दानवों ने मिलकर अनेक औषधियों को क्षीरसागर में डाला। मन्दराचल को मथानी और वासुकिनाग को रस्सी बनाकर ज्यों ही उन्होंने समुद्र-मंथन प्रारंभ किया, त्यों ही निराधार मन्दराचल समुद्र में धंसने लगा। तब स्वयं सर्वेश्वर भगवान ने कूर्मरूप से मंदागिरि को अपनी पीठ पर धारण किया। इतना ही नहीं भगवान ने देवताओं, दानवों एवं वासुकिनाग में प्रविष्ट होकर और स्वयं मंदराचल को ऊपर से दबाकर समुद्र-मंथन कराया। हलाहल, कामधेनु,, ऐरावत, उच्चैःश्रवा, अश्व, अप्सराएं, कौस्तुभमणि, वारुणी, शंख, कल्पवृक्ष, चंद्रमा, लक्ष्मीजी और कदलीवृक्ष उससे प्रकट हो चुके थे। अमृत-प्राप्ति के लिए पुनः समुद्र-मंथन होने लगा और अंत में हाथ में अमृत-कलश लिए भगवान धन्वन्तरि प्रकट हुए। धन्वन्तरि साक्षात विष्णु के अंश से प्रकट हुए थे, इसीलिए उनका स्वरूप भी मेघश्याम श्रीहरि के समान श्यामल एवं दिव्य था। चतुर्भुज धन्वन्तरि शौर्य एवं तेज से युक्त थे। अमृत वितरण के वाद देवराज इंद्र ने उनसे देववैद्य का पद स्वीकार करने की प्रार्थना की। उन्होंने इंद्र के इच्छानुसार अमरावती में निवास करना स्वीकार कर लिया। कुछ समय बाद पृथ्वी पर अनेक व्याधियां फैलीं। मनुष्य विभिन्न प्रकार के रोगों से कष्ट पाने लगे। तब इंद्र की प्रार्थना पर भगवान धन्वन्तरि काशिराज दिवोदास के रूप में पृथ्वी पर अवतरित हुए। उन्हें आदिदेव, अमरवर, अमृतयोनि, अब्ज आदि विभिन्न नामों से संबोधित किया गया है। लोक-कल्याणार्थ एवं जरा आदि व्याधियों को नष्ट करने के लिए स्वयं भगवान विष्णु धन्वन्तरि के रूप में कार्तिक कृष्ण त्रयोदशी को प्रकट हुए थे, अतः आयुर्वेद-प्रेमी भगवान धन्वन्तरि के भक्तगण एवं आयुर्वेद के विद्वान हर वर्ष इसी दिन आरोग्य-देवता के रूप में उनकी जयंती मनाते हैं। भगवान धन्वन्तरि का संपूर्ण पूजनादि कृत्य भगवान विष्णु के मंत्रों या पुरुष सूक्त से ही करना चाहिए। साथ ही विष्णु मंत्रों का जप एवं उनकी दिव्य कथाओं का श्रवण भी करना चाहिए। निम्नलिखित दो मंत्रों से भी पूजन कर जप व यज्ञ कार्य को पूर्ण करें। दिन व रात्रि में भगवन्ताम संकीर्तन भी करें। मंत्र 1. धन्विने नमः 2. धन्वन्तरिणे नमः जिस प्रकार भगवान कृष्ण के व्रतादि में फलाहारादि नैवेद्य का प्रसाद रूप में भक्षण किया जाता है, उसी प्रकार धन्वन्तरि व्रत में भी सूर्यास्त से पूर्व एक बार फलाहारी भोजन करना चाहिए। इस व्रत की पूर्णता से आरोग्य की प्राप्ति तो होती ही है, भगवान की कृपा से भगवद्धाम की प्राप्ति का मार्ग भी सुलभ हो जाता है।


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